शेयर बाज़ार में उतरने की तैयारी में पटना नगर निगम, जान लीजिए क्यों है यह बड़ा कदम

पटना नगर निगम की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ रही हैं. शहर की आबादी बढ़ने के साथ सड़क, नाला, जलापूर्ति, कचरा प्रबंधन, स्ट्रीट लाइट और सफाई व्यवस्था पर खर्च भी बढ़ गया है. लेकिन आय के स्रोत सीमित हैं.

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पटना:

पटना नगर निगम को लेकर एक नई और बड़ी योजना पर चर्चा शुरू हो गई है. खबर है कि राजधानी पटना के शहरी विकास को नई रफ्तार देने के लिए पटना नगर निगम को शेयर बाज़ार से जोड़ने की तैयारी की जा रही है. अगर यह योजना साकार होती है, तो यह बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक नया और अलग तरह का प्रयोग होगा. इसका मकसद शहर के विकास कार्यों के लिए अतिरिक्त पैसा जुटाना और नगर निगम को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना बताया जा रहा है.

दरअसल, पटना नगर निगम की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ रही हैं. शहर की आबादी बढ़ने के साथ सड़क, नाला, जलापूर्ति, कचरा प्रबंधन, स्ट्रीट लाइट और सफाई व्यवस्था पर खर्च भी बढ़ गया है. लेकिन आय के स्रोत सीमित हैं. होल्डिंग टैक्स, सरकारी अनुदान और कुछ स्थानीय शुल्क से मिलने वाली राशि शहर की जरूरतों के मुकाबले कम पड़ जाती है. इसी कमी को पूरा करने के लिए अब नए वित्तीय विकल्प तलाशे जा रहे हैं. शेयर बाज़ार में उतरने का मतलब यह नहीं है कि नगर निगम सीधे अपने शेयर आम लोगों को बेच देगा. जानकारों के अनुसार, इसके लिए नगर निगम की एक अलग इकाई या स्पेशल पर्पज व्हीकल (SPV) बनाई जा सकती है. यह इकाई नगर निगम के कुछ खास प्रोजेक्ट्स—जैसे पार्किंग, ठोस कचरा प्रबंधन या जलापूर्ति  से जुड़ी होगी. इसी इकाई के जरिए पूंजी बाज़ार से पैसा जुटाने की योजना पर विचार किया जा रहा है.

सरकार और प्रशासन का मानना है कि इस कदम से नगर निगम की कार्यशैली में पारदर्शिता आएगी. जब कोई संस्था शेयर बाज़ार से जुड़ती है, तो उसे अपने खर्च, आय और योजनाओं का पूरा हिसाब देना पड़ता है. इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और पैसे का सही इस्तेमाल सुनिश्चित होगा. साथ ही, निवेशकों का दबाव नगर निगम को बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करेगा. इस योजना के कई फायदे गिनाए जा रहे हैं. शेयर बाज़ार से जुटाई गई राशि का इस्तेमाल नई सड़कों के निर्माण, ड्रेनेज सिस्टम सुधारने, स्मार्ट पार्किंग, आधुनिक कचरा प्रबंधन और जलापूर्ति को बेहतर बनाने में किया जा सकता है. इससे शहर की बुनियादी सुविधाओं में सुधार होगा और पटना को एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित करने में मदद मिलेगी.

हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर चिंताएं भी सामने आ रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि नगर निगम की आर्थिक स्थिति अभी बहुत मजबूत नहीं है. टैक्स वसूली की दर कम है और कई इलाकों में होल्डिंग टैक्स ही तय नहीं हो पाया है. ऐसे में निवेशकों का भरोसा जीतना आसान नहीं होगा. यह भी डर जताया जा रहा है कि भविष्य में घाटा होने की स्थिति में इसका बोझ आम नागरिकों पर न डाला जाए.

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर बहस तय मानी जा रही है. विपक्ष का कहना है कि नगर निगम कोई मुनाफा कमाने वाली कंपनी नहीं है, बल्कि जनता को सेवाएँ देने वाली संस्था है. ऐसे में इसे शेयर बाज़ार से जोड़ना ठीक नहीं है. वहीं, सरकार का तर्क है कि यह निजीकरण नहीं, बल्कि विकास के लिए एक वैकल्पिक वित्तीय मॉडल है.

कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया भी आसान नहीं है. इसके लिए राज्य सरकार की मंजूरी के साथ-साथ केंद्र सरकार और सेबी जैसे नियामक संस्थानों की स्वीकृति भी जरूरी होगी. इसके अलावा, नगर निगम के लेखा-जोखा को पूरी तरह दुरुस्त करना होगा, ताकि निवेशकों को स्पष्ट और भरोसेमंद जानकारी दी जा सके.

कुल मिलाकर, पटना नगर निगम को शेयर बाज़ार से जोड़ने की योजना एक साहसिक और नया प्रयोग है. यह प्रयोग अगर सही योजना और पारदर्शिता के साथ किया गया, तो पटना के शहरी विकास में बड़ा बदलाव ला सकता है. लेकिन अगर जल्दबाजी या अधूरी तैयारी के साथ कदम उठाया गया, तो इसके नतीजे उलटे भी हो सकते हैं. आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह योजना हकीकत बनती है या सिर्फ चर्चा तक ही सीमित रह जाती है.

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