फाइटर जेट गंवाने के बाद आर-पार के मूड में अमेरिका, ईरान में उतारा सबसे घातक मिसाइलों का जखीरा; क्यों पड़ी जरूरत?

चार हफ्तों में अमेरिका ने 1000 से अधिक JASSM-ER मिसाइलें इस्तेमाल की हैं. इनकी कीमत प्रति यूनिट लगभग 15 लाख डॉलर है, जिससे उनकी उत्पादन क्षमता पर दबाव बढ़ा है.

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  • अमेरिका ने अपनी JASSM-ER क्रूज मिसाइलों का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट में ईरान के खिलाफ तैनात कर दिया है
  • मार्च के अंत तक अमेरिका ने अपने 2300 JASSM-ER मिसाइलों में से अधिकांश ईरान के मोर्चे पर भेज दीं हैं
  • अमेरिका ने महज चार हफ्तों में 1000 से अधिक JASSM-ER मिसाइलें दाग दी हैं
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ईरान के साथ जारी जंग अब उस मुकाम पर पहुंच गई है जहां अमेरिका ने अपने तरकश के सबसे खतरनाक तीर निकालने शुरू कर दिए हैं. पेंटागन ने अपनी सबसे मारक और लंबी दूरी की 'JASSM-ER' क्रूज मिसाइलों का रुख ईरान की तरफ कर दिया है. ये मिसाइलें इतनी खतरनाक हैं कि दुश्मन के रडार की पकड़ में आए बिना सैकड़ों मील दूर से ही तबाही मचा सकती हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका ने अपनी इन मिसाइलों का बड़ा जखीरा प्रशांत महासागर में बसे बेस से हटाकर मिडिल ईस्ट भेजना शुरू कर दिया है.

सूत्रों के मुताबिक़, मार्च के आखिरी हफ्ते में इन मिसाइलों को शिफ्ट करने का आदेश जारी किया गया. अमेरिका के पास जंग से पहले कुल 2,300 JASSM-ER मिसाइलों का स्टॉक था. इनमें से अब दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए महज 425 ही बचेंगी. बाकी का बड़ा हिस्सा ईरान के खिलाफ मोर्चे पर तैनात किया जा रहा है.

'सुपरपावर' अमेरिका का खाली हो रहा हथियारों का जखीरा

ये जंग कितनी भीषण है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज चार हफ्तों में अमेरिका ने 1,000 से ज्यादा JASSM-ER मिसाइलें दाग दी हैं. यह वही मिसाइल है जिसकी एक यूनिट की कीमत लगभग 15 लाख डॉलर (करीब 12.5 करोड़ रुपये) है.

600 मील से ज्यादा की मारक क्षमता रखने वाली यह मिसाइल अमेरिकी बॉम्बर्स को दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज से सुरक्षित रखती है. लेकिन जिस रफ्तार से ये खर्च हो रही हैं, उन्हें दोबारा बनाना नामुमकिन सा लग रहा है. लॉकहीड मार्टिन कंपनी साल भर में जितनी मिसाइलें बनाती है, उससे कई गुना ज्यादा तो कुछ ही हफ्तों में इस्तेमाल हो चुकी हैं.

सिर्फ हमलावर मिसाइलें ही नहीं, बल्कि बचाव करने वाले इंटरसेप्टर का भी कम पड़ने लगा है. ईरान ने अब तक करीब 1,600 बैलिस्टिक मिसाइलें और 4,000 के करीब शाहेद ड्रोन दागे हैं. इनसे बचने के लिए हजारों की तादाद में पैट्रियट और थाड (THAAD) मिसाइलों की जरूरत है. अमेरिका और इजरायल ने दावा जरूर किया है कि उन्होंने ईरान के हवाई रक्षा तंत्र को मिट्टी में मिला दिया है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है.

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ईरान के हमले अमेरिका को कर रहे हैं परेशान

भले ही अमेरिका अपनी हवाई ताकत का लोहा मनवाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन ईरान ने भी सख़्त तेवर दिखाए हैं. बीते दिनों अमेरिका का F-15E स्ट्राइक फाइटर जेट ईरान ने मार गिराया गया. इतना ही नहीं, एक A-10 अटैक जेट और रेस्क्यू के लिए निकले दो हेलीकॉप्टर भी ईरानी अटैक की चपेट में आ गए. इसके अलावा ईरान ने अब तक अमेरिका के 12 से ज़्यादा MQ-9 रीपर ड्रोन भी तबाह कर दिए हैं.

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अमेरिकी जनरल डैन केन ने संकेत दिया है कि अब आसमान साफ है और B-52 बमवर्षक ईरान के ऊपर से उड़ान भर रहे हैं, ताकि सस्ते JDAM बमों से हमला किया जा सके.

लेकिन जानकारों का मानना है कि अगर आसमान वाकई साफ होता तो अमेरिका को इतनी महंगी 'स्टैंड-ऑफ' (दूर से वार करने वाली) मिसाइलों की जरूरत नहीं पड़ती. स्टिमसन सेंटर की फेलो केली ग्रीको का कहना है कि पुराने B-52 विमानों का अब उड़ान भरना कई सवाल खड़े करता है.

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