MRI Study Human Body : साल 1991 में नीदरलैंड्स में रहने वाली Ida Sabelis और उनके पार्टनर Jupp ने अपने वैज्ञानिक दोस्त Menko Victor van Andel की मदद के लिए एक रिसर्च में हिस्सा लिया. मकसद था...MRI मशीन के जरिये ये समझना कि नजदीकी पलों में इंसानी शरीर के अंदर क्या बदलाव होते हैं. उस दौर की MRI मशीनें आज जैसी तेज नहीं थीं. हर इमेज के लिए कुछ मिनट तक बिल्कुल स्थिर रहना पड़ता था. Ida बाद में बताती हैं कि कंट्रोल रूम से 'पोजिशन में रहने' की आवाज आना अपने-आप में एक अजीब तजुर्बा था.
जब तंगी ने बदला रिसर्च का एंगल (medical research mystery)
मशीन के अंदर जगह बेहद कम थी. पहले सोचा गया था कि रिसर्च एक सामान्य मुद्रा में होगी, लेकिन हालात ने इजाजत नहीं दी. आखिरकार कपल ने एक ऐसा तरीका चुना जो मशीन के भीतर मुमकिन था. रोमांस नहीं, बल्कि ये एक तरह से 'इल्म की अदायगी' थी. Ida, जो आज एम्स्टर्डम की Vrije University में प्रोफेसर हैं, कहती हैं कि उन्हें डर नहीं लगा बल्कि ये एहसास था कि वो महिलाओं के शरीर को बेहतर समझे जाने की एक कोशिश का हिस्सा हैं.
MRI तस्वीरों ने तोड़ा सदियों पुराना भ्रम (science experiment story)
1999 में British Medical Journal (BMJ) में छपी इस स्टडी ने मेडिकल दुनिया को हैरान कर दिया. स्कैन से सामने आया कि इंसानी बनावट उतनी सीधी नहीं, जितनी सदियों से किताबों में दिखाई जाती रही. ये खोज लियोनार्डो दा विंची के दौर से चली आ रही धारणाओं को चुनौती देती थी. यही वजह है कि ये रिसर्च आज भी पढ़ी जाती है और मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए अहम मानी जाती है.
इस प्रयोग ने बदल दी मेडिकल सोच (medical science discovery)
ये खबर सिर्फ एक रिसर्च नहीं, बल्कि उस सोच की मिसाल है जहां विज्ञान, साहस और इंसानी जज्बात एक साथ आते हैं. इससे महिलाओं के शरीर को लेकर मेडिकल समझ बेहतर हुई और भविष्य की रिसर्च के लिए नए दरवाजे खुले. कभी-कभी खामोश मशीनों के भीतर लिए गए फैसले दुनिया भर की सोच बदल देते हैं.
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