ईरान के साथ शांति वार्ता विफल होने के बाद अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में अपनी नाकाबंदी सख्त कर दी है. दुनिया के इस सबसे अहम समुद्री रास्ते पर पाबंदियों का सीधा मतलब है इससे वैश्विक ऊर्जा संकट पहले से कहीं अधिक गहरा जाएगी. जापानी निवेश बैंक 'नोमुरा' की हालिया रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इस तनाव की सबसे बड़ी मार एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने वाली है.
चीन को छोड़ दिया जाए, तो जापान और थाईलैंड जैसे देश इस संकट के मुहाने पर खड़े हैं, क्योंकि होर्मुज से गुजरने वाले कच्चे तेल और गैस का सबसे बड़ा खरीदार एशिया ही है. हालांकि भारत को ईरान का आश्वासन है कि तेल की निर्बाध सप्लाई जारी रहेगी. भारत में ईरान के राजदूत ने कहा है कि भारत सच्चा मित्र है इसलिए उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है. लेकिन तेल किस रास्ते से आएगा इसकी जानकारी नहीं है.
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जापान पर आपूर्ति का भारी संकट
नोमुरा की रिपोर्ट के मुताबिक, जापान और फिलीपींस अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल मिडिल ईस्ट से ही मंगाते हैं. वहीं, भारत की स्थिति भी थोड़ी चिंताजनक है क्योंकि भारत अपनी कुल एलएनजी (LNG) आपूर्ति का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से लाता है.
हालांकि भारत सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए रास्ते तलाश रही है. भारत ने घरेलू स्तर पर कीमतों पर काबू पाने के लिए निर्यात शुल्क बढ़ा दिया है. इसके साथ भारत सरकार ने घरेलू गैस की निर्बाध सप्लाई के लिए भी कई कदम उठाए हैं.
वहीं सिंगापुर जैसी छोटी लेकिन विकसित अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरे की घंटी बज चुकी है. 'एनर्जी वर्ल्ड मैग' के अनुसार, सिंगापुर की 97 प्रतिशत ऊर्जा जीवाश्म ईंधन से आती है.
150 डॉलर तक जा सकती है तेल की कीमत
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, इस घेराबंदी का असर अब कीमतों पर दिखने लगा है. 7 अप्रैल को जब युद्धविराम की घोषणा हुई थी, तब ब्रेंट क्रूड करीब 75 डॉलर प्रति बैरल पर था, जो मंगलवार दोपहर तक उछलकर 99 डॉलर के करीब पहुंच गया.
तेल बाजार के जानकारों ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी नाकाबंदी के बाद कीमतें 140 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं. यह उछाल वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा.
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