महासचिव का चुनाव होगी संयुक्त राष्ट्र की अगली बड़ी परीक्षा, क्या होंगी उम्मीदें

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ऐनालेना बेयरबॉक

इस साल, एक दशक बाद पहली बार संयुक्त राष्ट्र अपने नए महासचिव का चयन करेगा. यह अहम प्रक्रिया ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रही है. इनमें बढ़ते भू-राजनैतिक तनाव, गहराता जलवायु संकट और डिजिटल तकनीक की तेज़ प्रगति शामिल हैं.ये हमारे काम करने, संवाद करने और समाज के रूप में जीने के तौर-तरीक़ों को बदल रही हैं.

दुनिया को कैसा संयुक्त राष्ट्र चाहिए

आज दुनिया को शायद पहले से कहीं अधिक संयुक्त राष्ट्र की ज़रूरत है, मगर  इन सीमारहित चुनौतियों से निपटने के लिए बनाए गए बहुपक्षीय तंत्रों पर भारी दबाव है. वहीं, संयुक्त राष्ट्र को भी, अपनी 80वीं वर्षगांठ पर दुनिया की ज़रूरत है, क्योंकि जब अधिक लोगों आवाज़ें सुनी जाती हैं और अधिक दृष्टिकोण शामिल किए जाते हैं, तो इस विश्व संगठन के काम की वैधता और प्रभावशीलता दोनों मज़बूत होती हैं. यही भावना इस सत्र के लिए चुने गए विषय में भी झलकती है- एक साथ बेहतर.

इसी पृष्ठभूमि में 2025–2026 की महासचिव चयन प्रक्रिया केवल एक औपचारिक पड़ाव नहीं है. यह आत्ममंथन का एक अहम अवसर है. यह उन मूल सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को फिर से मज़बूत करने का समय भी है, जो हमें एक साथ जोड़ते हैं. तो संयुक्त राष्ट्र को इसके 80वें वर्ष से आगे भविष्य की ओर ले जाने वाला नेतृत्व कैसा होना चाहिए?

दुनिया की नज़र अगले महासचिव पर है, जिनसे उम्मीद है कि वे संयुक्त राष्ट्र के तीन मुख्य स्तंभों- शान्ति व सुरक्षा, मानवाधिकार और विकास को आगे बढ़ाने के लिए मज़बूत और समर्पित नेतृत्व करेंगे. इसके साथ ही उनसे यह भी अपेक्षा है कि वे संयुक्त राष्ट्र को आज की वास्तविकताओं और आने वाले कल की चुनौतियों के अनुरूप ढालेंगे.

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नई दिल्ली में विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर के साथ संयुक्त राष्ट्र महासचिव चुनाव और अन्य मसलों पर बात करतीं यूएन महासभा की प्रमुख ऐनालेना बेयरबॉक.

महासचिव पद के उम्मीदवारों के साथ संवाद

उम्मीदवारों के साथ 21 अप्रैल से शुरू हुए संवाद, एक अनोखा अवसर प्रदान करते हैं. उम्मीदवार, इन संवादों के ज़रिए, इस संगठन के भविष्य के लिए अपना दृष्टिकोण सामने रखेंगे, जबकि सदस्य देशों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को, उनसे सीधे सवाल पूछने और बातचीत करने का मौक़ा मिलेगा.

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इन संवादों का सीधा प्रसारण यूएन WebTV पर किया जाएगा. इसमें हर उम्मीदवार की सोच, क्षमता और प्राथमिकताएं सामने आएंगी और जवाबदेही को भी मज़बूती मिलेगी. संयुक्त राष्ट्र, नागरिक समाज को शामिल करके यह संकेत दे रहा है कि बहुपक्षवाद का भविष्य बंद कमरों में होने वाले विचार-विमर्श पर नहीं, बल्कि व्यापक भागेदारी पर निर्भर करता है. यह सुनने, सवाल करने व इस संस्था में भरोसे को अधिक गहरा करने का अवसर है, ऐसे समय में जब भरोसा नाज़ुक भी है और बेहद ज़रूरी भी. इसीलिए यह संवाद अवसर, एक पारदर्शी और समावेशी चयन व नियुक्ति प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए बेहद अहम हैं, साथ ही महासभा की महत्वपूर्ण भूमिका को भी बनाए रखते हैं. इसके साथ-साथ, यह पूरी प्रक्रिया सोशल मीडिया मंचों पर भी उपलब्ध होगी, ताकि इसे अधिक सुलभ, जीवंत और जानकारीपूर्ण तरीक़े से लोगों तक पहुंचाया जा सके. 

यह केवल जानकारी देने भर की बात नहीं है. यह समझ बढ़ाने और उन लोगों से जुड़ने का प्रयास भी है, जो राजनैतिक रूप से जागरूक तो हैं, लेकिन अभी बहुपक्षीय व्यवस्था से पूरी तरह नहीं जुड़े हैं. इस प्रक्रिया को सरल और स्पष्ट रूप में, एक जोशीले व आधुनिक नज़रिए के साथ सामने रखने का उद्देश्य, आम नागरिकों और भविष्य के राजनयिकों, दोनों को प्रेरित करना है. ताकि वे संयुक्त राष्ट्र के काम को समझें, उसका समर्थन करें, उसके लिए आवाज़ उठाएं और उसे अगली पीढ़ी तक आगे बढ़ाएं. 

संयुक्त राष्ट्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कितना है

अगले महासचिव का चयन एक ऐसी सच्चाई की ओर ध्यान दिलाने का अवसर भी है, जिसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. दुनिया की आधी आबादी महिलाएं और लड़कियां हैं, लेकिन वैश्विक नेतृत्व में यह सच्चाई बहुत कम दिखाई देती है. 80 वर्षों में, मैं महासभा की अध्यक्ष के रूप में सेवारत केवल पांचवीं महिला हूँ. इस समय महासभा में स्थायी प्रतिनिधियों के पदों पर केवल 22 फीसदी महिलाएं हैं. अब तक संयुक्त राष्ट्र महासचिव के पद पर कोई महिला नहीं रही है. हम किसे चुनते हैं, उससे एक मज़बूत सन्देश जाएगा कि हम कौन हैं और क्या हम वास्तव में दुनिया के सभी लोगों की सेवा करते हैं, जबकि दुनिया भर में आधी आबादी महिलाओं की है. 

यह निर्णय केवल सतत विकास लक्ष्य 5, यानि लैंगिक समानता को लागू करने का मामला नहीं है. यह उस संस्था की विश्वसनीयता का भी सवाल है, जो समान अधिकारों की बात करती है. ऐसे क्षण हमें ज़रा ठहरने, सोचने और यह कल्पना करने का अवसर देते हैं कि अगर नेतृत्व वास्तव में उसी दुनिया का प्रतिबिंब हो, जिसकी सेवा के लिए वह है, तो वह कैसा होना चाहिए. एक ऐसी दुनिया, जहां महिलाएं और पुरुष बराबरी के साथ नेतृत्व करें. एक ऐसी दुनिया, जहां पारदर्शिता केवल वादा नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा हो.

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'साथ मिलकर बेहतर' का विचार तभी अर्थपूर्ण बनता है, जब हम उसे एक वास्तविकता बनाएं, हम किसकी बात सुनते हैं, हम प्रगति के प्रतीक के रूप में किसे चुनते हैं और आगे की राह दिखाने के लिए किस पर विश्वास करते हैं. अगले महासचिव सभी देशों और सभी लोगों की आवाज़ होंगे. यह चयन केवल आज की दुनिया का प्रतिबिंब नहीं होगा, बल्कि उस भविष्य की दिशा भी तय करेगा, जिसे हम साथ मिलकर गढ़ेंगे, साथ मिलकर बेहतर.

(डिस्क्लेमर: लेखक संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं हैं.)

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