कर्नाटक में 300 साल पुरानी बावड़ी फिर हुई जीवित, शिवलिंग जैसी संरचना, देखिए वीडियो

कर्नाटक के बेलगावी जिले में विरासत की एक शानदार चीज को फिर से ठीक किया गया है. 300 साल पुरानी एक बावड़ी यानी सीढ़ीदार कुआं, जो कचरे और मलबे के नीचे दब गई थी, उसे फिर से जीवित किया गया है.

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300 साल पुरानी बावड़ी फिर हुई जीवित

कर्नाटक के बेलगावी जिले में ऐतिहासिक विरासत का एक भूला-बिसरा हिस्सा फिर से सामने आया है. यहां करीब 300 साल पुरानी एक बावड़ी फिर से जीवित हुई है, जो कई दशकों से कूड़े-कचरे, मलबे और मिट्टी के नीचे दबी हुई थी. स्थानीय लोगों ने कचरे में दबी इस बावड़ी को अपनी मेहनत से फिर जिंदा कर दिया है. अब इसमें फिर से पानी आ चुका है, जो लोगों की प्यास बुझाएगा. इस बावड़ी का वीडियो पीटीआई ने अपने एक्स हैंडल पर शेयर किया है.

300 साल पुरानी बावड़ी फिर हुई जीवित

न्यूज एजेंसी पीटीआई ने अपने एक्स पर एक वीडियो शेयर किया. वीडियो में इस ऐतिहासिक बावड़ी को ठीक करने के बाद दिखाया गया है. एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के बेलगावी जिले में विरासत की एक शानदार चीज को फिर से ठीक किया गया है. 300 साल पुरानी एक बावड़ी यानी सीढ़ीदार कुआं, जो कचरे और मलबे के नीचे दब गई थी, उसे फिर से जीवित किया गया है. 80 फ़ीट गहरी यह बावड़ी, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे 15वीं और 17वीं सदी के बीच आदिल शाही वंश के दौरान बनाया गया था, अब बेलगावी स्थित 'प्यास फ़ाउंडेशन' ने NSS वॉलंटियर्स और स्थानीय लोगों की मदद से पूरी तरह से ठीक कर लिया है. इसमें पत्थर की 53 सीढ़ियां हैं और इसकी बनावट अनोखी है. यह ऊपर से देखने पर शिव लिंग जैसी दिखती है.

बेलगावी के पास मुतगा गांव के कंचवीर नगर में स्थित यह ऐतिहासिक बावड़ी करीब 300 सालों तक सीवेज, प्लास्टिक कचरे, मलबे और झाड़ियों के नीचे दबी रही. लंबे समय तक लोगों की नजरों से दूर रही इस पुरानी धरोहर को स्वयंसेवकों ने कड़ी मेहनत से साफ किया और इसे फिर से अपने पुराने स्वरूप में लाया. सफाई के बाद इसकी शानदार नक्काशी और बेहतरीन निर्माण कला सामने आई. इस बावड़ी के पुनर्स्थापन का काम बेलगावी की प्यास फाउंडेशन ने किया. इस अभियान में राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के स्वयंसेवकों, स्थानीय लोगों और दानदाताओं ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया.

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शिवलिंग जैसी संरचना

इस बावड़ी में पानी तक पहुंचने के लिए 53 पत्थर की सीढ़ियां बनी हुई हैं. ऊपर से देखने पर पूरी संरचना शिवलिंग के आकार जैसी दिखाई देती है. इसके अलावा, यहां मौजूद पत्थर के मेहराब, खंभे और बारीक नक्काशी उस समय की बेहतरीन इंजीनियरिंग और वास्तुकला की झलक दिखाते हैं. यह पुनर्जीवित बावड़ी न केवल क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने का उदाहरण है, बल्कि पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों के महत्व को भी उजागर करती है. अब यह जगह स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है.

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