- अमेरिका के एक म्यूजियम ने तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी 3 प्राचीन कांस्य मूर्तियां लौटाने का निर्णय लिया है.
- लौटाई जा रही मूर्तियों में चोल काल की शिव नटराज, सोमस्कंद और विजयनगर काल की संत सुंदरर विद परावई शामिल हैं.
- मूर्तियों को अवैध रूप से हटाने की पुष्टि फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने की.
अमेरिका के प्रतिष्ठित स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी की गई तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियों को भारत को लौटाने की घोषणा की है. संग्रहालय की ओर से की गई गहन रिसर्च में यह सामने आया कि इन मूर्तियों को अवैध रूप से भारतीय मंदिरों से हटाया गया था, जिन तीन मूर्तियों को वापस किया जा रहा है, उनमें चोल काल की ‘शिव नटराज' (करीब 990 ई.), ‘सोमस्कंद' (12वीं सदी) और विजयनगर काल की ‘संत सुंदरर विद परावई' (16वीं सदी) शामिल हैं. ये सभी मूर्तियां दक्षिण भारत की पारंपरिक कांस्य कला और मंदिर परंपराओं का महत्वपूर्ण उदाहरण हैं.
वॉशिंगटन स्थित म्यूजियम ने बताया कि भारत सरकार ने एक मूर्ति को लॉन्ग-टर्म लोन पर संग्रहालय में प्रदर्शित करने पर सहमति जताई है. इससे म्यूजियम को मूर्ति की उत्पत्ति, चोरी और भारत वापसी की पूरी कहानी सार्वजनिक रूप से दिखाने का अवसर मिलेगा, साथ ही रिसर्च के प्रति उसकी प्रतिबद्धता भी रेखांकित होगी.
1956 से 1959 में मंदिरा में मौजूद थीं मूर्तियां
ये मूर्तियां मूल रूप से मंदिरों में पूजा और रथ यात्रा जैसी धार्मिक परंपराओं में उपयोग की जाती थीं. ‘शिव नटराज' को संग्रहालय की प्रदर्शनी “द आर्ट ऑफ नोविंग इन साउथ एशिया, साउथईस्ट एशिया एंड द हिमालयाज” के तहत दर्शकों के लिए रखा जाएगा.
नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट की ओर से दक्षिण एशियाई संग्रह की समीक्षा के दौरान इन मूर्तियों के लेनदेन इतिहास की गहरी जांच की गई. वर्ष 2023 में फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के फोटो आर्काइव्स के सहयोग से यह पुष्टि हुई कि ये मूर्तियां 1956 से 1959 के बीच तमिलनाडु के विभिन्न मंदिरों में मौजूद थीं. इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने भी पुष्टि की कि इन्हें भारतीय कानूनों का उल्लंघन कर हटाया गया था.
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कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के कारण संभव हुई वापसी
म्यूजियम के निदेशक चेज एफ रॉबिन्सन ने कहा कि संस्थान सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संग्रह की पारदर्शिता के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने इसे एशियाई कला से जुड़े रिसर्च में एक अहम पहल बताया.
उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य अपने संग्रह में मौजूद वस्तुओं को उनकी संपूर्ण जटिलता के साथ समझना है, इसलिए हम शोध कार्यक्रम चलाते हैं जो न केवल यह पता लगाने का प्रयास करता है कि वे संग्रहालय तक कैसे पहुंचीं, बल्कि समय के साथ उनके उद्भव और आवागमन के इतिहास का भी पता लगाया जाता है. हम एशियाई कला की उत्पत्ति और वस्तुओं के इतिहास पर शोध के लिए क्षेत्र में परिभाषित पद्धतियों को स्थापित कर रहे हैं, अपने वैश्विक साझेदारों के नेटवर्क का विस्तार कर रहे हैं और विभिन्न शोध संसाधनों को एकत्रित कर रहे हैं. गहन शोध के कारण ही इन मूर्तियों की वापसी, संग्रहालय की नैतिक प्रथाओं के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है. हम भारत की सरकार के प्रति अत्यंत आभारी हैं कि उसने संग्रहालय में आने वाले लोगों के लिए लंबे समय से प्रशंसित शिव नटराज की प्रदर्शनी जारी रखने में मदद की है.
तीनों मूर्तियों की वापसी म्यूजियम की प्रोवेनेंस टीम, क्यूरेटरों और फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से संभव हो सकी है. भारत सरकार और भारतीय दूतावास के साथ मिलकर इस प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा रहा है.
ये है तीनों मूर्तियों का इतिहास
"शिव नटराज" की यह मूर्ति तमिलनाडु के तंजावुर जिले के तिरुत्तुरईपुंडी तालुक में स्थित श्री भाव औषधेश्वर मंदिर की है, जहां 1957 में इसकी तस्वीर ली गई थी. बाद में 2002 में न्यूयॉर्क स्थित डोरिस वीनर गैलरी से इस कांस्य मूर्ति को एशियाई कला के राष्ट्रीय संग्रहालय ने अधिग्रहित कर लिया. 1957 में मंदिर में मूर्ति की उपस्थिति की पुष्टि करने वाले फोटोग्राफिक साक्ष्यों के अलावा, संग्रहालय के एक शोधार्थी ने यह भी पाया कि डोरिस वीनर गैलरी ने संग्रहालय को बिक्री की सुविधा के लिए जाली दस्तावेज उपलब्ध कराए थे.
"सोमस्कंद" और "संत सुंदरार विद परवई" की मूर्तियां 1987 में आर्थर एम. सैकलर द्वारा दान की गई 1,000 वस्तुओं के हिस्से के रूप में राष्ट्रीय एशियाई कला संग्रहालय के संग्रह में शामिल हुईं. पांडिचेरी स्थित फ्रांसीसी संस्थान के फोटो अभिलेखागार में संग्रहालय की टीम द्वारा किए गए शोध से पुष्टि हुई कि "सोमस्कंद" की तस्वीर 1959 में तमिलनाडु के मन्नारकुडी तालुक के अलत्तूर गांव में स्थित विश्वनाथ मंदिर में और "संत सुंदरार विद परवई" की तस्वीर 1956 में तमिलनाडु के कल्लाकुरुच्ची तालुक के वीरसोलपुरम गांव में स्थित शिव मंदिर में ली गई थी.














