Harsh Snehanshu LinkedIn Post: हर्ष स्नेहांशु, जिन्होंने पटना से लेकर पेरिस तक की गलियां छानी हैं, उनका दावा है कि बेंगलुरु में वो 'रूह' गायब है जो दिल्ली या मुंबई में मिलती है. उनका मानना है कि बेंगलुरु सिर्फ 'काम करने' वाली चीजों का शहर है, 'देखने' या 'महसूस' करने वाला नहीं. जब तक आप पब में हैं, भाग रहे हैं या किसी इवेंट में हैं, सब चंगा है, लेकिन जैसे ही आप खाली बैठते हैं, यह शहर आपको काटने को दौड़ता है.
अकेलेपन का शहर बेंगलुरु (Bengaluru The Loneliest City Debate)
उनका कहना है कि दिल्ली में आधी रात को इंडिया गेट पर चुस्की लेना या मुंबई में मरीन ड्राइव के किनारे लहरों को देखते हुए सुस्त पड़े रहना एक अलग सुकून देता है. बेंगलुरु में तो बस 'टू इट' (Toit) और 'एम्पायर' (Empire) जैसे ठिकाने हैं, जहां बिना बात किए आप अपनी सोच के साथ बैठ भी नहीं सकते. यहां का अकेलापन इंसान के अंदर घर कर जाता है, चाहे आसपास कितनी ही भीड़ क्यों न हो.
सिर्फ काम, सुकून कहां है? (Bengaluru city life)
हर्ष ने खुद को भी लपेटे में लेते हुए कहा कि, 'Cubbon Reads' जैसी पहल भी शायद इसी खालीपन को भरने की एक कोशिश थी. लोग पार्कों में जाकर किताब पढ़ते हैं या पेंटिंग करते हैं, क्योंकि शहर के पास 'आइडलिंग' यानी बिना कुछ किए बस खाली बैठने की कोई प्रेरणा नहीं है. यहां हर चीज के लिए एक मकसद चाहिए, चाहे वो 5 किलोमीटर की रनिंग हो या कोई वीकेंड ट्रिप. सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर दो फाड़ हो गए हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि, 'बेंगलुरु की अपनी एक अलग 'वाइब' है जिसे समझने में वक्त लगता है', तो कुछ ने हर्ष की बात पर मुहर लगाते हुए कहा कि, 'यह शहर वाकई बनावटी होता जा रहा है.'
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हर्ष की इस बात ने उन लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, जो बेंगलुरु को सिर्फ ट्रैफिक और मौसम के चश्मे से देखते थे. क्या वाकई हम मशीनों की तरह बस 'काम करने' में लगे हैं और 'जीना' भूल गए हैं? यह बहस लंबी है, पर सच तो यही है कि सुकून किसी शहर में नहीं, शायद भागदौड़ से मिलने वाले छोटे से ब्रेक में होता है.
(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)














