बिहार में पहली बार “फूलछाप”, सम्राट चौधरी को सीएम बनाने का राज क्या है?

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Dharmendra Singh

राजनीति गणित की सीधी-सादी किताब नहीं है, जहां हर सवाल का एक तय जवाब हो. यहां समीकरण बदलते रहते हैं, और परिस्थितियाँ नई अंगड़ाई लेती रहती हैं. कुछ ऐसा ही हाल बिहार में देखने को मिला. करीब 21 साल तक नीतीश कुमार को हराने और मुख्यमंत्री पद से हटाने की कोशिशें होती रहीं, लेकिन वे अपनी चाणक्य नीति से कभी डगमग नहीं हुए. हालांकि, अचानक राजनीति की ऐसी बयार चली कि उन्होंने राज्यसभा जाने का मन बनाया और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. यह बदलाव आसान नहीं, बल्कि एक बड़ी पहेली है. यह कैसे हुआ और कितना दीर्घकालिक या तात्कालिक है, इस पर से शायद ही पूरी तरह पर्दा उठ पाए.

नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री पद सम्राट चौधरी के पास चला जाएगा, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था. यह पहली बार हो रहा है कि बिहार की राजनीति में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने की स्थिति बन रही है. हालांकि, प्रदेश में नंबर वन पार्टी रहते हुए भी बीजेपी ने लंबे समय तक धैर्य और त्याग का परिचय दिया. राजनीति के इस व्याकरण को समझना आसान नहीं है. बीजेपी के साथ गठबंधन में दो बार जेडीयू को कम सीटें मिलने के बावजूद नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने रहे. दूसरी ओर, सम्राट चौधरी ने कसम खाई थी कि जब तक वे नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाएंगे, तब तक अपनी पगड़ी नहीं उतारेंगे. नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी के बाद वे फिर मुख्यमंत्री बने और सम्राट चौधरी को पगड़ी उतारनी पड़ी. लेकिन राजनीति ने एक बार फिर करवट ली, और अंततः सम्राट चौधरी की मनोकामना पूरी होती दिखाई दी.

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सम्राट चौधरी को क्यों मिला मुख्यमंत्री पद?

सम्राट चौधरी एक अनुभवी और संगठनात्मक रूप से मजबूत नेता हैं. पार्टी में उन्हें प्रभावशाली चेहरा माना जाता है. 2020 में जब एनडीए की सरकार बनी थी, तब उन्हें उपमुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था. लेकिन जब नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होकर लालू प्रसाद यादव की पार्टी के साथ सरकार बनाई, तब बीजेपी ने उनकी राजनीतिक काट के रूप में सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाया. इसका एक बड़ा कारण सामाजिक समीकरण भी था. बिहार में यादव (लगभग 14%) के बाद कुर्मी, कुशवाहा और धानुक समुदाय की संयुक्त आबादी करीब 10% मानी जाती है. इनमें कुशवाहा (कोइरी) समुदाय की संख्या अपेक्षाकृत अधिक मानी जाती है. नीतीश की वापसी के बाद सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा को उपमुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन ओबीसी राजनीति के वर्चस्व के कारण सम्राट चौधरी को अधिक महत्व मिला. बीजेपी की रणनीति हमेशा अपने पैरों पर खड़ा होना और अपने राजनीतिक एजेंडे को लागू करना रही है, इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए आगे किया गया.

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बिहार में बीजेपी की सफल रणनीति

बिहार के चाणक्य नीतीश कुमार माने जाते हैं, वहीं अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है. नीतीश कुमार का इतनी आसानी से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना भले सुनने में सरल लगे, लेकिन राजनीति के इतने माहिर खिलाड़ी को इसके लिए राजी करना अपने आप में बड़ी बात है. अमूमन जब भी सरकार या मुख्यमंत्री पद पर संकट आता था, तो नीतीश कुमार राजनीतिक पलटवार करते थे, कभी बीजेपी का दामन थामते थे, तो कभी लालू प्रसाद यादव का साथ लेते थे. लेकिन इस बार स्थिति अलग दिखती है. बीजेपी के तथाकथित “ऑपरेशन कमल” में न कोई बड़ा हंगामा हुआ, न खुला मतभेद सामने आया और न ही किसी तरह की राजनीतिक पलट की जरूरत पड़ी. बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि नीतीश कुमार ने केवल इस्तीफा ही नहीं दिया, बल्कि सत्ता का हस्तांतरण सहज तरीके से बीजेपी को कर दिया. भले ही बिहार में सत्ता परिवर्तन हो गया हो, लेकिन नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना अब भी बिहार और देश की राजनीति के लिए एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है लेकिन एक बात साफ है कि आखिरकार बीजेपी की तपस्या सफल हुई.

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सामाजिक समीकरण का जाल

बिहार की राजनीति में जातीय संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है. 1990 के बाद से ओबीसी राजनीति का दबदबा बढ़ा है. बीजेपी ने भी सोशल इंजीनियरिंग पर जोर देते हुए ओबीसी नेताओं को आगे बढ़ाया और गठबंधन की राजनीति के जरिए समीकरण साधे. इसी रणनीति के तहत कभी लालू प्रसाद यादव को सत्ता से हटाने के लिए नीतीश कुमार के साथ गठबंधन किया गया. फिर बिहार में ये बात साबित हुई कि नीतीश के बिना न कोई गठबंधन चुनाव जीत सकता है और न ही कोई सरकार बना सकता है. नीतीश जिधर गये उसी गठबंधन की जीत हुई और सरकार बनी. अब इस राजनैतिक हलचल में न तो नीतीश और न ही बीजेपी ये रिस्क लेने को तैयार है कि मुख्यमंत्री कुर्मी/कुशवाहा जाति छोड़कर अन्य जाति के पाले में जाए? आखिरकार इसी बात को ध्यान में रखकर सम्राट चौधरी को मुख्यमत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया. बिहार में पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़े वर्ग की संख्या करीब 63 फीसदी है. दलित करीब 19.65 फीसदी और सामान्य जाति की जनसंख्या 15.52 फीसदी है.

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उत्तर प्रदेश के चुनाव पर नजर

बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति एक जैसी ही ही, जहां जाति और धर्म कार्ड खेला जाता है. जो समीकरण बिहार में यादव बनाम कुर्मी और कुशवाहा की है वही समीकरण कमोबेश उत्तर प्रदेश में भी है. बिहार में बदलाव का असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी पड़ सकता है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. 2017 में केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की थी, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बने. उत्तर प्रदेश में भी कुर्मी और कुशवाहा (मौर्य, शाक्य, सैनी, पटेल, गंगवार, कटियार, वर्मा आदि) की बड़ी आबादी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में इन समुदायों के कुछ हिस्सों में नाराजगी की चर्चा रही. जिसका नतीजा बीजेपी को प्रदेश में भुगतना पड़े, ऐसे में बिहार में इस तरह का नेतृत्व संतुलन बनाना, कहीं न कहीं उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर भी लिया गया कदम माना जा सकता है.

यह बदलाव बिहार बीजेपी की लंबी रणनीति और सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश का नतीजा माना जा सकता है. इसके जरिए बीजेपी ने बिहार की सत्ता में अपनी मजबूत और निर्णायक भूमिका स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है.

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह, राजनैतिक और चुनाव विश्लेषक हैं

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