- अमेरिकी सेना ने उत्तरी अटलांटिक और कैरेबियन में दो टैंकर जहाजों को अवैध गतिविधियों के आरोप में कब्जे में लिया
- पहला जहाज मेरिनेरा था जो रूसी झंडे वाला था और ब्रिटेन की रॉयल नेवी ने अमेरिका को जासूसी सहायता प्रदान की
- दूसरा जहाज एम/टी सोफिया था, जिसपर कोई झंडा नहीं था और इसे कैरेबियन सागर में हैलीकॉप्टर से कब्जा किया गया
अमेरिका और रूस के बीच संबंधों में फिर से नई खटास आ गई हैं. अमेरिका की सेना ने उत्तरी अटलांटिक और कैरेबियन में "बैक-टू-बैक" ऑपरेशन चलाकर वेनेजुएला के तेल निर्यात से जुड़े दो टैंकर जहाजों को अपने कब्जे में ले लिया है.
पहला- अमेरिकी सेना लगभग दो हफ्ते तक पीछा करके के बाद रूसी झंडे वाले मेरिनेरा नाम के टैंकर जहाज पर चढ़ गई, जब यह आइसलैंड और स्कॉटलैंड के बीच समंदर के रास्ते गुजर रहा था. रूसी झंडे वाले जहाज होने का मतलब है कि यह जहाज रूस में रजिस्टर्ड था. खास बात है कि ब्रिटेन की रॉयल नेवी ने हवाई और समुद्री मार्ग से अमेरिका के लिए जासूसी की.
दूसरा- दूसरे टैंकर का नाम एम/टी सोफिया है, जिसपर अमेरिका ने कब्जा किया है. अमेरिका ने इस टैंकर पर भी "अवैध गतिविधियों का संचालन" करने का आरोप लगाया गया और उसके जवान हैलीकॉप्टर की मदद से कैरेबियन सागर में इसपर सवार हो गए और इसपर कब्जा कर लिया. इस जहाज पर कोई झंडा नहीं था.
यह कदम तब उठाया गया है जब अमेरिका वेनेजुएला के कच्चे तेल के अधिकांश निर्यात को रोकना चाहता है, और कुछ ही दिन पहले अमेरिका के स्पेशल फोर्सेज ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके महल से उठा लिया था.
ट्रंप की सेना की टैंकर पर कब्जे वाली घटना पर तुरंत अमेरिका और रूस की ओर से एक दूसरे पर जुबानी हमले शुरू हो गए. अमेरिका ने दावा किया कि वह अमेरिका के फेडरल कोर्ट द्वारा जारी वारंट को लागू करने के लिए सही ढंग से काम कर रहा है. जबकि रूस ने अपने झंडे वाले टैंकर जहाज को जब्त करने की निंदा की है, और मांग की है कि अमेरिका उसमें सवार रूसियों के साथ उचित व्यवहार करे और उन्हें शीघ्र रूस लौटने की अनुमति दे.
क्या अमेरिकी सेना ने गैरकानूनी काम किया है?
यहां यह समझना जरूरी है कि रूसी झंडे वाले टैंकर जहाज मैरिनेरा का पहले नाम बेला 1 था और 24 दिसंबर 2025 को ही उसे रूसी झंडे के साथ समुद्र से गुजरने के लिए एक अस्थायी परमिट प्राप्त हुआ था. अबतक अमेरिका वेनेजुएला के तेल ले जाने वाले जहाजों को टागरगे बनाने से पहले सावधानी से चुन रहा था. या तो उन जहाजों पर कोई झंडा नहीं था (वे स्टेटलेस थे) या उन पर झूठा झंडा फहराने का संदेह था. अगर किसी जहाज पर कोई झंडा नहीं होता या फिर वे झूठा झंडा लगाकर चलते हैं तो उन्हें समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (Unclos) के अनुच्छेद 92 के तहत कोई सुरक्षा नहीं मिली होती है.
इसलिए 24 दिसंबर से पहले तक, जब इस मैरिनेरा या बेला 1 जहाज को रूसी परमिट नहीं मिला था, यानी उसपर रूसी झंडा नहीं लगा था, अमेरिका ही नहीं कोई भी देश उसे स्टेटलेस मान सकता था. उसके पास Unclos के अनुच्छेद 92 के तहत कोई सुरक्षा नहीं थी.
द कन्वर्सेशन की रिपोर्ट के अनुसार अनुच्छेद 92 में यह भी कहा गया है कि: "एक जहाज यात्रा के दौरान या जिस बंदरगाह पर जाना है, वहां अपना झंडा नहीं बदल सकता है, जबतक कि जहाज की रजिस्ट्री में वास्तविक बदलाव न हो." इसका मतलब यह मान लिया जाता है कि यात्रा के बीच में झंडे को बदलने की - बिल्कुल भी अनुमति नहीं है. लेकिन इस अनुच्छेद को बारीकी से पढ़ने पर पता चलता है कि ऐसा नहीं है. यह कहता है कि जब रजिस्ट्रेशन में बदलाव होता है तो यात्रा के बीच भी झंडा बदला जा सकता है.
यह भी पढ़ें: समंदर में अमेरिका का मिशन 'धुरंधर'! 2 हफ्ते पीछा कर दबोचा रूसी झंडा लगा टैंकर, VIDEO














