Bihar News: बिहार के कटिहार जिले से सामने आई एक तस्वीर ने हर संवेदनशील इंसान को झकझोर कर रख दिया है. यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि उस दर्द, मजबूरी की कहानी थी जिसे मोरसंडा गांव के लोग दशकों से जी रहे हैं. फलका प्रखंड के मोरसंडा गांव निवासी अरविंद मंडल का निधन हो गया. परिवार पर दुखों का पहाड़ पहले ही टूट चुका था, लेकिन असली परीक्षा तब शुरू हुई जब उन्हें अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट ले जाना था. गांव और श्मशान के बीच बहने वाली नदी पर कोई पुल नहीं है. ऐसे में परिजनों और ग्रामीणों ने अर्थी को कंधों पर उठाया और सीने तक पानी में उतरकर नदी पार की.
इस दर्दनाक दृश्य का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. वीडियो में साफ दिखाई देता है कि किस तरह लोग जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रहे हैं. यह दृश्य सिर्फ एक परिवार की बेबसी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल है, जो आजादी के 75 साल बाद भी इस गांव तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचा सकी.
पुल न होने से मौत के बाद भी संघर्ष
मोरसंडा गांव में पुल के अभाव के कारण ग्रामीणों के लिए कमला नदी पार करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. अर्थी को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए परिजनों और ग्रामीणों को कंधों पर शव रखकर नदी के ठंडे पानी में उतरना पड़ा. नदी का पानी गहरा होने के बावजूद लोगों के पास कोई और रास्ता नहीं था. ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक दिन की समस्या नहीं है, बल्कि सालों से वे इसी तरह मौत और जिंदगी के बीच जूझ रहे हैं. आजादी के इतने साल बाद भी गांव की यह तस्वीर नहीं बदली है.
विधानसभा में कई बार उठा मुद्दा
स्थानीय लोगों के अनुसार नाव की सुविधा न के बराबर है और उस पर भी ओवरलोडिंग के कारण जान का खतरा बना रहता है. बाढ़ के मौसम में ग्रामीण आपसी चंदा इकट्ठा करके चचरी का पुल बनाते हैं, जो थोड़े समय बाद ही बह जाता है. इस मामले पर कोढ़ा विधानसभा की भाजपा विधायक कविता पासवान ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्होंने विधानसभा में कई बार यह मुद्दा उठाया है. उन्होंने दावा किया कि जिला प्रशासन की तकनीकी खामियों के कारण पुल का निर्माण रुका हुआ है, लेकिन अब वे इसे प्राथमिकता पर जल्द शुरू करवाएंगी.
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