जिस रूसी तेल के कारण भारत समेत कई देशों पर लगाया टैरिफ, अब उसी पर क्यों फिसल गए ट्रंप

ईरान से जंग शुरू करते समय शायद अमेरिका को अंदाजा तक नहीं रहा होगा कि उसको ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ेगा. सुपरपावर को अब समझ में आ रहा है कि हर देश वेनेजुएला नहीं है.

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  • अमेरिका ने अगले तीस दिनों तक समुद्र में फंसे रूसी तेल को सभी देशों को खरीदने की अनुमति दी है
  • यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने अमेरिका के इस फैसले को रूस की युद्ध क्षमता बढ़ाने वाला बताया है
  • ईरान पर अमेरिकी हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ गया, जिससे तेल आपूर्ति प्रभावित हुई
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अमेरिका ने घोषणा की है कि वो सभी देशों को अगले 30 दिनों तक समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीदने की छूट दे रहा है. अमेरिका का इतना कहना भर था कि यूक्रेन चिढ़ गया. उसके राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने तो यहां तक कह दिया कि इससे रूस को लंबे समय तक यूक्रेन के खिलाफ जंग लड़ने में मदद मिलेगी. यूरोप के देशों ने भी ट्रंप को खूब सुनाया. 

ट्रंप ने मचाया था धमाल

ये वही अमेरिका है, जिसने रूस से तेल खरीदने पर सबसे ज्यादा भारत और चीन पर सबसे ज्यादा आरोप लगाए थे. यूक्रेन युद्ध के जरिए शुरू हुआ धीरे-धीरे टैरिफ वार में शुरू हो गया.  ट्रंप ने सबसे पहले चीन पर टैरिफ लगाकर उसे काबू करने की कोशिश की मगर चीन ने भी उल्टा अमेरिका पर टैरिफ लगा दिया. दोनों देशों में टैरिफ वार चला और जब चीन ने अमेरिका की दुखती रग 'क्रिटिकल मिनिरल्स' की सप्लाई अपने यहां से रोक दी तो अमेरिका ने समझौता कर लिया. चीन काबू में होता नहीं देखकर ट्रंप भारत से भिड़े. रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया गया. मगर भारत ने तेल खरीद जारी रखी. दोनों देशों में व्यापार समझौता फाइनल हुआ तो उसमें भी ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने पर रोक की घोषणा एकतरफा कर दी. भारत ने हालांकि साफ किया कि वो अपनी जरूरत के हिसाब से तेल खरीदेगा. बाद में अमेरिका के ही सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के इस टैरिफ वाले खेल को गैर-कानूनी घोषित कर दिया. ऐसा नहीं है कि चीन और भारत ही रूसी तेल खरीद के लिए ट्रंप के निशाने पर आए. अपने पक्के साथी यूरोप पर भी वो लगातार रूस से गैस सप्लाई जारी रखने का आरोप लगाते रहे. उत्तर कोरिया को छोड़कर दुनिया का ऐसा कोई देश नहीं बचा जिसे रूस से तेल खरीदने पर ट्रंप ने धमकाया नहीं हो, मगर अब वो खुद कह रहे हैं कि रूस से तेल खरीद लो.

होर्मुज में फंस गए

ट्रंप के अजीब फैसलों से कम से कम यूक्रेन खुश था. उसे उम्मीद जगी कि ट्रंप रूस की कमाई का जरिया पूरी तरह बंद करा देंगे. मगर अचानक ट्रंप ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने का फैसला ले लिया. ईरान को पहले से अंदाजा था कि ट्रंप ऐसा कर सकते हैं. यही कारण है कि उसने सबसे पहले तेल की सप्लाई लाइन वाले सबसे व्यस्त रास्ते होर्मुज जलडमरूमध्य को ही चोक कर दिया और तेल का कुंआ माने जाने वाले अरब देशों पर हमले शुरू कर दिए. इससे तेल का उत्पादन और रास्ता दोनों बंद हो गए. जाहिर है दुनिया भर में हाहाकार मचना था और मच भी गया. दुनिया का दबाव ट्रंप पर पड़ने लगा कि जल्द से जल्द या तो युद्ध बंद करें या फिर होर्मुज का रास्ता खुलवाएं. तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया. दुनिया में महंगाई का खौफ छाने लगा. स्थिति को भांपते हुए ट्रंप ने तत्काल ऐलान कर दिया कि वो होर्मुज में फंसे जहाजों को अमेरिकी नेवी के जरिए एस्कॉर्ट कराएंगे.

अमेरिकी सेना पीछे हट गई

आज ही अमेरिकी सेना के टॉप अधिकारी जनरल डैन केन ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य रणनीतिक रूप से जटिल हो गया है. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि इस रणनीतिक जलमार्ग से जहाजों को सुरक्षित रूप से निकालने की योजनाओं पर अमल करना अभी मुश्किल है. केन ने कहा, "यह एक रणनीतिक रूप से अभी जटिल जगह है. इससे पहले कि हम वहां से बड़े पैमाने पर कुछ भी ले जाना चाहें, हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हम अपने वर्तमान सैन्य टारगेट के अनुसार काम करें." साफ है कि अमेरिकी सेना अब ट्रंप की तरह काम नहीं करना चाहती. वो अब फैसले पूरी तरह सोच-समझकर लेना चाहती है. यही कारण है कि ट्रंप के खुद ऐलान के बाद भी अमेरिकी सेना होर्मुज से जहाजों को निकालने के लिए तैयार नहीं है.

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युद्ध के बढ़ते खर्चों से भी परेशान

ट्रंप सिर्फ तेल के कारण ही ईरान में नहीं फंस रहे हैं. अमेरिका में पहली बार किसी जंग के दौरान इस तरह का विरोध देखने को मिल रहा है. कई रिपोर्ट्स आ चुकी हैं कि ट्रंप ने ईरान पर हमले का फैसला बगैर प्लानिंग कर दिया. अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान पर शुरुआती हमले में ही पेंटागन ने लगभग 5.6 अरब डॉलर केवल हथियारों पर खर्च कर दिए थे. यह आंकड़ा केवल युद्ध के पहले दो दिनों का है. इसमें सैनिकों की तैनाती, विमान और नौसैनिक संसाधनों के रखरखाव या क्षेत्र में सैनिकों को बनाए रखने जैसे व्यापक संचालन खर्च शामिल नहीं हैं. युद्ध आज 14 वें दिन में प्रवेश कर गया. ईरान ने इन 14 दिनों में अमेरिका को काफी नुकसान पहुंचाया. अमेरिका के कई लड़ाकू विमान, जहाज, एयर डिफेंस सिस्टम बर्बाद हो चुके हैं. मिसाइल-गोला-बारूद का भी स्टॉक खत्म हो रहा है. आनन-फानन में अमेरिका को दक्षिण कोरिया से एयर डिफेंस सिस्टम खाड़ी के अपने सैन्य बेस पर लाने पड़े हैं. बढ़ते खर्च को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस से अतिरिक्त फंड की मांग की है, जिस पर अब अमेरिका में ही बवाल चल रहा है.

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आखिरकार रूस के तेल पर फिसले

रही-सही कसर ईरान की तरफ से नये सुप्रीम लीडर के रूप में मुजतबा खामेनेई का चयन और युद्ध को अगले एक साल तक जारी रखने के ऐलान ने पूरी कर दी है. अमेरिकी सेना से लेकर जनता और खुद ट्रंप तक इसके लिए तैयार नहीं थे. उन्हें उम्मीद थी कि अयातुल्ला अली खामेनेई के मारे जाते ही ईरान की जनता सड़कों पर उतर जाएगी और सेना मैदान छोड़ देगी. मगर न तो ईरान की जनता सड़कों पर विरोध में उतरी और न ही सेना ने मैदान छोड़ा. बल्कि वो और घातक हमले कर रहे हैं. यही कारण है कि ट्रंप कभी हमले जारी रखने की घोषणा करते हैं तो कभी जल्द युद्ध समाप्त होने की घोषणा करने लगते हैं. इस बीच दुनिया भर में तेल को लेकर मचते बवाल को देखते हुए उन्होंने रूस से बातचीत शुरू कर दी. जबकि खुद उन्हीं की सेना और सरकार आरोप लगा रही है कि रूस पीछे से ईरान को सैन्य मदद दे रहा है. मगर ट्रंप को समझ में आया कि इस वक्त अगर दुनिया में तेल की किल्लत हो गई तो मामला और उनके हाथ से निकल जाएगा. इसलिए उन्होंने 30 दिनों के लिए समुद्र में फंसे रूसी तेल खरीदने की मंजूरी दे दी. फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने इसे मान भी लिया और कहा, 'पुतिन शायद ईरान की थोड़ी-बहुत मदद कर रहे हैं, वैसे ही जैसे हम यूक्रेन की कर रहे हैं. वो ऐसा करते हैं और हम भी ऐसा करते हैं, वो भी पूरी निष्पक्षता के साथ. '

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