होर्मुज की दोहरी नाकाबंदी से किस देश को लगेगा झटका? थाईलैंड-सिंगापुर की तो अटकी सांसें; एशिया पर सबसे ज्यादा असर

जापान, थाईलैंड और भारत सहित कई देश मिडिल ईस्ट से अपनी ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर हैं. भारत को ईरान ने तेल की निरंतर सप्लाई का आश्वासन दिया है.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins

ईरान के साथ शांति वार्ता विफल होने के बाद अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में अपनी नाकाबंदी सख्त कर दी है. दुनिया के इस सबसे अहम समुद्री रास्ते पर पाबंदियों का सीधा मतलब है इससे वैश्विक ऊर्जा संकट पहले से कहीं अधिक गहरा जाएगी. जापानी निवेश बैंक 'नोमुरा' की हालिया रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इस तनाव की सबसे बड़ी मार एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने वाली है.

चीन को छोड़ दिया जाए, तो जापान और थाईलैंड जैसे देश इस संकट के मुहाने पर खड़े हैं, क्योंकि होर्मुज से गुजरने वाले कच्चे तेल और गैस का सबसे बड़ा खरीदार एशिया ही है. हालांकि भारत को ईरान का आश्वासन है कि तेल की निर्बाध सप्लाई जारी रहेगी. भारत में ईरान के राजदूत ने कहा है कि भारत सच्चा मित्र है इसलिए उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है. लेकिन तेल किस रास्ते से आएगा इसकी जानकारी नहीं है.

आंकड़े बताते हैं कि ऊर्जा के शुद्ध आयातकों के लिए यह स्थिति किसी बुरे सपने से कम नहीं है. थाईलैंड, भारत, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे एशियाई देशों के साथ-साथ यूरोप की बड़ी ताकतें जैसे जर्मनी, इटली और यूनाइटेड किंगडम इस घेराबंदी से सबसे अधिक असुरक्षित हैं. हालांकि, अमेरिका, कनाडा, नॉर्वे और खुद चीन के लिए इसका असर थोड़ा सीमित रहने की उम्मीद है, क्योंकि उनके पास ऊर्जा के अपने स्रोत या बेहतर विकल्प मौजूद हैं.

यह भी पढ़ें: क्या होर्मुज के बाद मलक्का स्ट्रेट को भी घेरने की तैयारी में अमेरिका? भारत के पास भी है 'ट्रंप कार्ड'

जापान पर आपूर्ति का भारी संकट

नोमुरा की रिपोर्ट के मुताबिक, जापान और फिलीपींस अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल मिडिल ईस्ट से ही मंगाते हैं. वहीं, भारत की स्थिति भी थोड़ी चिंताजनक है क्योंकि भारत अपनी कुल एलएनजी (LNG) आपूर्ति का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से लाता है.

हालांकि भारत सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए रास्ते तलाश रही है. भारत ने घरेलू स्तर पर कीमतों पर काबू पाने के लिए निर्यात शुल्क बढ़ा दिया है. इसके साथ भारत सरकार ने घरेलू गैस की निर्बाध सप्लाई के लिए भी कई कदम उठाए हैं.

Advertisement

वहीं सिंगापुर जैसी छोटी लेकिन विकसित अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरे की घंटी बज चुकी है. 'एनर्जी वर्ल्ड मैग' के अनुसार, सिंगापुर की 97 प्रतिशत ऊर्जा जीवाश्म ईंधन से आती है.

ऐसे में अगर तेल या गैस के आयात में जरा भी रुकावट आती है, तो सिंगापुर के पास कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है. यूरोप में इटली की स्थिति भी नाजुक है, जिसकी कुल गैस खपत का 10 प्रतिशत और एलएनजी आपूर्ति का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा अकेले कतर से आता है.

150 डॉलर तक जा सकती है तेल की कीमत

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, इस घेराबंदी का असर अब कीमतों पर दिखने लगा है. 7 अप्रैल को जब युद्धविराम की घोषणा हुई थी, तब ब्रेंट क्रूड करीब 75 डॉलर प्रति बैरल पर था, जो मंगलवार दोपहर तक उछलकर 99 डॉलर के करीब पहुंच गया.

Advertisement

तेल बाजार के जानकारों ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी नाकाबंदी के बाद कीमतें 140 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं. यह उछाल वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा.

यह भी पढ़ें: 'जंग अब अंत के करीब', ट्रंप का बड़ा दावा; बोले- ईरान परमाणु हथियार बना लेता तो हमें 'सर-सर' बोलना पड़ता

Featured Video Of The Day
Iran-US War: ट्रंप की होर्मुज पर नाकेबंदी से खौला ईरान का खून, फिर शुरू होगा 'महायुद्ध'?
Topics mentioned in this article