जब 1990 में वॉयेजर-1 ने सौरमंडल से बाहर जाते हुए आखिरी बार पृथ्वी की तस्वीर ली, तो वह एक छोटा सा 'पेल ब्लू डॉट' नजर आई. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि आज जो धरती नीली दिखती है, वह हमेशा ऐसी नहीं थी. करीब 2.4 अरब साल पहले, पृथ्वी का रंग नीला नहीं बल्कि बैंगनी (पर्पल) हो सकता था. यह दावा Purple Earth Hypothesis नाम की वैज्ञानिक थ्योरी पर आधारित है, जो न सिर्फ धरती के अतीत बल्कि भविष्य में जीवन की खोज के लिए भी अहम मानी जा रही है.
क्या है Purple Earth Hypothesis?
Purple Earth Hypothesis के अनुसार, पृथ्वी पर शुरुआती जीवन हरे पौधों पर आधारित नहीं था. आज ज्यादातर जीव क्लोरोफिल नामक पिगमेंट से प्रकाश संश्लेषण करते हैं, जिसकी वजह से पृथ्वी अंतरिक्ष से हरी-नीली दिखाई देती है. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती जीवन ने रेटिनल (retinal) नामक अणु का इस्तेमाल किया, जो क्लोरोफिल से भी पहले विकसित हुआ हो सकता है. रेटिनल हरे और पीले प्रकाश को अवशोषित करता है, जबकि लाल और नीले प्रकाश को परावर्तित करता है, जिससे धरती बैंगनी रंग की दिखाई देती. इस थ्योरी को यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के प्रोफेसर शिलादित्य दास शर्मा और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, रिवरसाइड के खगोल-जैव वैज्ञानिक डॉ. एडवर्ड श्वीटरमैन ने प्रस्तावित किया.
धरती पर कैसे आया ऑक्सीजन का युग?
NASA की एक रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी के शुरुआती दो अरब वर्षों में वातावरण में ऑक्सीजन लगभग नहीं थी. उस समय वायुमंडल में मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन मौजूद थीं. करीब 2.4 अरब साल पहले एक बड़ा बदलाव आया, जिसे Great Oxygenation Event कहा जाता है. इस घटना के बाद ऑक्सीजन का स्तर बढ़ा और धीरे-धीरे क्लोरोफिल आधारित जीवन विकसित हुआ, जिससे धरती का रंग बदलकर आज जैसा नीला-हरा हो गया. प्राचीन अवसादों में मिले आर्कियल मेम्ब्रेन के अवशेष इस बात का समर्थन करते हैं कि शुरुआती जीवन रेटिनल-आधारित था.
भविष्य और एलियन जीवन के लिए क्यों अहम है यह थ्योरी?
Purple Earth Hypothesis सिर्फ अतीत की कहानी नहीं है. इसका सबसे बड़ा महत्व ब्रह्मांड में जीवन की खोज से जुड़ा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर जीवन हमेशा क्लोरोफिल पर आधारित नहीं होता, तो दूसरे ग्रहों पर भी जीवन हरे रंग का ही हो- यह ज़रूरी नहीं. संभव है कि अन्य ग्रहों पर बैंगनी या अलग रंग के जीवन रूप मौजूद हों. प्रोफेसर दास शर्मा के अनुसार, 'रेटिनल-आधारित फोटोथ्रॉफिक मेटाबॉलिज़्म आज भी समुद्रों में मौजूद है और पृथ्वी की सबसे अहम जैव-ऊर्जा प्रक्रियाओं में से एक है.
Purple Earth Hypothesis हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जो हम आज देखते हैं, वही हमेशा सच नहीं रहा. धरती का रंग, जीवन की परिभाषा और एलियन की कल्पना, सब कुछ हमारी सोच से कहीं ज्यादा अलग हो सकता है. शायद भविष्य में जब हम किसी दूसरे ग्रह को देखें, तो वहां की बैंगनी झलक हमें जीवन का नया संकेत दे.
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