बांग्लादेश में चुनाव और बदलते गठबंधन- भारत से रिश्ते के लिए क्या मायने?

बांग्लादेश के आम चुनाव भारत के साथ उसके रिश्तों की दिशा भी तय करेंगे. शेख हसीना के जाने के बाद जमात बनाम बीएनपी की टक्कर, पाकिस्तान की बढ़ती दिलचस्पी और भारत की संतुलित कूटनीति- सबकी नजरें ढाका पर टिकी हैं.

विज्ञापन
Read Time: 5 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • शेख हसीना की सत्ता से बेदखली से बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है, भारत से रिश्ते भी नए मोड़ पर हैं.
  • इस बार चुनाव में जमात और BNP आमने-सामने हैं, जबकि अवामी लीग बाहर. इससे सत्ता संतुलन पूरी तरह बदल सकता है.
  • भारत हालात पर नजर रखते हुए हर नतीजे के लिए तैयार है और रिश्ते बनाए रखने की नीति पर कायम है.
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

पिछले साल अगस्त में बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ, जब प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी. हालात इतने खराब हो गए कि वे भारत आ गईं और यहां राजनीतिक शरण ली. तब से वे भारत में ही रह रही हैं. 5 अगस्त 2024 को उन्होंने पद छोड़ा और दिल्ली पहुंचीं. इसके बाद भारत-बांग्लादेश रिश्तों में ठंडापन आ गया. इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि बांग्लादेश का जन्म 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ हुए मुक्ति संग्राम से हुआ था, जिसमें भारत ने खुलकर साथ दिया था और युद्ध में पाकिस्तान को हराया था.

जमात की एंट्री और 1971 वाला सवाल

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इस्लामी कट्टरपंथी पार्टी जमात बांग्लादेश को पुराने दौर में ले जाना चाहती है? क्या वे 1971 से पहले जैसी सोच और राजनीति लौटाना चाहते हैं? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि आज बांग्लादेश में आम चुनाव हो रहे हैं और साथ ही जुलाई जनमत संग्रह भी चला, जिसमें लोग वोट डाल रहे हैं.

भारत क्यों परेशान है और पाकिस्तान की चाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि भारत-बांग्लादेश रिश्ते मजबूत बने रहें. भले ही बांग्लादेश छोटा देश है, लेकिन उसकी रणनीतिक जगह बहुत अहम है. इधर पाकिस्तान बांग्लादेश में अपना असर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. हाल के महीनों में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई के लोग ढाका आए. यूनुस की कार्यवाहक सरकार के दौरान कराची से ढाका के बीच उड़ानें भी शुरू हुईं. इससे सवाल उठने लगे हैं कि क्या यूनुस बांग्लादेश की दिशा बदलना चाहते हैं?

ये भी पढ़ें: शफीकुर रहमान: प्रतिबंध से प्रधानमंत्री पद की रेस तक, बांग्लादेश का इस्लामिक चेहरा, विवाद भी साथ

बांग्लादेश के आम चुनाव में 12 फरवरी 2026 को मतदान हुआ
Photo Credit: AFP

बीएनपी बनाम जमात, अवामी लीग बाहर

इस बार बांग्लादेश की राजनीति का सबसे बड़ा मुकाबला बीएनपी और जमात के बीच है. इतिहास में पहली बार जमात अकेले चुनाव लड़ रही है. पहले वह बीएनपी के साथ रहती थी, लेकिन अब दोनों आमने-सामने हैं. शेख हसीना की अवामी लीग को इस बार चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं मिली है. खुद हसीना ने पार्टी नेताओं से कहा है कि वे निर्दलीय उम्मीदवार भी न बनें. इसलिए इस बार चुनाव में अवामी लीग का निशान नहीं दिख रहा. फिर भी पार्टी नेता लगातार कह रहे हैं कि जमात को हराना जरूरी है.

क्यों बीएनपी पर नजर और जमात की रणनीति

शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद जॉय का कहना है कि बीएनपी व्यापार समर्थक पार्टी है और 1971 के युद्ध को मानती है, भले ही उसका अवामी लीग से राजनीतिक झगड़ा रहा हो. इसलिए अगर अवामी लीग के वोट इधर-उधर होते हैं, तो बीएनपी उनके लिए बेहतर विकल्प हो सकती है. माना जा रहा है कि अगर जमात सत्ता में आई तो हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ सकते हैं और पाकिस्तान का असर भी बढ़ेगा, जो भारत के लिए ठीक नहीं होगा. हालांकि जमात पूरे देश में यह कहकर प्रचार कर रही है कि जनता बीएनपी और अवामी लीग दोनों को आजमा चुकी है.

युवाओं को साधने में जुटी जमात

जमात खुद को एक नई और विचारधारा आधारित पार्टी बता रही है. वह भ्रष्टाचार-मुक्त बांग्लादेश का वादा कर रही है. युवाओं को जोड़ने के लिए उसने अपने छात्र संगठन को आगे किया है और नई पीढ़ी से अपील कर रही है कि वे बीएनपी और अवामी लीग दोनों को नकार दें.

Advertisement

ये भी पढ़ेंः बांग्लादेश आम चुनाव 2026: आज वोटिंग, भारत के दांव पर क्या और कैसे बदलेगा दक्षिण एशिया का शक्ति संतुलन?

भारत की सतर्क लेकिन संतुलित नीति

भारत सरकार इस पूरे हालात को संभलकर देख रही है. एक तरफ बीजेपी जमात की कट्टर नीतियों का विरोध करती है और मानती है कि इससे हिंदू अल्पसंख्यकों पर खतरा बढ़ सकता है. दूसरी तरफ जमात लगातार भारत से संपर्क में है. चुनाव से ठीक पहले जमात के नेताओं ने भारतीय मीडिया से कहा, “हम भारत विरोधी नहीं हो सकते. 140 करोड़ की आबादी वाले देश भारत से रिश्ते बनाए रखना जरूरी है.”

Advertisement

भारत की रणनीति क्या है?

भारत की सोच स्पष्ट है कि चुनाव में जो भी जीते, उससे रिश्ते बनाए जाएंगे. यानी बीएनपी या जमात, जो भी सत्ता में आए, भारत उससे बातचीत जारी रखेगा. दोनों देशों के बीच व्यापार, साझेदारी और सांस्कृतिक रिश्ते चलते रहेंगे. जैसे भारत ने अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत की, वैसे ही जरूरत पड़ने पर जमात से भी करेगा.

बांग्लादेश में आगे क्या हो सकता है?

भारत की निगाहें बांग्लादेश चुनाव पर टिकी हैं. वहां के नतीजों से चार स्थिति पैदा हो सकती है. पहली, बीएनपी को बहुमत मिले और वह अकेले सरकार बनाए, तब खालिदा जिया के बेटे तारिक प्रधानमंत्री बनें. दूसरी, जमात को बहुमत मिले और उसकी सरकार बने. तीसरी, किसी को बहुमत न मिले, तब बीएनपी-जमात और छात्र संगठन मिलकर गठबंधन सरकार बनाएं. चौथी स्थिति में एक राष्ट्रीय सरकार बने, जिसमें यूनुस प्रधानमंत्री या कार्यवाहक प्रमुख हों और बाद में फिर चुनाव कराए जाएं. भारत फिलहाल हर विकल्प के लिए तैयार है और नतीजों के हिसाब से अपनी रणनीति बदलेगा.

Advertisement
Featured Video Of The Day
Peeragarhi Case वाले बाबा कमरुद्दीन के हाथ में जहर वाले लड्डू का CCTV फुटेज | Delhi Murder Case