बिहार के विधान परिषद (MLC) चुनाव के लिए एनडीए ने अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है, लेकिन इस लिस्ट में दीपक प्रकाश का नाम नहीं है. दीपक प्रकाश बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं.
बिहार में 10 सीटों पर होने वाले MLC चुनाव को लेकर NDA ने 9 उम्मीदवार के नामों की घोषणा कर दी है. इसमें जेडीयू और बीजेपी ने चार-चार उम्मीदवार उतारे हैं तो वहीं चिराग पासवान की LJP(R) ने एक उम्मीदवार उतारा है.
एनडीए की लिस्ट में दीपक प्रकाश का नाम नहीं होने पर उपेंद्र कुशवाहा ने शनिवार को कहा था कि इंतजार कीजिए. लेकिन अब नामांकन में सिर्फ एक दिन बाकी है और दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया गया है. आखिर क्यों?
गठबंधन का आंतरिक बंटवारा और गणित
विधान परिषद की 10 सीट पर चुनाव होंगे. इसमें 9 सीटें हैं जिनका कार्यकाल पूरा होने के बाद चुनाव हो रहे हैं, जबकि एक सीट नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई है, जिस पर उपचुनाव हो रहा है.
बिहार विधान परिषद की खाली हो रही 9 सीटों के लिए विधानसभा के मौजूदा विधायकों की संख्या के आधार पर एनडीए के खाते में 8 सीटें आ रही हैं. इन सीटों को एनडीए के बड़े घटक दलों ने अपने पास रख लिया, जिससे छोटे दलों के लिए जगह नहीं बची.
भारतीय जनता पार्टी ने अपने कोटे की सभी 4 सीटों पर प्रत्याशियों के नाम का ऐलान कर दिया है जिसमें संजय मयूख, पवन सिंह, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित के नाम हैं. जेडीयू ने भी अपने हिस्से की सभी 4 सीटों पर उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं. इनमें नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार सबसे बड़ा नाम हैं. चिराग पासवान की पार्टी ने आखिरी बची सीट पर अपने मुख्य प्रवक्ता अशरफ अंसारी को टिकट दे दिया.
इस तरह, जीतने योग्य सभी 8 सीटें एनडीए के अन्य दलों के बीच बंट जाने के कारण उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) को एक भी सीट नहीं मिल सकी, और इसी वजह से दीपक प्रकाश का नाम लिस्ट से बाहर हो गया.
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मंत्री पद पर मंडराता संकट
दीपक प्रकाश के इस लिस्ट में शामिल न होने से उनके मंत्री पद पर सीधे तौर पर एक बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है. संविधान के अनुसार अनुच्छेद 164(4) कहता है कि यदि कोई व्यक्ति विधानमंडल (विधानसभा या विधान परिषद) के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, और उसे मंत्री बनाया जाता है, तो शपथ ग्रहण की तिथि से 6 महीने के भीतर उसे किसी एक सदन का सदस्य निर्वाचित होना अनिवार्य है.
मौजूदा स्थिति में दीपक प्रकाश ने बिना किसी सदन का सदस्य रहे कैबिनेट में पंचायती राज मंत्री के रूप में शपथ ली थी. यदि वे इस एमएलसी चुनाव के जरिए सदन में नहीं पहुंच पाते हैं, तो तय समय सीमा (6 महीने) समाप्त होने के बाद उन्हें कानूनन अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना होगा.
भविष्य की राजनीतिक संभावनाएं
इस फैसले के बाद बिहार के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है. हालांकि, आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने इस मुद्दे पर पूरी तरह से हथियार नहीं डाले हैं. उनका बयान आया है कि नामांकन प्रक्रिया के अंतिम समय तक गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत का दौर जारी है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि एनडीए के भीतर कोई आंतरिक समझौता नहीं होता है, तो दीपक प्रकाश को मंत्री पद पर बनाए रखने के लिए भविष्य में किसी अन्य विधायक या विधान पार्षद के इस्तीफे से खाली हुई सीट (उपचुनाव) या फिर राज्यपाल मनोनीत कोटे की सीटों का इंतजार करना पड़ सकता है.
हालाकि, इस MLC चुनाव में संख्या बल ही सबसे बड़ा महत्वपूर्व पेंच हैं, जिसमें उपेंद्र कुशवाह की पार्टी के पास सबसे कम नंबर हैं. बीजेपी-जेडीयू और LJP ने अपने कोटे की सीट ले ली हैं.
हालांकि इस मामले पर NDTV से बात करते हुए दीपक प्रकाश ने कहा हैं कि NDA का जो फैसला होगा, वह सर्वमान्य होगा. मेरे MLC पद के लिए NDA को फैसला लेना है. वहीं, उपेंद्र कुशवाह ने भी NDTV से बात करते हुए कहा है कि इसका फैसला एनडीए को लेना है. अब जो होगा देखा जाएगा.
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