बिहार विधानसभा चुनाव: सेनानियों के गढ़ में बाहुबलियों का कब्जा, ढाई दशक से अखिलेश और अशोक के बीच शह-मात

वैसे तो, नवादा, नालंदा और शेखपुरा के इलाका में 90 की दशक से अखिलेश सिंह और अशोक महतो के बीच जातीय वर्चस्व को लेकर खूनी संघर्ष होता रहा है. अखिलेश सिंह के खिलाफ कई जातीय नरसंहार समेत दर्जनों हत्या का आरोप रहा है.

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नवादा की इस सीट पर भी दिलचस्प होगा मुकाबला
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  • बिहार के नवादा जिले का वारिसलीगंज इलाका सामाजिक और धार्मिक समन्वय की शिक्षा तथा किसान आंदोलन का केंद्र रहा है
  • वारिसलीगंज में बाहुबलियों का प्रभाव बढ़ा और अखिलेश सिंह व अशोक महतो परिवारों का राजनीतिक दबदबा कायम हुआ
  • अखिलेश सिंह और अशोक महतो के बीच जातीय वर्चस्व की लड़ाई से उत्पन्न हिंसक संघर्ष वर्ष 1990 से लगातार जारी है
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बिहार के नवादा जिले का वारिसलीगंज इलाका धार्मिक शिक्षा का केन्द्र रहा है, जहां सामाजिक और धार्मिक समन्वय की शिक्षा दी जाती थी. वारिसलीगंज किसान नेता स्वामी सहजानंद की कर्मभूमि रही है, जिनकी प्रेरणा से किसानों ने आंदोलन किया था और जमींदारों के अत्याचार से मुक्ति पाई थी. वारिसलीगंज स्वतंत्रता सेनानियों की भूमि रही है,जहां बड़ी तादाद में सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़कर आजादी पाई थी. 

आजादी के बाद हुए चुनाव में वारिसलीगंज सीट का नेतृत्व स्वतंत्रता सेनानी चेतू राम, राम किसुन सिंह,श्याम सुंदर प्रसाद सिंह जैसे लोगों ने किया. लेकिन वारिसलीगंज में यह सब अतीत की कहानी रह गई है. यहां का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है. पिछले ढ़ाई दशक से वारिसलीगंज क्षेत्र का नेतृत्व बाहुबलियों के हाथों में हैं. बाहुबलियों के परिजन चुनाव जीतते और हारते रहे हैं. चूकिं अब लोगों की पसंद बाहुबली हो गए हैं. बाहुबली को अपना रॉबिनहुड मानने लगे हैं. 

देखें तो, साल 2000 से किसी राजनीतिज्ञ कार्यकर्ता को क्षेत्र के प्रतिनिधित्व का मौका नही मिला है. एक तरफ अखिलेश सिंह और दूसरी तरफ अशोक महतो के परिजन चुनाव जीतते हारते रहे हैं. 2025 का विधानसभा चुनाव काफी रोचक होनेवाला है. चूकिं अखिलेश सिंह की विधायक पत्नी अरुणा देवी के खिलाफ बाहुबली अशोक महतो अब अपनी पत्नी अनिता कुमारी को चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी में है. अशोक महतो इसके लिए क्षेत्र में जनसंपर्क चला रहे हैं. इसके पहले अशोक महतो का करीबी प्रदीप महतो चुनाव लड़ते थे.

जातीय वर्चस्व की लड़ाई से उत्पन्न हुए अखिलेश और अशोक 

वैसे तो, नवादा, नालंदा और शेखपुरा के इलाका में 90 की दशक से अखिलेश सिंह और अशोक महतो के बीच जातीय वर्चस्व को लेकर खूनी संघर्ष होता रहा है. अखिलेश सिंह के खिलाफ कई जातीय नरसंहार समेत दर्जनों हत्या का आरोप रहा है. दूसरी तरफ, अशोक महतो के खिलाफ नवादा जेल ब्रेक समेत कई जातीय नरसंहार और हत्या का आरोप रहा है. दोनों की छबि बाहुबलियों की रही है. लेकिन 2000 से अपराध का राजनीतीकरण हो गया। तब से यह सिलसिला जारी है. हालांकि अखिलेश और अशोक के ज्यादातर मामले खत्म हो चुके हैं. लेकिन दोनों आपराधिक मामले के आरोपी रहे हैं। खुद चुनाव नही लड़ सकते. लिहाजा, करीबियों को चुनाव लड़ाते रहे हैं. 

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2000 से अखिलेश और अशोक के बीच शह मात

साल 2000 में पहली दफा वारिसलीगंज विधानसभा चुनाव में बाहुबली की इंट्री हुई थी. तब बाहुबली अखिलेश सिंह की पत्नी अरूणा देवी निर्वाचित हुई थी. राजद उम्मीदवार मनिलाल प्रसाद दूसरे स्थान पर रहे थे. 2005 फरवरी चुनाव से अखिलेश सिंह के बाहुबली प्रतिद्वंद्धी की इंट्री हुई, तब अशोक महतो के करीबी प्रदीप महतो चुनाव मैदान में उतरे. हालांकि प्रदीप दूसरे स्थान पर रहे थे. अरुणा देवी निर्वाचित हुई थी लेकिन अक्टूबर 2005 के चुनाव में प्रदीप ने अरूणा देवी को पराजित कर दिया.
फिर 2010 में प्रदीप महतो दोबारा निर्वाचित हुए। जबकि अरूणा देवी दूसरे स्थान पर रही थी. दोनों के बीच सियासी शह मात की लड़ाई में 2015 के चुनाव में अरूणा देवी निर्वाचित हुई, जबकि प्रदीप दूसरे स्थान पर रहे थे.  उसी तरह 2020 में अरूणा देवी चौथा दफा निर्वाचित हुई. लेकिन यहां प्रतिद्वंद्वी प्रदीप की पत्नी आरती सिन्हा चुनाव लड़ी थी. और वह तीसरे स्थान पर रही थी. दूसरे स्थान पर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सतीश कुमार मंटन रहे थे. करीब 10हजार मतों से पीछे थे. 

अब अरुणा के खिलाफ अनिता की इंट्री

वैसे तो, अशोक महतो के करीबी प्रदीप फरवरी 2005 से अरुणा देवी के मुकाबले चुनाव लड़ते रहे. लेकिन 2025 में अरुणा देवी के मुकाबले में अशोक महतो की पत्नी अनिता की इंट्री हो रही है. चूंकि जेल ब्रेक में सजायप्ता के कारण अशोक महतो सियासत से दूर रहे हैं. अशोक महतो 2001 में हुए नवादा जेल ब्रेक कांड के सजायप्ता रहे हैं. 2006 में गिरफ्तारी हुई थी. उसके बाद से अशोक महतो जेल में था. करीब 17 साल बाद दिसंबर 2023 में अशोक महतो केंद्रीय कारा भागलपुर से रिहा हुए. इसके बाद से अशोक महतो राजनीति में सक्रिय हैं. सजायप्ता के कारण खुद चुनाव नही लड़ सकते. इसलिए 62 की उम्र में 46 की उम्र की अनिता कुमारी से शादी की. 2024 में मुंगेर लोकसभा से जेडीयू सांसद राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह के खिलाफ राजद की टिकट पर अनिता चुनाव लड़ी थी. हालांकि अनिता पराजित हो गईं थी, लेकिन अशोक महतो अब अपनी पत्नी अनिता को गृह क्षेत्र वारिसलीगंज विधानसभा से चुनाव लड़ाना चाहते हैं. लिहाजा, अशोक महतो क्षेत्र में सक्रिय हैं.

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कई सेनानियों ने किया वारिसलीगंज का प्रतिनिधित्व

ढाई दशक पहले का राजनीतिक अतीत देखें तो 1952 में स्वतंत्रता सेनानी चेतू राम, 1957 और 1962 में रामकिसुन सिंह, 1967 और 1969 में शिक्षाविद देवनंदन प्रसाद, 1972 में स्वतंत्रता सेनानी श्याम सुंदर प्रसाद सिंह, 1977 में राम रतन सिंह, 1980 और 1985 में बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह के पुत्र बंदीशंकर सिंह, 1990 में देवनंदन प्रसाद और 1995 में राजनीतिज्ञ रामाश्रय प्रसाद सिंह निर्वाचित हुए हैं. हालांकि वारिसलीगंज की विडंबना कि किसान नेता पंडित यदुनंदन शर्मा चुनाव लड़े थे, लेकिन उनकी जमानत जब्त हो गई थी। तब एक गीत गया जाता था कि लेनन यदुनंदन अवतार, हरे ला दुख किसान के.
 

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