डर को नीचे छोड़...बिना सेफ्टी 101 मंजिला इमारत पर चढ़े एलेक्स होनोल्ड, नामुमकिन को किया मुमकिन

जिस इमारत को देखकर लोगों की गर्दन अकड़ जाती है, उसी ताइपे 101 को एलेक्स होनोल्ड ने अपने हौसले से जीत लिया. न रस्सी, न सेफ्टी बेल्ट, बस हाथ पैर और अटूट हिम्मत. यह कहानी है डर पर जीत की, जो जोश से भर देती है.

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शहर सांस रोके देखता रहा...101 मंजिला इमारत पर चढ़ते चले गए एलेक्स होनोल्ड, ग्रेविटी को दी चुनौती

World Tallest Building Climb: अमेरिका के मशहूर पर्वतारोही एलेक्स होनोल्ड (Alex Honnold) ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इंसानी हौसलों की कोई ऊंचाई तय नहीं. उन्होंने ताइवान की मशहूर गगनचुंबी इमारत ताइपे 101 पर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के फ्री सोलो क्लाइम्बिंग कर इतिहास रच दिया. करीब 508 मीटर ऊंची और 101 मंजिला इस इमारत पर उन्होंने महज 90 मिनट में चढ़ाई पूरी की.

शहर के बीच सांस रोक देने वाला नजारा (American Rock Climber)

आमतौर पर पहाड़ों और चट्टानों पर चढ़ने वाले होनोल्ड के लिए यह अनुभव बिल्कुल अलग था. नीचे सड़कों पर ट्रैफिक चल रहा था, लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बना रहे थे और हर कदम पर तालियां बज रही थीं. इमारत के कोनों, सजावटी किनारों और एल आकार की संरचनाओं का सहारा लेते हुए वह ऊपर बढ़ते रहे.

सबसे मुश्किल हिस्सा कहां था? (free solo climbing)

ताइपे 101 का डिजाइन ही इसे चुनौतीपूर्ण बनाता है. इमारत के बीच बांस जैसे डिब्बों की बनावट है, जहां सतह फिसलन भरी और खड़ी है. हर सेक्शन में आठ मंजिलें हैं. तेज हवा और ऊंचाई पर संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी परीक्षा थी. बारिश के कारण यह चढ़ाई एक दिन टालनी भी पड़ी थी, जिसके बाद इसे नेटफ्लिक्स पर लाइव दिखाया गया.

ऊपर पहुंचकर बोले होनोल्ड (Honnold Reaction at the Top)

शिखर पर पहुंचते ही लाल टी शर्ट पहने एलेक्स ने हाथ हिलाकर जश्न मनाया. उन्होंने कहा कि ऊपर से ताइपे शहर किसी सपने जैसा दिख रहा था. तेज हवा के बावजूद यह उनकी जिंदगी के सबसे यादगार पलों में से एक रहा. यह पहली बार है जब ताइपे 101 पर बिना किसी सेफ्टी के फ्री सोलो क्लाइम्बिंग हुई. 

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इतिहास रचने वाला कारनामा (Historic Free Solo Climb)

इससे पहले 2004 में फ्रांसीसी पर्वतारोही एलेन रॉबर्ट ने रस्सी के सहारे चढ़ाई की थी. ताइवान के राष्ट्रपति से लेकर बेयर ग्रिल्स तक सभी ने इस साहस की तारीफ की. एलेक्स होनोल्ड की यह चढ़ाई सिर्फ एक रोमांच नहीं, बल्कि जिंदगी को खुलकर जीने का पैगाम है. यह बताती है कि डर से ऊपर उठकर इंसान असंभव को भी मुमकिन बना सकता है.

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