माओवादियों के जाने के बाद छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में क्या होगा, क्या आदिवासी धर्म के नाम पर लड़ेंगे

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शुभ्रांशु चौधरी

इस हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश को यथावत रखा कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, बौद्ध या सिख धर्म से किसी अन्य धर्म में मतांतर करता है तो उसकी अनुसूचित जाति की मान्यता रद्द हो जाएगी. मध्य भारत के आदिवासी इलाकों में भी ईसाई धर्म में मतांतर करने वालों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दिए जाने की मांग काफ़ी समय से की जा रही है. पर इस विषय पर कोर्ट ने कहा: संविधान का अनुसूचित जनजाति आदेश, 1950 धर्म-आधारित अपवर्जन (बाहर रखने) का निर्धारण नहीं करता है. अतः, अनुसूचित जनजाति की स्थिति का निर्धारण केवल धर्मांतरण के आधार पर नहीं किया जा सकता है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि क्या दावेदार अभी भी जनजातीय पहचान के आवश्यक गुणों को धारण करता है जिसमें प्रथागत व्यवहार, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित जनजातीय समुदाय द्वारा स्वीकृति शामिल है. जहां धर्मांतरण या उसके बाद का आचरण जनजातीय जीवन शैली से पूर्ण विच्छेद और सामुदायिक मान्यता की हानि का परिणाम बनता है, वहां अनुसूचित जनजाति की स्थिति का आधार समाप्त हो जाएगा.

यह आदेश आगे अनुसूचित जनजाति को इस तरह परिभाषित करता है: जनजाति को एक ऐसे सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित किया गया है, जहां सदस्य एक समान बोली बोलते हैं, उनकी स्वशासन की व्यवस्था होती है और वे एक सामान्य उद्देश्य के लिए मिलकर काम करते हैं, जैसा कि केरल राज्य बनाम चंद्रमोहन (2004) के मामले में परिभाषित किया गया था.

आदिवासियों में धर्मांतरण

मध्य भारत में गोंड जनजाति के सामाजिक नेता ईसाई मतांतरित लोगों पर ऐसा ही आरोप लगाते हैं कि मतांतरण के बाद वे अब प्रथागत व्यवहार का बहिष्कार कर जनजातीय जीवन शैली से अलग थलग हो रहे हैं. उदाहरण स्वरूप वे कहते हैं कि आदिवासी गांवों में ग्राम देवी को समर्पित जंगल को भी वे काट दे रहे हैं और परंपरागत त्योहारों में शामिल नहीं होते और अपने पुराने देवी-देवताओं को शैतान कहते हैं. इसलिए उनकी अनुसूचित जनजाति की मान्यता समाप्त कर देनी चाहिए. 

अगले हफ़्ते मध्य भारत का आदिवासी क्षेत्र 45 साल पुरानी माओवादी समस्या की समाप्ति का जश्न मनाएगा. लेकिन जश्न के इस माहौल में भी आदिवासी समाज इस नई समस्या से विभाजित नज़र आता है. पिछले हफ़्ते माओवादियों की तथाकथित पूर्व राजधानी अबूझमाड़ के कुतुल गांव से लौटते समय मैं कांकेर जिले के बड़े तेवड़ा गांव में धर्मांतरित राजमन सलाम के परिवार से मिला. उनके पिता की लाश को गांव के आदिवासी समाज के लोगों ने पुलिस की मदद से उखाड़ दिया था. राजमन आज भी फ़रार हैं.

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अबूझमाड़ में ईसाई धर्म का प्रभाव

अबूझमाड़ में लोगों ने बताया वहां 60 फीसदी से अधिक लोग ईसाई धर्म में मतांतरित हो चुके हैं हालांकि अबूझमाड़ अब धीरे धीरे खुल रहा है. लेकिन इस आंकड़े की पुष्टि अभी तो नहीं की जा सकती पर लोगों ने कहा हमें ऐसा लग रहा है हम आज़ाद हो रहे हैं पर जैसा भारत की आज़ादी के समय हुआ था हमारा समाज धर्म के आधार पर विभाजित हो गया है. लोगों का कहना था कि डर वन विभाग और माइनिंग से डर है. समाज को इससे मिलकर लड़ना चाहिए. हमारे आगे की लड़ाई आर्थिक विकास के लिए होनी चाहिए. लेकिन हम अब आपस में धर्म के नाम पर भी लड़ेंगे ऐसा लगता है. 

उन्होंने कहा नो माइनिंग तो शायद संभव नहीं होगा पर हमें माइनिंग में मालिकाने की लड़ाई लड़नी होगी.यदि इसमें हम सफल हुए तो इससे हमारी आर्थिक समस्याएं बहुत हद तक दूर हो सकेंगी. अबूझमाडिया समाज अब 2009 के पहले के अबूझमाड़ में घुसने के प्रतिबंध की मांग भी कर रहा है. वे अब वनाधिकार के पर्यावास के अधिकार का आवेदन भी करेंगे जिससे अबूझमाड़ का भविष्य अबूझमाड़िया ही तय कर सके. अब धीरे-धीरे हिंसा से विस्थापित परिवार भी वापस लौटने लगे हैं 

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क्या चाहते हैं अबूझमाड़ के आदिवासी

आज़ादी का मतलब खुलापन भी होता है पर अबूझमाड़िया अब स्वयं को फिर से संरक्षित करना चाहते हैं. वे कहते हैं बाहरियों से उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा है चाहें वे माओवादी हों या उसके पहले के लोग. वे चाहते हैं कि अबूझमाड़ के ओर्गेनिक उत्पाद को सही दाम मिले. महुआ, चिरौंजी, साल बीज जैसे लघु वन उत्पादों को सिर्फ बेच देने की बजाय अधिक दाम के लिए अबूझमाड़ रुरल सेंटर वहीं बनाकर प्रोसेसिंग की जाए. लेकिन अब आर्थिक चर्चाओं में भी धार्मिक रंग चढ़ गया है.

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ने भी कहा है कि 31 मार्च के बाद केंद्र के सुरक्षा बलों को वापस भेजकर कैम्पों को अस्पताल और विकास केंद्रों में बदला जाएगा. 

माओवादियों के जाने के बाद क्या होगा

धर्मांतरित आदिवासी शराब नहीं पीते, इसलिए वे महुए का फूल बेचते हैं पर ग़ैर धर्मांतरित बाज़ार से और शराब बनाने के लिए महुआ ख़रीदते भी हैं, ऐसा मुझे बताया गया. धर्मांतरित आदिवासियों का चर्च के प्रभाव से शिक्षा की ओर अधिक रुझान है पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में कहानी उल्टी है. कुछ को छोड़ सभी धर्मांतरित लोगों ने मुझे यह बताया कि वे इसलिए ईसाई बने क्योंकि ईसा मसीह ने उनकी या उनके किसी की जान बचाई थी जब वे बीमार पड़े थे. एक ने कहा ईसा मसीह ने उनकी बुआ को जेल से छुड़ाया था. 

अबूझमाड़ कई दशकों बाद आज़ाद हो रहा है तो अबूझमाड़ अब आगे कैसे बढ़ेगा, उसका संविधान कैसा होगा इस पर भी चर्चा हो रही है. एक पास्टर ने मुझे बताया कि यह भी बैठकें हो रही हैं कि धर्मांतरित लोगों की और पिटाई कैसे होगी और उन्हें गांव से कैसे निकाला जाएगा. भारत की आज़ादी के समय हिंदू मुस्लिम दंगों पर एक शायर ने लिखा था जिसकी याद आ गई, ''ये दाग़ दाग़ उज़ाला, ये सब गुज़िदा सहर, ये वो सुबह तो नहीं जिसका इंतज़ार था''

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(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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