- खामेनेई के बेटे मोजतबा ईरान के नए सुप्रीम लीडर बने, जिससे वंशवाद vs इस्लामिक सिद्धांत की बहस तेज हो गई.
- उनके तीन बड़े नेटवर्क- धार्मिक प्रतिष्ठान, सुरक्षा बल, राजनीतिक ढांचा- उनकी असली ताकत माने जा रहे हैं.
- अमेरिका-इजरायल तनाव, आर्थिक प्रतिबंध और आंतरिक असंतोष के बीच उनका नेतृत्व ईरान की भविष्य की दिशा तय करेगा.
इतिहास के पन्नों में सत्ता का बदलाव अक्सर विरासत के बोझ के साथ आता है, और ईरान की इस्लामिक रिपब्लिक की विरासत जितनी जटिल है उतनी शायद ही कहीं और हो. अब जब ईरान के नए सुप्रीम लीडर के तौर पर मोजतबा खामेनेई, जो कि दिवंगत सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के बेटे हैं, सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे हैं, तो उनका नाम पश्चिम एशिया की राजनीति में डर, जिज्ञासा और अनिश्चितता तीनों को जन्म दे रहा है. मोजतबा खामेनेई का सुप्रीम लीडर बनना केवल एक पद का उत्तराधिकार नहीं है, बल्कि यह विचारधारा और व्यवहारिक राजनीति के बीच गहरे तनाव का प्रतीक भी है.
ईरान की इस्लामिक रिपब्लिक का जन्म राजशाही के खात्मे के बाद हुआ था. उस समय यह तय किया गया था कि देश में वंशवाद नहीं होगा, बल्कि विलायत-ए-फकीह (मौलवियों के शासन) के सिद्धांत के तहत धार्मिक नेतृत्व सर्वोच्च होगा. लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि खून के रिश्ते और सत्ता का मेल उसी सिद्धांत को चुनौती देता दिख रहा है जिसने इस गणराज्य को जन्म दिया था. कुछ लोगों के लिए यह क्रांति की आत्मा के साथ विश्वासघात है, जबकि कुछ इसे उस संघर्ष और बलिदान की निरंतरता मानते हैं जिसने इस व्यवस्था को खड़ा किया.
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शहादत की कहानी से वैधता पाने की कोशिश
इस वैचारिक संघर्ष के बीच शहादत का एक और बड़ा नैरेटिव सामने आता है. शिया परंपरा में शहादत की कहानी बेहद अहम है, जिसकी जड़ें कर्बला में इमाम हुसैन की कुर्बानी से जुड़ी हैं. ईरान की राजनीति में भी शहादत का यह विचार गहराई से जुड़ा हुआ है. अब यही प्रतीकवाद मोजतबा खामेनेई के इर्द-गिर्द भी बुना जा रहा है. उनके पिता की मौत को विदेशी ताकतों के हमले से जोड़कर देखा जा रहा है. ऐसे में ईरान के नए सुप्रीम लीडर के तौर पर मोजतबा खामेनेई सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि शहीद के बेटे के रूप में सामने आते हैं. यह छवि उन्हें नैतिक अधिकार देती है कि वे संकट के दौर में जनता को एकजुट कर सकें.
मोजतबा के सामने असली चुनौतियां
हालांकि प्रतीकों और भावनाओं से अलग वास्तविकता कहीं ज्यादा कठोर है. ईरान इस समय कई बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है. देश का इंफ्रास्ट्रक्चर काफी हद तक तबाह हो चुका है, सैन्य संसाधनों को भारी नुकसान हुआ है, आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से अर्थव्यवस्था दबाव में है, अंदरूनी असंतोष भी मौजूद है और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है. ऐसे माहौल में मोजतबा खामेनेई के लिए सत्ता संभालना सिर्फ अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने का मामला नहीं है. उन्हें ऐसे समय में नेतृत्व करना होगा जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति बेहद जटिल और खतरनाक मोड़ पर खड़ी है.
युद्ध की आशंका और कूटनीति की जरूरत
ईरान के ऊपर युद्ध का खतरा अब भी मंडरा रहा है. ऐसे में मोजतबा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे कठोर विचारधारा और व्यवहारिक कूटनीति के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं. कई विश्लेषकों का मानना है कि भले ही वे सार्वजनिक रूप से कम दिखाई देते हों, लेकिन सत्ता के गलियारों में उन्होंने लंबे समय तक रणनीतिक सोच विकसित की है. यह भी कहा जाता है कि उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे सत्ता के परदे के पीछे गठबंधन बनाने में माहिर हैं. यही कौशल उन्हें परंपरा को बनाए रखते हुए नई राजनीतिक दिशा तय करने में मदद कर सकता है.
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मोजतबा के तीन बड़े नेटवर्क
मोजतबा खामेनेई ने ईरानी समाज के तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मजबूत नेटवर्क तैयार किया है. पहला नेटवर्क धार्मिक प्रतिष्ठान यानी क्लेरिकल सिस्टम में है. दूसरा नेटवर्क सुरक्षा बलों में है. और तीसरा नेटवर्क सुप्रीम लीडर के कार्यालय के आसपास मौजूद राजनीतिक ढांचे में है. ईरान के विशेषज्ञ और अल-मयादीन नेटवर्क के पूर्व तेहरान ब्यूरो प्रमुख अली हाशेम के मुताबिक सुरक्षा बलों में मोजतबा के करीबी लोगों में मोहम्मद रेजा नकदी शामिल हैं, जो बसीज मिलिशिया के कमांडर रह चुके हैं. इसके अलावा एक और अहम नाम हुसैन ताएब का है, जो इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी के पूर्व खुफिया प्रमुख रह चुके हैं.
बसीज मिलिशिया की ताकत
फारसी भाषा में बसीज का मतलब होता है लामबंदी. बसीज रेजिस्टेंस फोर्स एक विशाल अर्धसैनिक स्वयंसेवी संगठन है, जो आईआरजीसी के अधीन काम करता है. इसका मुख्य काम आंतरिक सुरक्षा बनाए रखना, नैतिक पुलिसिंग करना और सरकार विरोधी आवाजों को दबाना है. इसे कुछ हद तक सऊदी अरब की धार्मिक पुलिस मुतव्वा से भी तुलना की जाती है. इस संगठन की स्थापना 1979 में अयातुल्ला खुमैनी ने की थी. इसका मूल उद्देश्य था कि शासन के प्रति वफादार एक ऐसी ताकत तैयार की जाए जो दंगों को नियंत्रित कर सके और नागरिकों की निगरानी कर सके. बसीज के लगभग छह लाख सक्रिय सदस्य हैं और जरूरत पड़ने पर लाखों की संख्या में रिजर्व बल जुटाया जा सकता है. यही संगठन अनिवार्य हिजाब कानून को लागू करवाने और विरोध प्रदर्शनों को दबाने में अहम भूमिका निभाता है.
आईआरजीसी का विशाल नेटवर्क
ईरान का इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी बेहद शक्तिशाली संस्था है और इसके साथ करीब दो करोड़ लोगों तक का नेटवर्क जुड़ा हुआ माना जाता है. आईआरजीसी के पूर्व कमांडर हुसैन हमदानी मोजतबा के बेहद करीबी माने जाते थे. दोनों की दोस्ती ईरान-इराक युद्ध के दौरान बनी थी. उस समय मोजतबा हबीब इब्न मजाहिर बटालियन में शामिल थे, जो एक स्वयंसेवी समूह था और बाद में ईरान की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बन गया. युद्ध के दौरान बने ये रिश्ते बाद में आईआरजीसी और खुफिया एजेंसियों के वरिष्ठ पदों तक पहुंचे और इन्हीं नेटवर्क्स ने मोजतबा की स्थिति को मजबूत बनाया.
परछाई में रहने वाला नेता
मोजतबा खामेनेई आमतौर पर सार्वजनिक जीवन से दूर रहते हैं. उनकी सुरक्षा को लेकर खतरे इतने ज्यादा हैं कि वे अपने पिता की तरह सार्वजनिक कार्यक्रमों में अक्सर नजर नहीं आते. उनकी आखिरी चर्चित तस्वीर 2024 में सामने आई थी जब हिज़्बुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह की हत्या के बाद वे तेहरान में संगठन के कार्यालय पहुंचे थे और शोक संवेदना व्यक्त की थी.
वित्तीय नेटवर्क और आरोप
पश्चिमी मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार मोजतबा का नाम कुछ ऐसे वित्तीय नेटवर्क से भी जोड़ा जाता है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपत्तियों को स्थानांतरित करके आर्थिक प्रतिबंधों से बचने की कोशिश करते हैं. ईरानी बैंकर अली अंसारी, जिनका आयंदेह बैंक और विदेशों में बड़े रियल एस्टेट निवेश से जुड़ा व्यापार साम्राज्य है, मोजतबा के करीबी मित्र माने जाते हैं.
धार्मिक शिक्षा और नेतृत्व की तैयारी
युवावस्था में मोजतबा ने क़ुम के धार्मिक मदरसों में पढ़ाई की. वहां उन्होंने बहस अल-खारिज नामक उच्च स्तरीय शिया धार्मिक पाठ्यक्रम भी पढ़ाया, जिसे शिया न्यायशास्त्र की सबसे ऊंची पढ़ाई माना जाता है. ईरान के संविधान के मुताबिक सुप्रीम लीडर का सबसे बड़ा धर्मगुरु होना जरूरी नहीं है. 1989 के बाद से सिर्फ यह शर्त है कि नेता स्वतंत्र रूप से धार्मिक और कानूनी फैसले लेने में सक्षम हो. कुम में मिली शिक्षा और शिक्षण अनुभव मोजतबा को ऐसे फैसले लेने में मदद दे सकता है.
जियो-पॉलिटिकल बातचीत में क्या भूमिका निभाएंगे?
अमेरिका और इजरायल के साथ हालिया टकराव के बाद पूरे क्षेत्र में अनिश्चितता का माहौल है. मोजतबा को एक सख्त प्रतिरोधी नेता के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन उनकी भूमिका दोहरी भी हो सकती है. एक तरफ वे बाहरी दुश्मनों के खिलाफ कठोर रुख अपना सकते हैं, तो दूसरी तरफ बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश भी कर सकते हैं. राजनीति में अक्सर वही नेता सफल होते हैं जो समझौते की कला जानते हैं. इसलिए संभव है कि दुनिया जिस सख्त नेता की उम्मीद कर रही है, वही नेता रणनीतिक समझौतों से चौंका भी दे.
आलोचक क्या कहते हैं?
वॉशिंगटन स्थित अरब गल्फ स्टेट्स इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो अली अलफोनह का कहना है कि मोजतबा खामेनेई ने कभी इंटरव्यू नहीं दिया है. ज्यादातर ईरानियों ने उनकी आवाज तक नहीं सुनी है और वे साल में केवल दो बार, 11 फरवरी को क्रांति दिवस पर और रमजान के आखिरी शुक्रवार को कुद्स दिवस रैली में, सार्वजनिक रूप से दिखाई देते हैं. प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की स्कॉलर एलिजाबेथ त्सुर्कोव ने भी सोशल मीडिया पर दावा किया था कि एक ईरानी धर्मगुरु शेख जबेररजबी, जिन्होंने बाद में शासन से दूरी बना ली, मोजतबा को एक मसीहाई चरमपंथी बताते हैं.
अमेरिकी आलोचना से बढ़ता समर्थन
अक्सर ऐसा देखा गया है कि जब अमेरिका ईरान के नेताओं की आलोचना करता है, तो उसका उल्टा असर पड़ता है. अमेरिकी टिप्पणियां मोजतबा की छवि को कमजोर करने के बजाय उन्हें विदेशी दबाव के खिलाफ खड़े राष्ट्रीय नेता के रूप में पेश करती हैं. इससे देश के भीतर उनका समर्थन मजबूत हो सकता है.
ईरान के भविष्य की दिशा
मोजतबा खामेनेई ऐसे समय में सत्ता में आए हैं जब ईरान की पहचान कई परतों में बंटी हुई है. एक तरफ क्रांति की पुरानी विरासत है, दूसरी तरफ एक आधुनिक राष्ट्र की आकांक्षाएं हैं जो दुनिया के साथ जुड़ना चाहता है. मोजतबा इस संघर्ष के बीच एक पुल की तरह दिखाई देते हैं. एक ऐसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हुए जो अतीत की लड़ाई से निकली है लेकिन भविष्य की चुनौतियों का सामना करना चाहती है.
भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा
आने वाला समय खतरों से भरा हुआ है, लेकिन इसी में संभावनाएं भी छिपी हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मोजतबा खामेनेई अपने पिता की छाया से बाहर निकलकर ईरान के लिए नई दिशा तय कर पाएंगे, या फिर वही पुरानी क्रांतिकारी राह आगे भी जारी रहेगी. दुनिया की नजरें अब इसी सवाल पर टिकी हैं कि क्या यह नेता आस्था, सत्ता और पहचान के जटिल समीकरणों के बीच ईरान को एक नए अध्याय की ओर ले जा पाएगा.














