नीतीश कुमार दिल्ली चले, तो बिहार में JDU की कमान कौन संभालेगा ? चार दावेदार

जेडीयू के भीतर कई ऐसे नेता हैं जो लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं और संगठन में मजबूत पकड़ रखते हैं. इनमें सबसे प्रमुख नाम संजय झा का माना जा रहा है. संजय झा को नीतीश कुमार का बेहद करीबी माना जाता है. संगठन और रणनीति दोनों स्तरों पर उनकी भूमिका अहम रही है.

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नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से अब JDU के भविष्य पर चर्चा शुरू
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  • नीतीश कुमार दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होने की संभावना के कारण जेडीयू नेतृत्व को लेकर चर्चा तेज हुई है
  • JDU के भीतर संजय झा, ललन सिंह, अशोक चौधरी और विजय चौधरी जैसे कई अनुभवी नेता नेतृत्व के दावेदार माने जा रहे हैं
  • संजय झा नीतीश कुमार के करीबी और संगठनात्मक रणनीति में अहम भूमिका निभाने वाले नेता हैं
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पटना:

बिहार की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आता हुआ दिखाई दे रहा है. लंबे समय तक राज्य की सत्ता और राजनीति के केंद्र में रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब दिल्ली की राजनीति की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं. राज्यसभा जाने की उनकी इच्छा और उससे जुड़ी राजनीतिक हलचल ने बिहार में एक नई चर्चा शुरू कर दी है. सवाल यह उठ रहा है कि अगर नीतीश कुमार दिल्ली चले जाते हैं, तो बिहार में जनता दल यूनाइटेड की कमान कौन संभालेगा.करीब दो दशकों से बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार एक स्थिर और प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित रहे हैं. उन्होंने विकास, सुशासन और सामाजिक संतुलन की राजनीति के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई. इसी वजह से जेडीयू की पहचान भी काफी हद तक उनके नाम से जुड़ी रही है. ऐसे में उनके दिल्ली जाने की संभावना पार्टी के भीतर एक स्वाभाविक सवाल खड़ा करती है कि आगे का नेतृत्व किसके हाथ में होगा.

JDU को संभालने के लिए कई दावेदार

 संजय झा नीतीश कुमार के करीबी रहे हैं

जेडीयू के भीतर कई ऐसे नेता हैं जो लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं और संगठन में मजबूत पकड़ रखते हैं. इनमें सबसे प्रमुख नाम संजय झा का माना जा रहा है. संजय झा को नीतीश कुमार का बेहद करीबी माना जाता है. संगठन और रणनीति दोनों स्तरों पर उनकी भूमिका अहम रही है. पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के कई बड़े फैसलों और राजनीतिक संवाद में उनकी सक्रिय भागीदारी देखी गई है. इसलिए अगर संगठनात्मक नेतृत्व की बात आती है, तो संजय झा एक मजबूत विकल्प माने जा रहे हैं. हालांकि, पिछले कुछ दिनों में संजय झा दिल्ली में जायदा सक्रिए रहे है और उनकी नज़दीकिया भाजपा नेतावो से भी काफ़ी बढ़ी है. नीतीश कुमार के करीबी होने से पहले वो अरुण जेटली के खासे विश्वासपात्र थे और एक समय उन्हें भाजपा और जेडीयू के बीच का सेतु माना जाता था.

ललन सिंह भी हैं प्रबल दावेदार 

दूसरा बड़ा नाम ललन सिंह का है, जो जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं और पार्टी के पुराने नेताओं में गिने जाते हैं. नीतीश कुमार पे पुराने मित्र भी है ललन जी. ललन सिंह का राजनीतिक अनुभव और संगठन में पकड़ उन्हें एक महत्वपूर्ण चेहरा बनाती है. हालांकि पिछले कुछ समय में पार्टी के भीतर समीकरण बदलते रहे हैं, फिर भी जेडीयू के बड़े नेताओं में उनका कद अब भी अहम माना जाता है. कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर पार्टी को अनुभव और संतुलन चाहिए, तो ललन सिंह की भूमिका फिर से महत्वपूर्ण हो सकती है.

अशोक चौधरी के नाम पर भी हो रही है चर्चा 

अशोक चौधरी के नाम पर भी चर्चा तेज

इसी तरह बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी भी एक अहम चेहरा हैं. दलित राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ और प्रशासनिक अनुभव उन्हें जेडीयू के भीतर प्रभावशाली नेता बनाता है. पिछले कुछ वर्षों में वे नीतीश कुमार के भरोसेमंद सहयोगियों में रहे हैं. सरकार और संगठन के बीच संतुलन बनाने में उनकी भूमिका भी अहम मानी जाती है. इसलिए भविष्य की राजनीति में उनकी भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

विजय चौधरी भी नीतीश के करीबियों में हैं 

विजय चौधरी भी हैं अहम दावेदार

जेडीयू में एक और महत्वपूर्ण नाम विजय चौधरी का भी है. विजय चौधरी लंबे समय से नीतीश कुमार के करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं और पार्टी के सबसे अनुभवी नेताओं में उनकी गिनती होती है. वे कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रह चुके हैं और विधानसभा में सरकार का पक्ष प्रभावी ढंग से रखने के लिए जाने जाते हैं. प्रशासनिक अनुभव, संगठन में पकड़ और नीतीश कुमार का भरोसा उन्हें जेडीयू के प्रमुख चेहरों में शामिल करता है.अगर भविष्य में पार्टी को स्थिर और अनुभवी नेतृत्व की जरूरत होती है, तो विजय चौधरी की भूमिका भी अहम हो सकती है.इन नामों के बीच एक और नाम की चर्चा धीरे-धीरे राजनीतिक गलियारों में सुनाई देने लगी है. यह नाम है नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का. निशांत अब तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे हैं और सार्वजनिक जीवन में बहुत कम दिखाई देते हैं. हालांकि समय-समय पर यह चर्चा जरूर होती रही है कि क्या वे कभी अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालेंगे.

जेडीयू के कुछ नेताओं और समर्थकों का मानना है कि अगर भविष्य में पार्टी को ऐसा चेहरा चाहिए जो नीतीश कुमार की विरासत को आगे बढ़ा सके, तो निशांत कुमार एक विकल्प हो सकते हैं. हालांकि फिलहाल उन्होंने राजनीति में आने का कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है. इसलिए यह चर्चा अभी केवल अटकलों तक ही सीमित है. जानकार मानते है कि इस सियासी उलट फेर के बाद निशांत कुमार को जेडीयू क्वोट से अप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है और पार्टी में भी उनकी अहम भूमिका हो सकती है. अनुभव ना होने के बावजूद भी अपने पिता के पुराने भरोसेमंद साथियों के मदद से वो एक बड़ी भूमिका में रह सकते है.

फिलहाल सच यही है कि जेडीयू की असली ताकत अब भी नीतीश कुमार ही हैं. पार्टी का संगठन, उसकी रणनीति और उसका जनाधार काफी हद तक उनके नेतृत्व के आसपास ही बना हुआ है. इसलिए अगर वे दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होते हैं, तो भी बिहार में उनका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा. संभव है कि वे दिल्ली से ही पार्टी की रणनीति तय करें और बिहार में उनके भरोसेमंद नेता संगठन और सरकार दोनों को संभालें.आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जेडीयू इस संभावित बदलाव को कैसे संभालेगी. क्या पार्टी किसी एक नेता के हाथ में कमान देगी या फिर सामूहिक नेतृत्व का रास्ता चुनेगी. बिहार की राजनीति में यह बदलाव आने वाले समय में नए समीकरण भी बना सकता है. इतना तय है कि अगर नीतीश कुमार की राजनीति का केंद्र दिल्ली की ओर बढ़ता है, तो बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जरूर शुरू होगा.

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