ईरान‑अमेरिका के बीच सीजफायर का ऐलान होते ही दुनिया को लगा था कि पश्चिम एशिया में तनाव कुछ कम होगा, लेकिन इसके उलट इजरायल ने लेबनान पर हमले और तेज कर दिए. सीजफायर के ठीक बाद इजरायली वायुसेना ने पूरी रात लेबनान में बमबारी की, जिसमें 200 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर है. ऐस में सवाल यह है कि जब सीजफायर की बात हो रही है, तब इजरायल इतनी जल्दबाज़ी में क्यों दिख रहा है?
सीजफायर की आशंका और ‘आखिरी मौका'
विशेषज्ञों के मुताबिक, इजरायल को यह साफ अंदेशा है कि लेबनान को लेकर भी जल्द या बाद में अंतरराष्ट्रीय दबाव के तहत सीजफायर करना पड़ेगा. यही वजह है कि वह इसे एक आखिरी मौका मानकर हिज़्बुल्लाह के ठिकानों को ज्यादा नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है.
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सीजफायर में लेबनान शामिल नहीं
इजरायल का तर्क है कि मौजूदा सीजफायर समझौता सिर्फ ईरान से जुड़ा है और इसमें लेबनान या हिज़्बुल्लाह शामिल नहीं हैं. इसी आधार पर इज़रायल सैन्य कार्रवाई को वैध बताकर हमले जारी रखे हुए है. अमेरिका भी बार‑बार कह चुका है कि हिज़्बुल्लाह इस डील का हिस्सा नहीं है.
रणनीतिक बढ़त लेने की कोशिश
सीजफायर से पहले ज्यादा से ज्यादा सैन्य बढ़त हासिल करना युद्ध की सामान्य रणनीति मानी जाती है. इजरायल जानता है कि अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने लेबनान पर भी सीजफायर थोप दिया, तो उसके बाद बड़े ऑपरेशन करना मुश्किल हो जाएगा. इसलिए वह पहले ही बुनियादी ढांचे, हथियार डिपो और कमांड सेंटर को निशाना बना रहा है.
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आंतरिक दबाव और शक्ति प्रदर्शन
इजरायल के भीतर भी सरकार पर दबाव है कि वह हिज़्बुल्लाह के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे. ऐसे में लगातार हमले यह संदेश देने की कोशिश हैं कि इजरायल समझौते के दौर में भी कमजोर नहीं पड़ा है और क्षेत्र में अपनी सैन्य ताकत बनाए हुए है.
क्षेत्रीय संदेश
लेबनान पर तेज हमले सिर्फ हिज़्बुल्लाह के लिए ही नहीं, बल्कि ईरान और उसके सहयोगियों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश हैं कि सीजफायर का मतलब इजरायल की सैन्य सक्रियता का अंत नहीं है.
नतीजा क्या?
हालात यह संकेत दे रहे हैं कि इजरायल आने वाले दिनों में या तो निर्णायक बढ़त लेना चाहता है या फिर मजबूरी में सीजफायर से पहले अपनी शर्तें मजबूत कर रहा है.














