उत्तर प्रदेश के इस शहर में स्थित है 'शिवद्वार', शिव-पार्वती की खास मूर्ति हुई थी प्रकट, जानिए इस 11वीं शताब्दी के मंदिर का धार्मिक महत्व

Uma Maheshwar Mandir Uttar Pradesh: एक अद्भुत शिवालय उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में स्थित है, जिसका नाम है उमा-महेश्वर मंदिर जिसे शिवद्वार कहा जाता है. यह मंदिर जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी उत्तर-पश्चिम और घोरावल से मात्र 10 किमी दूर है.

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उत्तर प्रदेश का शिवद्वार
File Photo

Uma Maheshwar Mandir: देश-दुनिया में देवाधिदेव महादेव के एक से बढ़कर एक शिवालय हैं, जिससे जुड़ी कथा, चमत्कार और मंदिर की बनावट भक्ति के साथ हैरत में भी डालती है. ऐसा ही एक अद्भुत शिवालय उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में स्थित है, जिसका नाम है उमा-महेश्वर मंदिर जिसे शिवद्वार कहा जाता है. यह मंदिर जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी उत्तर-पश्चिम और घोरावल से मात्र 10 किमी दूर है. यह 11वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर है, जहां शिव और पार्वती की खूबसूरत 3 फुट ऊंची ब्लैकस्टोन (काले पत्थर) की मूर्ति प्रवीण मुद्रा में विराजमान है.

सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा

मंदिर में शिव और पार्वती जी की मूर्ति को बहुत संभालकर रखा जाता है और यह साधना के लिए आदर्श स्थान माना जाता है. शिवद्वार धाम एक ऐसा पावन स्थल है, जहां भगवान शिव और माता पार्वती का दुर्लभ उमा-महेश्वर स्वरूप पत्थर में सजीव-सा प्रतीत होता है. उत्तर प्रदेश का पर्यटन विभाग इसे सोनभद्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताता है. शिवद्वार धाम न केवल पूजा-अर्चना का केंद्र है, बल्कि प्राचीन भारतीय कला, इतिहास और आस्था का बेहतरीन प्रमाण भी है.

पर्यटन विभाग के अनुसार, यह मंदिर शिव की मौन मुस्कान और पार्वती की करुण दृष्टि से भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देता है. 11वीं शताब्दी में निर्मित यह प्रतिमा भारतीय शिल्पकला का अनुपम नमूना है, जहां दाम्पत्य सौहार्द, आध्यात्मिक गहराई और सौम्य भावनाओं का अद्भुत संगम दिखता है. इस मंदिर में पारंपरिक शिवलिंग की बजाय शिव और पार्वती की संयुक्त मूर्ति की पूजा होती है, जो इसे दुनिया में अनोखा बनाती है.

मंदिर के गर्भगृह में स्थापित काले पत्थर की यह प्रतिमा करीब तीन फुट ऊंची है और लश्या शैली में बनी हुई है. शिव जी यहां संहारक के रूप में नहीं, बल्कि सौम्य पति के रूप में और पार्वती शक्ति के साथ करुणामयी अर्धांगिनी के रूप में विराजमान हैं. प्रतिमा की सूक्ष्म नक्काशी, भाव-भंगिमा और संतुलन जीवंत है. 

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कैसे प्रकट हुई मूर्ति?

मंदिर से जुड़ी किवदंती के अनुसार, कई वर्ष पहले एक किसान जब अपने खेत में हल चला रहा था, तब धरती से यह अप्रतिम उमा-महेश्वर प्रतिमा प्रकट हुई. इसे चमत्कार मानकर स्थानीय लोगों ने यहां मंदिर का निर्माण करवाया. यह प्रतिमा सृजन और प्रेम के स्वरूप का प्रतीक मानी जाती है, जो उस युग के उत्कृष्ट शिल्प कौशल को दर्शाती है. धार्मिक महत्व के कारण यहां साल भर श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते रहते हैं. 

धार्मिक महत्व

महाशिवरात्रि पर यहां लाखों भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है. सावन महीने में विशेष रूप से कांवड़ यात्रा का आयोजन होता है. श्रद्धालु विजयगढ़ दुर्ग के राम सागर ताल से पवित्र जल लेकर पैदल या कांवड़ पर सिर रखकर शिवद्वार धाम पहुंचते हैं और जल अर्पित करते हैं. यहां दर्शन करने वाले भक्त महसूस करते हैं कि सच्ची आस्था पत्थर में नहीं, बल्कि हृदय में बसती है. मान्यता है कि उमा-महेश्वर के दर पर कोई मनोकामना लेकर पहुंचे तो वह जरूर पूरी होती है और दर्शन मात्र से पाप भी कटते हैं.

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मंदिर तक कैसे पहुंचें?

उमा-महेश्वर मंदिर तक पहुंचना आसान है. सोनभद्र जिला मुख्यालय से सड़क मार्ग से बस, ऑटो या निजी वाहन से आसानी से मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है. घने जंगलों और विंध्य पर्वतमाला से घिरा यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता और शांति से भरपूर है, जो भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है.

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