दुष्यंत कुमार ने अगर सिर्फ़ 'साये में धूप' की ग़ज़लें ही लिखी होतीं- और कुछ न लिखा होता- तब भी आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में उनकी विशिष्ट जगह होती. दुष्यंत का यह काम कई मायनों में अनूठा है. ग़ज़ल मूलतः फ़ारसी और उर्दू की विधा रही. उर्दू में भी इसे मीर-ग़ालिब-इक़बाल-फ़िराक़-फ़ैज़ सहित कई ऐसे उस्ताद शायर मिले जिनकी वजह से इस विधा में किसी का हाथ आज़माना आसान काम नहीं था. लेकिन दुष्यंत कुमार ने इस विधा को बिल्कुल कुछ अलग रंगत दे डाली. यह सच है कि दुष्यंत के पहले भी हिंदी के कई कवियों ने ग़ज़लों को साधने की उत्कृष्ट कोशिश की. निराला, शमशेर और कई दूसरे कवियों के यहां ग़ज़लें मिल जाती हैं. लेकिन वे जैसे ग़ज़लों की गली में टहलने आते हैं, अपना जायक़ा बदलने, उनका अंदाज़ और मिज़ाज मूलतः वही रहता है जो उर्दू ग़ज़लों का है.लेकिन दुष्यंत आए तो उन्होंने जैसे इस विधा का हिंदी में पुनर्संस्कार कर डाला, यहीं अपना घर बना लिया.
उन्होंने जो ग़ज़लें लिखीं, वे अपने स्वरूप और संप्रेषण में अपने उर्दू सहोदरों से इतनी भिन्न थीं कि उन्हें बिल्कुल एक अलग विधा की तरह पहचानने की मजबूरी हो गई. साहित्य के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं जब एक भाषा की कोई विशिष्ट विधा दूसरी भाषा में इस सहजता से स्वीकृत हो जाए. हिंदी में किसी और ने अगर ऐसी कोई कोशिश की तो वे त्रिलोचन थे जिन्होंने हिंदी में सॉनेट लिखे. निश्चय ही वे शिल्प के बेहतरीन उदाहरण हैं और त्रिलोचन की बेजोड़ प्रतिभा के साक्ष्य भी, लेकिन वे कला-रूप की तरह ही बचे रहते हैं, अपने जनोन्मुख विषयों के बावजूद बड़ी संवेदना पैदा करने में नाकाम रहते हैं, इसलिए उनकी कोई परंपरा नहीं बन पाती. लेकिन हम पाते हैं कि दुष्यंत हिंदी ग़ज़लों को न सिर्फ़ स्वीकृति दिलाते हैं, बल्कि हिंदी में इसकी पूरी एक परंपरा शुरू हो जाती है. बेशक, उनमें से कुछ दुष्यंत की ही प्रतिलिपि दिखाई पड़ते हैं, लेकिन इसमें भी दुष्यंत की महानता नज़र आती है.
इन ग़ज़लों को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि आज़ादी के बाद एक नए राष्ट्र के लिए देखे गए महान स्वप्न जिस तरह तिरोहित हो रहे थे, जो मोहभंग आकार ले रहा था, उससे पैदा मायूसी, हताशा और गुस्से को दुष्यंत ने कई तरह से व्यक्त किया- ‘कहां तो तय था चरागां हरेक घर के लिए / कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए.‘ इस व्यक्तिगत दुख-दर्द को व्यक्त करते-करते दुष्यंत अचानक राजनीतिक हो उठते हैं. उनकी ग़ज़लों में ज़िद और तीखापन बढ़ता जाता है- ‘तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की / ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए' और ‘वे मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता / मैं बेक़रार हूं आवाज़ में असर के लिए.
अचानक यह बात समझ में आती है कि उर्दू में फ़ैज़ जिस बात के लिए सराहे जाते हैं- रोमानियत और राजनीति को मिलाने के लिए, उसे शायद हिंदी में दुष्यंत कुमार ने कुछ और गाढ़ेपन के साथ साधने में कामयाबी हासिल की है. दुष्यंत कुमार पूरी तरह- बल्कि बुरी तरह- राजनीतिक कवि हैं. उनकी ग़ज़लों को कहीं से उठा लीजिए- एक राजनीतिक पुकार उनमें मिलेगी. कुछ ग़ज़लें तो बिल्कुल इंकलाब का तराना बनने लायक हैं और बनती रही हैं. मसलन,
‘हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए.
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए.
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.
अब इस ग़ज़ल का एक-एक शेर मानीख़ेज़ है- दर्द और बदलाव की बात करता हुआ, उसके लिए बाहर निकलने को तैयार. पहले शेर में पीड़ा की बात है तो दूसरे शेर में बुनियाद हिलाने की. तीसरे शेर में सामूहिक संघर्ष की, चौथे शेर में मक़सद की, और अंत में यह बात कि विद्रोह की चिनगारी जलती रहे- चाहे जिसके भी सीने में जले. क्या किसी बदलाव या बग़ावत के हक़ में लिखी गई ऐसी ग़ज़लें कहीं और दिखती हैं? इस राजनीतिक बुनावट की ग़ज़लें उनके यहां भरी पड़ी हैं. ख़ास बात ये है कि इन ग़ज़लों में वे आम आदमी की चेतना को रेखांकित करते हैं. यह चेतना भी उसके यहां चोट से आई है. उनकी एक ग़ज़ल के ये चंद शेर देखे जाने लायक हैं-
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है.
वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू,
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है.
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर,
झोले में उसके पास कोई संविधान है.
उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप,
वो आदमी नया है मगर सावधान है.
कई बार लगता है कि दुष्यंत बिल्कुल तात्कालिक घटनाओं पर टिप्पणी करते हुए भी एक बड़ी ग़ज़ल लिख जाते हैं. उनका निधन दिसंबर 1975 में हो गया था- यानी इमरजेंसी के उन्होंने क़रीब छह महीने देखे थे. यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने इसी दौर में इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ कुछ लिखा, लेकिन उनकी एक ग़ज़ल से गुज़रते हुए इंदिरा गांधी का भी ख़याल आता है, जयप्रकाश नारायण का भी और जन प्रतिरोध के तेवर का भी. यह ग़ज़ल कुछ इस तरह है-
‘एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर, ये तमाशा देखकर हैरान है
खास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
ये हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है
एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो
इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है
मसलहत आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी इंसान है
इस कदर पाबन्दी-ए-मजहब कि सदके आपके,
जब से आजादी मिली है मुल्क में रमजान है
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है
मुझमें रहते है करोडो लोग चुप कैसे रहूं,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है.
ख़ास बात ये है कि इन राजनीतिक ग़ज़लों के बीच दुष्यंत कहीं-कहीं सीधे कबीर हो जाते हैं- अपने तीखे कशाघातों से सत्ता-प्रतिष्ठान को लहूलुहान करने वाले. बहुत अलग तरह के ठाठ के साथ वे अपना चाबुक फटकारते हैं. यह अनायास नहीं है कि उनकी यह ग़ज़ल बार-बार उद्धृत की जाती है-
मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है.
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है.
पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है.
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते है क्षणिक उत्तेजना है.
हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है.
दोस्तो अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है.
दुष्यंत कुमार यहीं नहीं रुकते. वे अपनी ग़ज़लों को मूक-बेबस लोगों की ताक़त में बदलते हैं, परकटे परिंदों के हौसले में बदलते हैं. यहां भी उनके व्यंग्य वाले तेवर बरक़रार हैं. वे लिखते हैं-
होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिये
इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिये
गूंगे निकल पड़े हैं, ज़ुबां की तलाश में
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिये
बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन
सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिये
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये
जिसने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ
इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिये.
मुश्किल यह है कि दुष्यंत के पास ऐसी राजनीतिक ग़ज़लें इतनी ज़्यादा हैं कि उन्हें बार-बार उद्धृत करते रहने की इच्छा होती है. लेकिन दुष्यंत को मुकम्मिल तौर पर समझने के लिए हमें इससे आगे बढ़ना होगा. दुष्यंत कुमार के यहां दूसरी ख़ास बात इस सादगी के अलावा उनकी संकेतात्मकता है. बिंबों और प्रतीकों का वे जितना ख़ूबसूरत इस्तेमाल करते हैं, वह दर्शनीय है- ‘इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है / नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है / एक चिनगारी कहीं से ढूढ़ लाओ दोस्तो / इस दीए में तेल से भीगी हुई बाती तो है / निर्वचन मैदान में सोई हुई है जो नदी / पत्थरो से ओट में जा-जा के बतियाती तो है.‘
बहरहाल, दुष्यंत की तीसरी खूबी उनकी बीहड़ प्रयोगधर्मिता है. हालांकि यह प्रयोगधर्मिता इसी बात में निहित है कि उन्होंने हिंदी में ग़ज़लों को एक स्वतंत्र विधा के रूप में प्रतिष्ठित कराया, लेकिन इसका एक रूप उन प्रयोगों में दिखता है जो बड़ी सहजता के साथ वे ग़ज़लों के भीतर करते हैं. यहां भी एक उदाहरण अभीष्ट होगा-
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूं,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं.
एक जंगल है तेरी आंखों में,
मैं जहां राह भूल जाता हूं.
तू किसी रेल-सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं.
हर तरफ़ एतराज़ होता है,
मैं अगर रोशनी में आता हूं.
एक बाज़ू उखड़ गया जब से,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूं.
मैं तुझे भूलने की कोशिश में,
आज कितने क़रीब पाता हूं.
कौन ये फ़ासला निभाएगा,
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूं.
तो ये दुष्यंत हैं. बेहद सहज, बेहद मौलिक, बेहद प्रयोगधर्मी. और उनके पीछे ग़ज़लकारों की एक पूरी परंपरा है. शिव ओम अंबर, कुंवर बेचैन, सूर्यभानु गुप्त, नईम, यश मालवीय, अदम गोंडवी, हरजीत, राजेश रेड्डी, नूर मोहम्मद नूर, ज्ञान प्रकाश विवेक, बल्ली सिंह चीमा- जैसे यह असमाप्त सूची है. और इधर के वर्षों में तो कई युवा नाम हैं जो ग़ज़लों में बहुत कमाल का काम कर रहे हैं. कहना मुश्किल है कि अगर दुष्यंत न होते तो इस परंपरा का क्या होता.
लेकिन यहीं से आलोचना के लिए जगह बनती है. क़ायदे से हिंदी आलोचना ने दुष्यंत कुमार पर ढंग से विचार किया होता, उसकी जगह और अवस्थिति तय करने की कोशिश की होती, उसकी कविता के और भी रंग खोजने का प्रयास किया होता, उसकी अर्थबहुलता की और भी तहें निकाली होतीं तो शायद दुष्यंत का यह दुरुपयोग मुमकिन नहीं हो पाता. फिलहाल यही सच है कि दुष्यंत इन चीज़ों से परे हैं. वे सही मायनों में जनता के शायर हैं- जनता की ज़ुबान में उसकी बात कहते हैं- इश्क़ से इंकलाब तक. उनकी शायरी हिंदी की एक निधि है जिसका मोल ठीक से समझा जाना बाक़ी है.
सच तो यह है कि वे उनकी पूरी शायरी में एक गहरी मनुष्यता थी. उनकी ग़ज़ल कहीं से भी उठा लें, उसमें निजी संताप जितने भी दिखें, राजनीतिक ताप जितना भी नज़र आए, लेकिन उन सबके बीच एक गहरी मानवीय अपील ज़रूर मिलती है. उन जैसा शायर ही लिख सकता है-
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा
यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा
ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परीशां हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा
तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं,ऐसा हुआ होगा
यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा
चलो, अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें
कम-अज-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा.














