माओवाद के लंबे दौर के बाद बस्तर आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है. सुरक्षा बलों और सरकार की लगातार कार्रवाइयों के बाद जिस क्षेत्र में दशकों तक बंदूक की आवाज़ गूंजती थी, वहां अब एक नए भविष्य की चर्चा शुरू हुई है. लेकिन असली सवाल यह है कि इस 'आज़ादी' का अर्थ क्या होगा? क्या बस्तर सिर्फ़ खनन कंपनियों और बड़े उद्योगों का नया केंद्र बनेगा, या यहां के आदिवासियों को उनकी संस्कृति, जंगल और संसाधनों के साथ सम्मानजनक जीवन का अवसर मिलेगा?
आदिवासियों के जीवन में बांस
बस्तर की पहचान सदियों से उसके जंगलों और विशेष रूप से बांस से रही है. कहा जाता है कि 'बस्तर' नाम ही 'बांस तरी' से निकला है, यानी बांसों के बीच बसा भूभाग. विडंबना यह है कि जिस बांस से यह धरती पहचानी जाती है, वही बांस यहां के लोगों की स्थायी आय का साधन नहीं बन पाया. पड़ोसी महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में आदिवासी बांस बेचकर अच्छी कमाई कर रहे हैं, जबकि माओवादियों के प्रभाव के दौर में बस्तर के इलाकों में बांस का व्यापार ही ठप रहा.
अब समय आ गया है कि बस्तर बांस को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय उससे स्थानीय उद्योग खड़े करे. आज देश में बांस से कपड़ा बनाने का काम बड़े उद्योग घरानों द्वारा रसायनों की मदद से किया जा रहा है, लेकिन वह मॉडल बस्तर के लिए उपयुक्त नहीं दिखता. वहां आवश्यकता है छोटे, ग्राम आधारित और श्रमप्रधान उद्योगों की, जिनमें स्थानीय लोगों की भागीदारी हो और लाभ भी उन्हीं तक पहुंचे.
बस्तर में भोजन और आवास की पारंपरिक व्यवस्था आज भी काफी हद तक आत्मनिर्भर है. लोग अपने लिए चावल, कोदो और कुटकी जैसी फसलें उगा लेते हैं. जंगल घर बनाने का अधिकांश सामान दे देता है. लेकिन कपड़े के लिए उन्हें बाज़ार पर निर्भर रहना पड़ता है. पहले यहां लाल पाड़ वाली सफेद पाटा साड़ियों और कोसा सिल्क की परंपरा थी, जो अब धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. मिलों में बने सस्ते कपड़ों ने स्थानीय हथकरघे को पीछे धकेल दिया.
बांस के बीच से निकल सकती है विकास की राह
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बस्तर अपनी नई आर्थिक राह हथकरघे और ग्रामोद्योग के माध्यम से खोज सकता है? क्या गांव-गांव में छोटे स्तर पर बांस से धागा बनाकर खादी जैसी मोटी लेकिन टिकाऊ वस्त्र सामग्री तैयार की जा सकती है? टेक्सटाइल विशेषज्ञ डॉक्टर अरिंदम बसु का मानना है कि यह आसान नहीं होगा, लेकिन प्रयोग ज़रूरी है, खासकर तब जब उद्देश्य केवल मुनाफा नहीं बल्कि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार देना हो.
बस्तर की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामुदायिक परंपराएं हैं. गोटुल जैसी संस्थाओं में बुजुर्ग आज भी युवाओं को बांस से टोकरी और चटाई बनाना सिखाते हैं. सरकार ने भी कुछ क्षेत्रों में बांस आधारित कुटीर उद्योगों की पहल की है. यदि इन्हीं प्रयासों को आधुनिक तकनीक और बाज़ार से जोड़ा जाए, तो बस्तर में एक वैकल्पिक विकास मॉडल उभर सकता है. लेकिन आर्थिक विकास की इस चर्चा के बीच आदिवासियों की सबसे बड़ी चिंता जंगल और जमीन पर अधिकार की है. साल 2017 में कानून बदलने के बाद बांस को पेड़ के बजाय घास का दर्जा दिया गया, इससे ग्राम सभाओं की भूमिका बढ़नी चाहिए थी. महाराष्ट्र में कई जगह ग्राम सभाएं ही बांस का प्रबंधन करती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में अभी भी वन विभाग का नियंत्रण अधिक दिखाई देता है.
अबूझमाड़ के ग्रामीणों की सबसे पहली मांग यही है कि जंगल पर उनका अधिकार बढ़े और वन विभाग की 'जमींदारी' कम हो. यही वह असंतोष था जिसने कभी माओवादी आंदोलन को आधार दिया. कई आदिवासी नेताओं का कहना रहा है कि उनकी लड़ाई किसी वैचारिक क्रांति से अधिक जंगल और संसाधनों पर अधिकार की लड़ाई थी. दूसरी बड़ी चिंता खनन को लेकर है. बस्तर के लोग विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन वह चाहते हैं कि खनन परियोजनाओं में उनकी सहमति और हिस्सेदारी दोनों सुनिश्चित हों. वे अपने पवित्र पहाड़ों और सांस्कृतिक स्थलों को बचाना चाहते हैं. ग्राम सभा की अनुमति के बिना खनन न हो, यह मांग अब और तेज़ होगी.
क्या बस्तर में सफल हो सकता है सहकारी मॉडल
माओवादी दौर के बाद आत्मसमर्पण करने वाले कई युवा अब अपने गांव लौटना चाहते हैं. लेकिन उन्हें शहरों के काम जैसे वेल्डिंग, ड्राइविंग या राजमिस्त्री के सिखाए जा रहे हैं, जिनका जंगल आधारित जीवन में सीमित उपयोग है. ऐसे में हथकरघा, बांस उद्योग और वनोपज प्रसंस्करण जैसे स्थानीय रोजगार कहीं अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं.
बस्तर की अर्थव्यवस्था केवल बांस तक सीमित नहीं है. महुआ, इमली और अन्य वनोपजों का स्थानीय प्रसंस्करण ग्रामीणों की आय कई गुना बढ़ा सकता है. आज आदिवासी महुआ बहुत कम दाम पर बेच देते हैं, जबकि यदि सहकारी मॉडल के तहत स्थानीय स्तर पर उसके उत्पाद बनाए जाएं तो आय में भारी वृद्धि संभव है. असल चुनौती यह है कि बस्तर को केवल सुरक्षा की दृष्टि से नहीं बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की दृष्टि से देखा जाए. यदि विकास का मॉडल स्थानीय संसाधनों, ग्राम सभाओं और कुटीर उद्योगों पर आधारित होगा तो यह क्षेत्र वास्तव में 'आज़ाद' महसूस करेगा. अन्यथा केवल बंदूकें शांत हो जाने से शांति स्थायी नहीं होगी. बस्तर को ऐसी राह चाहिए जिसमें जंगल भी बचे, संस्कृति भी बचे और लोगों को सम्मानजनक रोजगार भी मिले. यही असली आज़ादी होगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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