बिहार : पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही, सालों से जांच के इंतजार में बिसरा, पीड़ित परिवारों को न्याय कब?

समस्तीपुर में दशकों से पोस्टमार्टम के बाद सुरक्षित रखा गया बिसरा जांच के इंतजार में पड़ा है. फॉरेंसिक जांच की कमी से सैकड़ों मौतों का सच अधर में लटका हुआ है. (NDTV के लिए अवनीश कुमार की रिपोर्ट)

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  • समस्तीपुर जिले के सदर अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में वर्षों पुराने बिसरे जांच के लिए सुरक्षित नहीं रखे गए हैं
  • थानों में बिसरा रखने के लिए समुचित व्यवस्था न होने के कारण अनेक शवों के साक्ष्य सड़-गल रहे हैं
  • पोस्टमार्टम बिसरा को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजना अनिवार्य है, लेकिन इसके लिए आवश्यक संसाधन और बजट नहीं मिल रहे
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बिहार के समस्तीपुर जिले में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही ने न्याय की प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है. हालात ऐसे हैं कि सदर अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस से लेकर विभिन्न थानों तक मृतकों का बिसरा वर्षों से जांच के इंतजार में पड़ा हुआ है. ये सबूत न सिर्फ सड़-गल रहे हैं, बल्कि सैकड़ों मौतों का सच आज भी फाइलों में कैद है. पोस्टमार्टम के दौरान सुरक्षित रखे गए बिसरा को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजना अनिवार्य होता है, ताकि मौत के कारणों का वैज्ञानिक खुलासा हो सके. लेकिन समस्तीपुर में यह प्रक्रिया कागजों तक सिमट गई है. नतीजा यह है कि न तो मौत के रहस्य सुलझ पा रहे हैं और न ही पीड़ित परिवारों को न्याय मिल रहा है.

थानों में बदहाल स्थिति, मालखाना के पास लटक रहा बिसरा

नगर, मुफस्सिल और ट्रैफिक थाना समेत जिले के अधिकांश थानों में बिसरा रखने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है. कहीं यह मालखाना के पास झोले में लटका है, तो कहीं कोने में यूं ही रखा हुआ है. समय के साथ झोले तक सड़ चुके हैं. कुछ बेसरा जांच के बाद मुजफ्फरपुर स्थित फॉरेंसिक लैब से वापस आए, लेकिन उन्हें सुरक्षित रखने के लिए न जगह है और न संसाधन. सदर अस्पताल परिसर स्थित पोस्टमार्टम हाउस के दो कमरों में भी वर्षों पुराना बिसरा जांच के नाम पर रखा हुआ है. उचित तापमान और वैज्ञानिक सुरक्षा के अभाव में यह पूरी तरह सड़-गल चुका है. सरकारी मानकों के अनुसार बिसरा को सुरक्षित रखने के लिए वातानुकूलित कक्ष अनिवार्य है, लेकिन समस्तीपुर में इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है.

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150 साल पुराना बिसरा भी पड़ा है अस्पताल में

पोस्टमार्टम कार्य से जुड़ी मंजू देवी ने बताया कि अस्पताल में 150 वर्ष से भी अधिक पुराना बिसरा आज भी रखा हुआ है. यह पूरी तरह नष्ट हो चुका है, उन्होंने बताया कि अधिकांश बिसरा अज्ञात शवों या जहर से हुई मौतों से जुड़े मामलों के हैं. एक वरीय पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एक बिसरा को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजने में 500 से 600 रुपये का खर्च आता है, लेकिन इसके लिए सरकार की ओर से नियमित राशि उपलब्ध नहीं कराई जाती. इसी कारण कई मामलों में बिसरा वर्षों तक थानों में ही पड़ा रहता है.

अधिकारियों का क्या कहना है?

सिविल सर्जन डॉ. एसके चौधरी ने कहा कि सदर अस्पताल में बिसरा सुरक्षित रखा जाता है. जांच की जिम्मेदारी पुलिस की होती है. पुलिस जरूरत पड़ने पर एफएसएल भेजती है. अस्पताल में बड़ी संख्या में पुराने बिसरा पड़े हैं. एसपी अरविंद प्रताप सिंह ने कहा कि थाना स्तर पर ट्रांसफर-पोस्टिंग के कारण कई बार बिसरा पेंडिंग रह जाता है. खासकर यूडी केस में इसकी संख्या ज्यादा है. हर 15 दिन पर टीम एफएसएल जाती है. मुख्यालय को जानकारी दी गई है, निर्देश मिलने पर विनष्टीकरण होगा.

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सवाल बरकरार

सबूतों के अभाव में सैकड़ों मौतों की फाइलें आज भी अधर में लटकी हैं. एक तरफ पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन सिस्टम की उदासीनता उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है. सवाल यह है कि आखिर कब प्रशासन नींद से जागेगा और कब इन मृतकों को इंसाफ मिलेगा?

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