कर्नाटक की वो नदी, जिसके पत्थरों पर बसे हैं हजारों शिव, पानी कम होते ही दिखता है अद्भुत नजारा

कर्नाटक की शाल्मला नदी में मौजूद सहस्रलिंग एक अनोखा धार्मिक स्थल है. जहां नदी के तल और पत्थरों पर हजारों शिवलिंग उकेरे गए हैं. पानी कम होने पर ये सभी शिवलिंग दिखाई देते हैं और पूरा नदी तल किसी विशाल खुले मंदिर जैसा नजर आता है.

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Karnataka  Sahasralinga

Karnataka Sahasralinga:  भारत में नदियां सिर्फ पानी का सोर्स नहीं होतीं, बल्कि आस्था, इतिहास और संस्कृति की भी कैरियर मानी जाती हैं. देश की कई नदियों से जुड़ी कहानियां और परंपराएं सदियों पुरानी हैं. ऐसी ही नदियों में से एक है कर्नाटक की शाल्मला नदी, जिसके बीचों बीच मौजूद सहस्रलिंग एक बेहद अनोखा और पवित्र स्थल है. यहां नदी के पत्थरों और तल में हजारों शिवलिंग उकेरे गए हैं. जो पहली नजर में ही लोगों को हैरान कर देते हैं. जब नदी का पानी कम होता है. तो ये सभी शिवलिंग साफ दिखाई देने लगते हैं और पूरा नदी तल किसी खुले मंदिर जैसा नजर आता है. यही वजह है कि ये जगह श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों और इतिहासकारों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र बन गई है.

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नदी में उकेरे गए हजारों शिवलिंग

सहस्रलिंग का मतलब ही होता है हजार शिवलिंग. कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में सिरसी के पास बहने वाली शाल्मला नदी के किनारों और तल पर हजारों की संख्या में शिवलिंग पत्थरों पर उकेरे गए हैं. कई शिवलिंग के सामने नंदी बैल की आकृतियां भी बनाई गई हैं. जो भगवान शिव के वाहन माने जाते हैं. इन सभी उकेरी गई आकृत्तियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे पूरी नदी को ही एक विशाल मंदिर में बदल दिया गया हो. जब बरसात के मौसम में नदी का वॉटरलेवल बढ़ जाता है. तो ये शिवलिंग पानी के नीचे छिप जाते हैं. लेकिन गर्मियों या सूखे मौसम में पानी घटते ही ये सभी आकृतियां फिर से दिखाई देने लगती हैं.

इतिहास और आस्था का अनोखा संगम

माना जाता है कि सहस्रलिंग की ये नक्काशी 17वीं और 18वीं शताब्दी में केलाड़ी नायक वंश के शासनकाल में करवाई गई थी. राजा सदाशिवराय और उनकी रानियों ने भगवान शिव की भक्ति में इन शिवलिंगों को बनवाया था. समय के साथ कई कारीगरों और भक्तों ने भी यहां और शिवलिंग उकेरे. धीरे धीरे ये जगह श्रद्धा का बड़ा केंद्र बन गई.

खासकर महाशिवरात्रि के समय यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और शिवलिंगों पर जल, दूध और फूल चढ़ाकर पूजा करते हैं. आज ये स्थान सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि इतिहास, कला और प्रकृति के अनोखे मेल का भी शानदार उदाहरण माना जाता है.

(Disclaimer: यह खबर सोशल मीडिया पर यूजर द्वारा की गई पोस्ट से तैयार की गई है. एनडीटीवी इस कंटेंट की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता.)

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