- बिहार विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदगी में शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग उठाई गई है.
- माधव आनंद ने शराबबंदी के व्यावहारिक पहलुओं और परिणामों की गंभीर समीक्षा की आवश्यकता जताई है.
- जीतन राम मांझी ने भी बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून पर पुनर्विचार और सीमित छूट की मांग की है.
बिहार की राजनीति में शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदगी में बिहार विधानसभा के भीतर शराबबंदी की समीक्षा करने की मांग उठाई गई. एनडीए सरकार में सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के नेता माधव आनंद ने पुरजोर तरीके से इस कानून के समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अब समय आ गया है जब शराबबंदी के व्यावहारिक पहलुओं और इसके परिणामों की गंभीरता से समीक्षा की जाए.
हालांकि, शराबबंदी पर सवाल उठाने वाले माधव आनंद अकेले नहीं हैं; इससे पहले जीतन राम मांझी भी कई मौकों पर इसकी समीक्षा की मांग कर चुके हैं. सहयोगियों द्वारा बार-बार उठाई जा रही इस मांग ने नीतीश सरकार के लिए एक नई चुनौती पेश कर दी है, क्योंकि यह कानून मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है. विधानसभा में जिस तरह से "समय आ गया है". इससे राज्य की सियासत में इस कानून के भविष्य को लेकर एक नई चर्चा शुरू कर दी है.
बीते दिनों में जीतनराम मांझी ने बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून पर पुनर्विचार की जरूरत बताई थी. मांझी ने कहा कि बिहार में भी गुजरात मॉडल की तर्ज पर शराब पीने की नियंत्रित और सीमित छूट दी जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि पूर्ण शराबबंदी के चलते आम लोग सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं, जबकि अवैध शराब का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है.
उन्होंने दावा किया कि शराबबंदी के बावजूद राज्य में शराब आसानी से उपलब्ध है, लेकिन इसका फायदा माफिया उठा रहे हैं और आम नागरिक कानूनी झंझटों में फंस रहे हैं. मांझी ने सुझाव दिया कि यदि गुजरात की तरह नियमों के तहत सीमित व्यवस्था लागू की जाए तो अवैध कारोबार पर लगाम लगेगी और सरकार को राजस्व भी मिलेगा.













