बांग्लादेश के नये 'धुरंधर' Tarique Rahman कौन? जानिए भारत से कैसे होंगे संबंध और टकराव के मुद्दे

रहमान "अर्थव्यवस्था-आधारित विदेश नीति" पर जोर देते हैं, जो बांग्लादेश के हितों को सर्वोपरि रखती है, और निर्भरता के बजाय "आपसी सम्मान, आपसी समझ, समानता और आपसी लाभ" पर आधारित संबंध चाहती है.

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तारिक रहमान को बांग्लादेश में हर वर्ग का समर्थन मिला है खासकर महिलाओं और अल्पसंख्यकों का.
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  • पूर्व PM खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान की पार्टी बीएनपी ने बांग्लादेश आम चुनाव में बहुमत हासिल किया है
  • तारिक रहमान ने 1971 के मुक्ति युद्ध में भाग लिया और राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1988 में की थी
  • 2007 में सैन्य शासन के दौरान उन्हें झूठे आरोपों के कारण गिरफ्तारी और निर्वासन का सामना करना पड़ा था
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पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान बीर उत्तम के बेटे तारिक रहमान की पार्टी बीएनपी ने आम चुनाव में बहुमत हासिल कर लिया है. बीएनपी गठबंधन को 216 सीटें, तो जमात गठबंधन को 76 सीटें मिली हैं. इंडिपेंडेंट और अदर्स के हिस्से में 7 सीटें आईं हैं. जाहिर है बीएनपी चीफ होने की वजह से तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना अब तय है. 

तारिक रहमाम पूर्व में पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष, वरिष्ठ उपाध्यक्ष और वरिष्ठ संयुक्त सचिव के रूप में कार्य कर चुके हैं. उनकी लगभग 60 वर्ष की आयु है.  उनका जन्म 20 नवंबर, 1965 को हुआ और वे बांग्लादेश की मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुए सबसे कम उम्र के युद्धबंदियों में से एक थे. 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान उन्हें, उनकी मां और उनके भाई को अन्य बंगाली सैन्य अधिकारियों के परिवार के सदस्यों के साथ गिरफ्तार किया गया था.

शिक्षा

ढाका के बीएएफ शाहीन कॉलेज से प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने 1980 के दशक में ढाका विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय संबंध विभाग में दाखिला लिया.

राजनीतिक यात्रा

वे 1988 में बीएनपी में एक आम सदस्य के रूप में शामिल हुए. उन्होंने जमीनी स्तर पर लोगों को संगठित किया और एच.एम. इरशाद की सरकार को गिराने में योगदान दिया. उन्होंने 1991 के चुनाव से पहले अपनी मां बेगम खालिदा जिया के साथ देश के लगभग हर जिले में प्रचार किया और चुनाव जीता. इसी चुनाव के बाद उनकी मां बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. अध्यक्ष के बेटे होने और जमीनी स्तर पर व्यापक समर्थन प्राप्त होने के बावजूद, उन्होंने भाई-भतीजावाद के बल पर कोई सार्वजनिक पद ग्रहण नहीं किया और पार्टी के जमीनी स्तर को सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित किया.

कथित राजनीतिक हमला

2007 में, अवामी लीग समर्थित सैन्य शासन द्वारा सत्ता पर कब्जा करने के बाद, तारिक रहमान को कथित तौर पर निशाना बनाया गया था.आरोप लगाया गया था कि कार्यवाहक सरकार के प्रमुख लोगों ने भ्रष्टाचार-विरोधी आयोग सहित कई कार्यालयों के अधिकारियों पर रहमान के खिलाफ झूठे आरोप लगाने के लिए दबाव डाला था.

देश छोड़ना

हिरासत में उन्हें यातनाएं दी गईं और बेहतर इलाज के लिए उन्हें 2008 में देश छोड़ना पड़ा. उन्होंने अपना अधिकांश निर्वासन लंदन में बिताया.

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बीएनपी को दोबारा खड़ा किया

वे 2009 में बीएनपी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष चुने गए और धीरे-धीरे बीएनपी के पुनर्गठन में शामिल हो गए. 2018 में, जब उनकी मां, तीन बार की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया को झूठे आरोपों में जेल में डाल दिया गया, तो उन्हें पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में नामित किया गया. तब से वे शेख हसीना के खिलाफ लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे.

बांग्लादेश वापसी

25 दिसंबर 2025 को, 17 वर्षों के निर्वासन के बाद, वे बांग्लादेश लौटे. राजधानी के हवाई अड्डे से स्वागत स्थल तक हजारों समर्थकों ने पार्टी के झंडे लहराते हुए, तख्तियां, बैनर और फूल लिए हुए, रहमान का स्वागत करते हुए नारे लगाए. बेगम खालिदा जिया के निधन के बाद, तारिक रहमान ने पार्टी अध्यक्ष का पदभार संभाला.

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परिवार

1994 में, तारिक रहमान ने डॉ. जुबैदा रहमान से विवाह किया, जो बांग्लादेश नौसेना के पूर्व प्रमुख और दो बार मंत्री रहे स्वर्गीय रियर एडमिरल महबूब अली खान की पुत्री हैं. जुबैदा रहमान एक योग्य हृदय रोग विशेषज्ञ हैं और उन्होंने ढाका मेडिकल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की है. उनकी एक बेटी है, जिसका नाम ज़ैमा जर्नाज रहमान है.

तारिक रहमान (बीएनपी) की जीत के भारत पर प्रभाव

प्रमुख मुद्दे

  • भारत द्वारा शेख हसीना को संरक्षण,
  • सीमा संबंधी मुद्दे (हत्याएं, विवाद आदि)
  • अवैध रूप से घुसपैठ (लोगों की कथित जबरन वापसी)
  • तस्करी और अवैध गतिविधियां
  • नदी जल बंटवारे के अनसुलझे मुद्दे (उदाहरण के लिए, तीस्ता नदी विवाद)
  • बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों (हिंदुओं) की हत्याएं विवाद के मुख्य मुद्दे हैं.

बांग्लादेश में कब कौन पार्टी जीती

वर्तमान स्थिति

  1. बांग्लादेश और भारत के संबंध दो पहलुओं पर टिके हैं: व्यापार, ऊर्जा और संपर्क का एक जटिल जाल को दोनों पक्ष आसानी से काट नहीं सकते. दूसरा बांग्लादेश में राजनीतिक रूप से उत्तेजित जनमानस, जो शेख हसीना के भारत भाग जाने के बाद से भारत के प्रति बेहद संशयपूर्ण हो गया है.
  2. भारत के प्रति बीएनपी का सामान्य रुख:  बीएनपी "भारत गो आउट" की लोकप्रिय भावना का भरपूर लाभ उठा रही है और खुद को बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ राष्ट्रीय संप्रभुता के रक्षक के रूप में स्थापित कर रही है.
  3. शेख हसीना का मामला: शेख हसीना सत्ता से बेदखल होने के बाद से भारत में हैं. बीएनपी के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से तर्क दिया है कि भारत में उनकी उपस्थिति द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचा सकती है.
  4. तारिक रहमान ने खुद इसे एक ऐसी राजनीतिक वास्तविकता बताया है, जिसे दिल्ली नजरअंदाज नहीं कर सकती, उनका कहना है कि यदि भारत एक तानाशाह को शरण देता है, तो उसे बांग्लादेशियों के गुस्से का सामना करना पड़ेगा.
  5. भारतीय सुरक्षा संबंधी चिंताएं: बीएनपी नेताओं ने सुरक्षा मुद्दों पर भारत को आश्वस्त करने का प्रयास किया है. एक साक्षात्कार में, बीएनपी के मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने कहा कि बीएनपी बांग्लादेश की धरती पर ऐसी किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं देगी जो भारत की सुरक्षा को खतरे में डालती हो.
  6. बांग्लादेश पर चीन का बढ़ता प्रभाव: फरवरी 2026 में रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया था कि भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध कमजोर होने के कारण चीन बांग्लादेश में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए तैयार है. रिपोर्ट में चीन की बढ़ती सक्रियता और 2024 से भारत विरोधी भावना के व्यापक माहौल का हवाला दिया गया था. इसका मतलब यह नहीं है कि बांग्लादेश 'भारत के बजाय चीन को चुन रहा है.' इसका मतलब यह है कि ढाका विकल्पों का विस्तार करके सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, और भारत को ऐसी कूटनीति से जवाब देना होगा जो परिणामों के मामले में प्रतिस्पर्धी हो. 
  7. हसीना काल के समझौतों पर सवाल: हसीना के पतन के बाद, बीएनपी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से भारत के साथ हसीना काल के समझौतों को रद्द करने की मांग की, उन्हें गुप्त और अन्यायपूर्ण बताया. भले ही सभी सौदे भारत को लक्षित न हों, लेकिन भारत से जुड़े कुछ समझौते घरेलू राजनीतिक निशाने पर आ सकते हैं.

तारिक रहमान (बीएनपी) का भारत के प्रति रुख

कुल मिलाकर, रहमान का रुख स्वाभाविक रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं है, बल्कि राष्ट्रवादी और व्यावहारिक है. रहमान "अर्थव्यवस्था-आधारित विदेश नीति" पर जोर देते हैं जो बांग्लादेश के हितों को सर्वोपरि रखती है, और निर्भरता के बजाय "आपसी सम्मान, आपसी समझ, समानता और आपसी लाभ" पर आधारित संबंध चाहती है - "न दिल्ली, न पिंडी". उन्होंने भारत को एक "अपरिहार्य पड़ोसी" बताया है, जिसके साथ बांग्लादेश को आर्थिक और रणनीतिक कारणों से "बहुत अच्छे संबंध" रखने की आवश्यकता है. रहमान ने भारत के साथ "मुद्दों" को स्वीकार किया है, लेकिन पारस्परिक आधार पर संबंधों के पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया है.

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