अमेरिका-इजरायल-ईरान ने किया युद्धविराम, कौन बना 'बाजीगर'

पिछले 40 दिन से जारी अमेरिका-इजरायल और ईरान का युद्ध फिलहाल रुक गया है. दोनों पक्षों ने दो हफ्ते के युद्ध विराम पर सहमति जताई है. आइए जानते हैं कि इस लड़ाई में किसे क्या नुकसान उठाना पड़ा और कौन जीता, कौन हारा.

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नई दिल्ली:

अमेरिका और ईरान ने दो हफ्ते के युद्ध विराम की घोषणा की है. इस युद्ध विराम में इजरायल भी शामिल है. युद्ध विराम समझौते की शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं हुई हैं. लेकिन अभी दोनों पक्ष इसे अपनी-अपनी जीत बता रहे हैं. लेकिन यह सत्य है कि इस युद्ध में दोनों पक्षों को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा है. 

अमेरिका और इजरायल ने ईरान में सत्ता परिवर्तन के उम्मीद से हमला किया था. उन्हें उम्मीद थी कि आयतुल्लाह अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान बिखर जाएगा और वो अपनी कठपुतली सरकार वहां बैठा पाने में कामयाब होंगे. लेकिन ऐसा वहां नहीं हो पाया. खामेनेई के निधन के बाद भी ईरान पूरी ताकत के साथ अमेरिका और इजरायल से लड़ा. वहां कोई नागरिक विद्रोह भी नहीं हुआ. ऐसे में अमेरिका और इजरायल ईरान में अपना लक्ष्य हासिल कर पाने में कामयाब नहीं हो पाए. वहीं ईरान की बात करें तो उसने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ लड़ाई लड़ी. उसने इजरायल और खाड़ी के देशों में अमेरिकी ठिकानों को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया. यह ईरान के लिए एक तरह से जीत की ही तरह है. हालांकि उसे काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है. अमेरिका और इजरायल ने ईरान के रणनीतिक महत्व के केंद्रों और ऊर्जा संसाधनों पर बमबारी कर उन्हें तबाह कर दिया. इसके साथ ही दोनों ने ईरान के परमाणु केंद्रों पर हमला कर उसके परमाणु कार्यक्रमों को दशकों पीछे पहुंचा दिया है. यह ईरान के लिए एक तरह से हार की तरह है.

किसे कितना हुआ नुकसान

मिडिल ईस्ट में करीब 40 दिन तक चला यह युद्ध नुकसान के लिए भी जाना जाएगा. दोनों तरफ को सैन्य साजो-सामान का भारी नुकसान उठाना पड़ा है. लेकिन अगर इसे लागत के नजरिए से देखेंगे तो अमेरिका और इजरायल घाटे में दिखाई देंगे. इस युद्ध में ईरान ने अमेरिका के एफ-15 और एफ-35 जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों,  हवा में विमानों में ईंधन भरने वाले केसी-135 विमान, कई तरह के हेलिकॉप्टर इस युद्ध में तबाह हो गए. एफ-15 और एफ-35 को अमेरिका दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान कहकर बेचता है. लेकिन ईरान ने उन्हें अपने सस्ते ड्रोन से ही उन्हें निशाना बना दिया. इससे इन विमानों को लेकर बनाई गई छवि को गहरा धक्का लगा है. अमेरिका अब इन विमानों को अपराजेय बताकर नहीं बेच पाएगा. 

इसके अलावा इस युद्ध में अमेरिका और इजरायल की हवाई सुरक्षा प्रभाणी भी उतनी असरदार नजर नहीं आई, जैसा कि दावा किया जा रहा था. ईरान ने शाहेद नाम के अपने सस्ते ड्रोन इजरायल और खाड़ी के देशों में उड़ाए उसे इंटरसेप्ट और हवा में ही निष्क्रिय करने के लिए अमेरिका और इजरायल को अपनी महंगी मिसाइले और एयर डिफेंस सिस्टम को सक्रिय करना पड़ा. इसके बाद भी ईरान के बहुत से शाहेद ड्रोन अपने लक्ष्यों को भेदने में कामयाब रहे. इस वजह से अब अमेरिका की एयर डिफेंस प्रणाली थॉड और इजरायल की एयर डिफेंस प्रणाली आयरन डोम की विश्वसनीयता को लेकर दुनिया में संदेह पैदा हुआ है. इसके विपरीत पाकिस्तान के खिलाफ चलाए गए भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' में भारत के स्वदेशी  एयर डिफेंस सिस्टम और रूसी एस-400 ने काफी सटीक काम किया था. पाकिस्तान की ओर से करीब 800 प्रोजेक्टाइल फायर किए गए थे, इनमें से इक्का-दुक्का को छोड़कर बाकी के सभी को भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने हवा में नष्ट कर दिया था.  

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क्या ईरान के साथ युद्ध से डोनाल्ड ट्रंप का कद घटा है

अमेरिका इस युद्ध में ऐसे समय शामिल हुआ, जब इसी साल वहां मिड टर्म इलेक्शन होने वाले हैं. युद्ध के दौरान अमेरिका में कराए गए कई सर्वेक्षणों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में काफी कमी दिखाई गई है. वहीं ऐसे अमेरिकियों की संख्या अधिक है, जो इस युद्ध को गैर जरूरी मानते हैं और इसे अधिक खर्चीला बता रहे हैं. इस सबसे घबराकर राष्ट्रपति ट्रंप ने मंगलवार को एक ऐसी धमकी दे दी,जैसी धमकी आज तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं दिया था. ट्रंप ने कहा ईरानी सभ्यता को हमेशा के लिए खत्म कर देंगे,  जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकेगा. उनके इस बयान की काफी निंदा हुई. यहां तक कि उन्हें उनके पद से हटाने तक की मांग होने लगी. उनके आलोचकों में उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भी कुछ सदस्य शामिल थे. कई रिपब्लिकन सासंद ने यहां तक कह दिया कि अगर ट्रंप सभ्यता खत्म करने वाली धमकी पर आगे बढ़ते हैं तो वह एक बहुत बड़ी गलती साबित होगी. हालांकि युद्ध विराम के बाद यह कह सकते हैं कि यह धमकी काम कर गई. इस सबके बावजूद अगर यह युद्ध विराम स्थायी शांति में बदल जाती है तो यह अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की छवि को थोड़ा बदलने का भी काम कर सकती है. 

क्या अमेरिका और इजरायल में मतभेद है

इजरायल ने 18 मार्च को ईरान के साउथ पार्स पर हमला किया. यह दुनिया में प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा क्षेत्र है. इसके बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक सख्त बयान जारी कर कहा कि इजरायल ने उन्हें इस हमले के बारे में कुछ नहीं बताया था. ट्रंप ने एक ईरानी तेल डिपो पर हुए हमले को लेकर भी नाराजगी जताई थी.उन्होंने इजरायल को ऐसे हमले दुबारा न करने की ताकीद की थी. यह दोनों मामले इस तरफ इशारा कर रहे थे कि अमेरिका और इसरायल में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. लेकिन ट्रंप के बयान देने की जो आदत है, उसे देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी.  हालांकि ट्रंप के बयान के बाद इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि गैस फिल्ड पर हमला उनके देश ने अकेले ही की थी. नेतन्याहू  बार-बार राष्ट्रपति ट्रंप के साथ ईरान के मुद्दे पर एकजुट दिखाने की कोशिश की. उन्होंने यह बताने की भी कोशिशें की कि ट्रंप ही अभियान को लीड कर रहे हैं. 

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क्या ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी सेना में कोई मतभेद है

युद्ध के बीच ही अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ रैंडी जॉर्ज से इस्तीफा मांग लिया. रैंडी जॉर्ज को ट्रंप के पूर्ववर्ती जो बाइडेन ने 2023 में आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त किया था.वो इराक और अफगानिस्तान में लड़ चुके थे. अमेरिका में आमतौर पर आर्मी चीफ का कार्यकाल चार साल के लिए होता है, लेकिन रैंडी जॉर्ज अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए. ट्रंप प्रशासन ने रैंडी जॉर्ज के अलावा दो अन्‍य सैन्‍य अधिकारियों को भी उनके पद से हटा दिया था. इस कदम ने सबको हैरान कर दिया, क्योंकि यह कार्रवाई ऐसे समय की गई जब राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार यह दावा कर रहे थे कि अमेरिका ने अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया है. वो यह भी कह रहे थे कि यह युद्ध जल्द ही खत्म होने वाला है. ट्रंप प्रशासन की इस कार्रवाई से इस बात के संकेत गए कि सरकार और सेना के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.  

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