ट्रंप क्यों हुए ईरान के कायल, युद्ध की टाइम मशीन बता रही अमेरिका-इजरायल कैसे हुए घायल

ईरान युद्ध केवल दो देशों की लड़ाई नहीं, बल्कि एक हाई-लेवल चेस है. ट्रंप खुद स्वीकार करते हैं कि उनका सामना 'हाई IQ' वाले और बेहद स्मार्ट लोगों से है.

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  • ईरान युद्ध की आग अब 10 देशों तक फैल चुकी है जिनकी आबादी 21 करोड़ 60 लाख से ज्यादा है
  • अमेरिका-इजरायल के इस युद्ध की सबसे हैरान करने वाली बात हथियारों से ज्यादा प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल है
  • ईरान युद्ध अब हाई-लेवल चेस बन चुका है. ट्रंप खुद मानते हैं उनका सामना हाई IQ वाले लोगों से है
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ईरान से अमेरिका-इज़रायल की लड़ाई पूरी दुनिया में चिंता की बात बनी हुई है. 28 मार्च की सुबह 9 बजकर 45 मिनट पर जंग शुरू हुई थी. उसके बाद से दुनिया ने एक से बढ़कर एक हैरान करने वाली बातें देखी और सुनी हैं. ये लड़ाई आने वाली दुनिया का आईना है. युद्ध की दीवार पर भविष्य की शांति और अशांति का नक्शा लगा है. जैसे फिलीस्तीन और इज़रायल की लड़ाई ईरान पहुंच चुकी है. वैसे ही ईरान के साथ अमेरिका और इज़रायल की लड़ाई दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंच सकती है. ये कहने का आधार क्या है, आइए समझते हैं. 

10 देशों तक फैली जंग की आग

इस युद्ध में शामिल और प्रभावित देशों की संख्या ईरान को मिलाकर अब तक 10 हो चुकी है, जिनमें करीब 21 करोड़ 60 लाख लोग रहते हैं. ये दुनिया की आबादी का 2.66% है. ईरान को ऐसा तिराहा कहा जाता है, जहां पर एशिया यूरोप अफ्रीका आकर मिलते हैं. एशिया को यूरोप से जोड़ने वाले ऐतिहासिक व्यापार मार्ग का हिस्सा है. अफ्रीका के उत्तर से होकर आने वाले मार्ग भी ईरान के जरिए एशिया और यूरोप की ओर जुड़ते हैं. 

ये ज़मीन की कहानी है. समुद्र में आएं तो इस युद्ध का नया पन्ना खुलता है. अरब दुनिया के सात प्रमुख देश परशिय़न गल्फ से अरब सागर पर आते हैं. जहां हॉर्मुज के पास ईरान ने अपनी शक्ति का दरवाजा लगा रखा है, जो दुनिया के एनर्जी बजट को बनाने और बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाता है. अब इस स्थिति में ईरान के साथ युद्ध की टाइम मशीन में ट्रैवल करते हैं और भविष्य के लिए क्या संकेत हैं, ये समझने की कोशिश करते हैं.

प्रोपेगेंडा और फेक न्यूज का हथियार

इस युद्ध की सबसे हैरान करने वाली बात हथियारों से ज्यादा प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल है. इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अपने 'जिंदा होने के सबूत' देने पड़ रहे हैं. ईरान की IRGC ने दावा किया था कि वह नेतन्याहू को खत्म कर देगी, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनके निधन की अफवाहें आग की तरह फैल गईं. नेतन्याहू ने एक वीडियो जारी किया जिसमें वह कॉफी पीते और लोगों से मिलते दिखे, लेकिन तकनीक के दौर में इसे भी 'AI डीपफेक' करार दे दिया गया. लोग उंगलियों की गिनती और बालों के स्टाइल पर सवाल उठाने लगे. यह दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में मिसाइल से ज्यादा घातक संदेह का वह बीज है, जो जनता के मन में बोया जाता है.

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अमेरिका की रिजीम चेंज रणनीति

राष्ट्रपति ट्रंप और इज़राइल की रणनीति स्पष्ट है- ईरान के नेतृत्व को खत्म करो, सिस्टम खुद गिर जाएगा. इज़राइल ने दावा किया कि उसने अयातुल्लाह के सुरक्षा सलाहकार अली लारीजानी और बासिज फोर्स के प्रमुख गुलाम रज़ा सुलेमानी को मार गिराया है. ट्रंप का तर्क है कि नेतृत्व विहीन ईरान ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगा. उन्होंने खुलेआम कहा कि उनके पास अब कोई लीडरशिप नहीं बची, हमने यह पूरी दुनिया की भलाई के लिए किया है.

ईरान की रणनीति हालांकि इससे बिल्कुल अलग है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार, ईरान का सिस्टम व्यक्तियों पर नहीं बल्कि मजबूत संस्थाओं पर टिका है. उनका कहना है कि एक नेता के जाने से युद्ध नहीं रुकता. 1556 के पानीपत युद्ध (हेमू की हार) के उलट, जहां राजा के गिरते ही सेना भाग खड़ी हुई थी, ईरान 'पुष्पा' वाले तेवर में आज भी डटा हुआ है.

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होर्मुज़ को बनाया हथियार

युद्ध का सबसे संवेदनशील हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ है. दुनिया के पेट्रोलियम का 20%, LPG का 29% और LNG का 20% होर्मूज से होकर जाता है. ईरान ने इसे अपना 'शक्ति द्वार' बना लिया है. समुद्र में माइन्स बिछाकर और आत्मघाती नावों के जरिए ईरान ने वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है. जब अमेरिका ने ईरान के खर्ग आईलैंड पर हमला किया तो जवाब में अमेरिका के सबसे आधुनिक युद्धपोत जेराल्ड आर फोर्ड को भी पीछे हटना पड़ा. ईरान का दावा है कि उसके ड्रोन और मिसाइलों ने अमेरिकी सुपरपावर के घमंड को चकनाचूर कर दिया है. ईरान ने बहरीन, यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान, इराक, जॉर्डन और सीरिया पर मिसाइल और ड्रोन हमले करके युद्ध को अरब देशों तक फैला दिया. एक क्षेत्रीय घटना विश्व की समस्या बन गयी. 

नाटो और अमेरिका में बढ़ती दूरी

इस युद्ध ने अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेला भी किया है. जब ट्रंप ने होर्मुज़ से माइन्स हटाने के लिए नाटो देशों से मदद मांगी तो ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे सहयोगियों ने साफ मना कर दिया. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्त्ज ने साफ कहा कि बमबारी समाधान नहीं है. यहां तक कि अमेरिका के नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के डायरेक्टर जो केन्ट ने यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि यह युद्ध अनुचित और अवैध है. वैसे ट्रंप से लगातार ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या वो ये युद्ध इज़रायल के दबाव में लड़ रहे हैं. दूसरा सवाल ये भी है कि आखिर ऐसा क्या खतरा था कि ईरान पर ऐसा भीषण हमला करना पड़ा तब जबकि ईरान परमाणु वार्ताओं में शामिल था. 

युद्ध और शतरंज के मोहरे

ईरान युद्ध केवल दो देशों की लड़ाई नहीं, बल्कि एक हाई-लेवल चेस है. ट्रंप खुद स्वीकार करते हैं कि उनका सामना 'हाई IQ' वाले और बेहद स्मार्ट लोगों से है. ईरान ने दिखा दिया कि सस्ती लागत वाले ड्रोन (16-50 लाख रुपये) से करोड़ों रुपये की अमेरिकी मिसाइलों को बेकार किया जा सकता है. महाभारत के युद्ध की तरह जहां युधिष्ठिर के आधे सच ने द्रोणाचार्य को शस्त्र डालने पर मजबूर कर दिया था, आज का डिजिटल युद्ध भी वैसी ही सूचनाओं पर टिका है. इज़राइल की यूनिट 8200 ने ईरान के फाइबर नेटवर्क को हैक किया, थर्मल मॉनिटरिंग की और फिर बंकरों पर हमला किया. ट्रंप इसे बेहतरीन आर्ट कहते है, जबकि ईरान इसे अपनी चालाकी से इकोनॉमिक वॉर में बदल रहा है. युद्ध के हर एक बम, हर एक मिसाइल, हर ड्रोन अब दुनिया की शतरंज पर मोहरे में बदल चुका है. इस खेल में शह और मात का फैसला ईरान की हार या जीत से आगे होगा. 

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