Explained: बलूचिस्तान में हथियार उठाती महिलाएं: क्यों पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह में स्त्रियां बन गईं सबसे बड़ी चुनौती

बलूचिस्तान में महिलाओं का हथियार उठाना पाकिस्तान के लिए नई और गंभीर चुनौती बन गया है. जबरन गुमशुदगियों, सैन्य दमन, सामाजिक टूटन और आर्थिक दोहन ने बलूच महिलाओं को सड़कों से लेकर सशस्त्र विद्रोह की अग्रिम कतार में ला खड़ा किया है. पढ़ी‑लिखी युवा महिलाएं अब BLA का उभरता चेहरा हैं.

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  • बलूचिस्तान में महिलाओं ने हथियार उठाकर विद्रोह को नया रूप दिया है जो पाकिस्तान के लिए चुनौती बन गया है.
  • बलूच महिलाओं का विद्रोह उत्पीड़न का परिणाम है जो सैन्य अत्याचारों की प्रतिक्रिया के रूप में उभरा है.
  • 2013 के लॉन्ग मार्च से बलूच महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता बढ़ी और वे अब सशस्त्र प्रतिरोध में भी शामिल हैं.
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पाकिस्तान के बलूचिस्तान में उबलता विद्रोह बीते हफ्ते में एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया, जिसने दशकों पुराने इस संघर्ष की तस्वीर ही बदल दी. बंदूक थामे महिलाएं, खुलेआम हमले करती हुईं, वीडियो जारी करती हुईं और पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देती हुईं महिलाएं अब बलूच विद्रोह का नया चेहरा हैं.

यह सिर्फ किसी मर्द-प्रधान सशस्त्र आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी की कहानी नहीं है. यह उन वर्षों की पीड़ा, प्रताड़ना और टूटे परिवारों का विस्फोट है, जिनके बीच बलूच महिलाओं की एक पूरी पीढ़ी पली है. अब वही पीढ़ी मैदान-ए-जंग में उतर चुकी है और पाकिस्तान की सेना के लिए यह सबसे असहज और खतरनाक चुनौती बन गई है.

जब तस्वीरों ने हिला दी सत्ता

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के हालिया हमलों में 10 पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों की मौत के बाद संगठन ने अपने हमलावरों की तस्वीरें जारी कीं. इन तस्वीरों में दो महिलाएं भी शामिल थीं. यह दृश्य पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक नेतृत्व दोनों के लिए अभूतपूर्व था.

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घटनाओं के बाद बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज बुगटी मीडिया के सामने भावुक नजर आए, लेकिन सवाल सिर्फ हमले का नहीं था. सवाल था कि अचानक यह बदलाव आया क्यों?

'यह मजबूरी से जन्मा विद्रोह है' 

इस बदलाव को समझने के लिए विशेषज्ञ इसे सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में देखते हैं. ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के सीनियर फेलो और साउथ एशिया मामलों के जानकार सुशांत सरीन कहते हैं, 'बलूच स्वतंत्रता संघर्ष में महिलाओं की भागीदारी इस आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक है. बलूच समाज परंपरागत रूप से धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु रहा है, लेकिन सामाजिक रूप से वह काफी रूढ़िवादी था, जहां महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका सीमित थी. ऐसे में पाकिस्तानी सेना, खासतौर पर पंजाबी सैन्य प्रतिष्ठान की बर्बरता ने बलूच महिलाओं को हथियार उठाने के लिए मजबूर किया.'

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सरीन के मुताबिक, यह बदलाव किसी रणनीतिक प्रयोग का नतीजा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे राज्य हिंसा की प्रतिक्रिया है. 'इन महिलाओं के पिता, पति, भाई या बेटे या तो मारे गए, या प्रताड़ित हुए, या जबरन गायब कर दिए गए. यही वजह है कि उन्होंने पहले सड़कों पर उतरकर राजनीतिक संघर्ष शुरू किया और बाद में सशस्त्र प्रतिरोध तक पहुंचीं.'

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2013 की लॉन्ग मार्च से बंदूक तक

बलूच महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता अचानक नहीं उभरी.

पहली बार वे 2013 की ‘लॉन्ग मार्च' के दौरान बड़े पैमाने पर सार्वजनिक रूप से सामने आईं. इसके बाद उनका रोल लगातार बढ़ता गया. आज हालात यह हैं कि बलूचिस्तान की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक आवाज भी एक महिला के पास है. आज बलूचिस्तान की सबसे बड़ी राजनीतिक नेता डॉ. महरंग बलूच हैं, जो इस वक्त जेल में हैं. यहां तक कि पारंपरिक पुरुष नेता भी अब उनका नेतृत्व स्वीकार करते हैं.

डॉ. महरंग बलूच

पढ़ी-लिखी महिलाएं, संगठित विद्रोह

यह विद्रोह अब किसी हाशिए के वर्ग तक सीमित नहीं रहा. इन महिलाओं में डॉक्टर, पीएचडी स्कॉलर और पोस्ट-ग्रेजुएट शामिल हैं. वे न सिर्फ दूसरी महिलाओं, बल्कि युवा पुरुषों के लिए भी प्रेरणा बन चुकी हैं.  सरीन के अनुसार, यही बात पाकिस्तान के लिए सबसे परेशान करने वाली है. जब किसी समाज में महिलाएं हथियार उठाती हैं, तो यह बताता है कि अलगाव की भावना कितनी गहरी हो चुकी है और पाकिस्तानी कब्जे के खिलाफ भावना कितनी मजबूत है.

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सुर्खियों में आईं महिला हमलावर

BLA द्वारा जारी तस्वीरों में 24 वर्षीय आसिफा मेंगल की पहचान सामने आई. आसिफा ने अपने 21वें जन्मदिन पर BLA की मजीद ब्रिगेड जॉइन की थी और जनवरी 2024 में ‘फिदायीन' बनने का फैसला लिया. नुस्की में ISI मुख्यालय पर हुए हमले की जिम्मेदारी उसी ने ली थी.

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में एक महिला हमलावर को सुरक्षा चौकी के आसपास रणनीतिक ढंग से घूमते, गोलीबारी करते और अपने पुरुष साथियों के साथ हंसते हुए देखा गया. वीडियो में वह हमले का ‘औचित्य' भी समझाती है, जो इस आंदोलन के वैचारिक आत्मविश्वास को दिखाता है.

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यह पहली बार नहीं: बलूच महिला हमलावरों का ट्रैक रिकॉर्ड

बलूच महिलाओं की हथियारबंद भूमिका कोई नई घटना नहीं है.

2022 | कराची यूनिवर्सिटी हमला

शारी बलूच: 30 वर्षीय शिक्षिका और दो बच्चों की मां ने चीनी नागरिकों को निशाना बनाया.

2022 | तुर्बत हमला

पत्रकार सुमैया कलंदरानी बलूच ने आत्मघाती हमला किया. उनके मंगेतर रिहान बलूच 2018 में फिदायीन बन चुके थे.

2025 | कलात हमला

विज्ञान स्नातक बानुक महेकान बलूच ने फ्रंटियर कॉर्प्स के वाहन को निशाना बनाया.

ये घटनाएं साफ करती हैं कि महिला भागीदारी अब अपवाद नहीं, बल्कि उभरता पैटर्न बन चुकी है.

क्यों हथियार उठा रही हैं बलूच महिलाएं?

1. जबरन गुमशुदगियां और टूटते परिवार

Voice for Baloch Missing Persons के मुताबिक, साल 2000 से 2025 के बीच 5,000 से ज़्यादा बलूच पुरुष लापता हुए. घर के कमाने वाले सदस्य गायब हुए, तो आंदोलन की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई.

2. ‘आयरन फिस्ट' नीति

कठोर सैन्य अभियान, विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदी और नागरिकों की जबरन गिरफ्तारी ने महिलाओं को अग्रिम पंक्ति में धकेल दिया.

3. सामाजिक ढांचे में बदलाव

अब आंदोलन की अगुवाई पढ़े-लिखे युवा, छात्र और पेशेवर वर्ग कर रहा है. जिससे महिलाओं के लिए भी नेतृत्व का रास्ता खुला है.

4. CPEC और संसाधनों का दोहन

ग्वादर और CPEC परियोजनाओं में स्थानीय भागीदारी बेहद सीमित है. बलूच महिलाएं इसे अपने संसाधनों के शोषण के रूप में देखती हैं.

रणनीतिक रूप से महिलाएं क्यों बन रहीं हैं बड़ी चुनौती?

सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, महिला आत्मघाती हमलावरों को पहचानना और रोकना सुरक्षा एजेंसियों के लिए कहीं ज़्यादा मुश्किल होता है.

पाकिस्तान की परेशानी बयान करते आंकड़े

2011 से अब तक बलूच हमलों में 350+ मौतें हुईं. इनमें 15 हमले महिलाओं द्वारा किया गया. 2024 में 685 पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों की मौत (CRSS) हुई. 

एक तरफ खैबर पख्तूनख्वा में TTP, दूसरी तरफ बलूचिस्तान में BLA- पाकिस्तान की सेना कई मोर्चों पर बंटी हुई है.

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सशक्तिकरण या शोषण?

पाकिस्तान के कुछ विश्लेषक इसे महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं, बल्कि उनका शोषण बताते हैं. वहीं BLA समर्थक इसे महिलाओं की स्वतंत्र राजनीतिक भागीदारी बताते हैं.

विद्रोह का बदला हुआ चेहरा शहबाज सरकार के लिए चिंताजनक

बलूचिस्तान अब पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक सुरक्षा संकट नहीं है. यह एक बदलते सामाजिक ढांचे की चेतावनी है. जब महिलाएं प्रतिरोध की अग्रिम कतार में आ जाती हैं, तो संघर्ष सिर्फ बंदूकों का नहीं रहता- वह राज्य की वैधता पर सीधा सवाल बन जाता है और यही सवाल आज पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है.

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