- समुद्र के नीचे पनडुब्बी आपके बिल्कुल पास हो सकती है, आपके पास से गुजर रही होगी पर आपको पता भी नहीं चलेगा.
- आधुनिक परमाणु पनडुब्बियां महीनों तक सतह पर आए बिना रह सकती हैं. वे परमाणु ऊर्जा से चलती हैं.
- पनडुब्बियां दुश्मन को दिखे बिना तबाह कर सकती हैं और सबसे बड़ी बात, वे परमाणु हमले के बदले की आखिरी गारंटी हैं.
अमेरिका ने दावा किया है कि उसने ईरानी युद्धपोत को टॉरपीडो अटैक से हिंद महासागर में डुबो दिया है. हालांकि अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने युद्धपोत का नाम नहीं बताया पर उनके इस दावे की पुष्टि श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय के सचिव एयर वाइस मार्शल सम्पथ थुइयाकोंठा ने की और संसद में श्रीलंकाई विदेश मंत्री ने बताया कि आईआरआईएस डेना (IRIS Dena) से आपातकालीन संकेत मिले हैं. बाद में ये भी बताया कि 80 शव मिले हैं. अपनी मौत से कुछ दिन पहले, IRIS डेना के ईरानी नाविकों ने भारत की नेवल एक्सरसाइज में मार्च किया था. ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस डेना भारत में युद्धाभ्यास करके लौट रहा था. श्रीलंका के पास एक अमेरिकी सबमरीन ने उनके जहाज पर टॉरपीडो से हमला किया. 180 लोगों के क्रू में से कम से कम 80 लोग मारे गए, 100 से अधिक लापता हैं.
समुद्र के नीचे की मायावी दुनिया
सबमरीन यानी पनडुब्बी समुद्र में छिपे रहते हैं लेकिन ये इतने ताकतवर होते हैं कि युद्ध का रुख बदल सकते हैं. इसीलिए समुद्र के नीचे की दुनिया को मायावी कहें तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी. समुद्र के नीचे की दुनिया इसलिए भी मायावी है क्योंकि वहां जो दिखता नहीं है, वही सबसे ज्यादा असर डालता है. समुद्र की सतह ऊपर से सामान्य लगती है, लेकिन नीचे की दुनिया में रहस्यमई तरीके से छिपी, उन्नत तकनीक से लैस पनडुब्बियां युद्ध की अपनी रणनीति से दुश्मन के लिए बहुत बड़ा खतरा बन कर उभरती हैं. समुद्र की गहराई में सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती. 200 मीटर के बाद ट्वाइलाइट जोन शुरू हो जाती है और 1000 मीटर के बाद लगभग पूरा अंधेरा. यही अंधेरा पनडुब्बियों को अदृश्य बना देता है. रडार वहां काम नहीं करता, सिर्फ सोनार पर निर्भर रहना पड़ता है और सोनार भी हर बार सटीक नहीं होता. इसलिए समुद्र के नीचे क्या चल रहा है, इसका पता लगाना बेहद मुश्किल है.
IRIS Dena
Photo Credit: Eastern Naval Command @IN_HQENC
पनडुब्बियां करती रही हैं सेकेंड स्ट्राइक
पानी में आवाज हवा से तेज चलती है. पनडुब्बियां आवाज के जरिए एक-दूसरे को खोजती हैं. लेकिन समुद्र में थर्मल लेयर यानी तापमान की अलग-अलग परतें ध्वनि को मोड़ देती हैं. इसका मतलब ये है कि समुद्र के नीचे पनडुब्बी आपके पास हो सकती है, आपके पास से गुजर रही होगी पर आपको पता भी नहीं चलेगा. यही वजह है कि इसे कैट-एंड-माउस गेम कहा जाता है. आधुनिक परमाणु पनडुब्बियां महीनों तक सतह पर आए बिना रह सकती हैं. अमेरिका की जॉर्ज वाशिंगटन जैसी बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों ने शीत युद्ध में सेकंड स्ट्राइक सिद्धांत को जन्म दिया. यानी, अगर कोई देश आप पर पहला परमाणु हमला करे, तो अगर किसी देश के पास समुद्र में छिपी उसकी पनडुब्बियां हैं तो वो जवाबी हमला कर सकती हैं. मतलब, युद्ध खत्म नहीं होता, क्योंकि समुद्र के नीचे की आपकी मायावी दुनिया बदला लेने की ताकत जिंदा रखती हैं.
अंडरवॉटर बीस्ट
आज दुनिया की सबसे खतरनाक पनडुब्बियां परमाणु ऊर्जा से चलती हैं. वे महीनों तक बिना सतह पर आए रह सकती हैं. कुछ के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं जो हजारों किलोमीटर दूर तक परमाणु वार कर सकती हैं. यही वजह है कि सबमरीन को अंडरवॉटर बीस्ट कहा जाता है. वे युद्ध की दिशा बदल सकती हैं. वे दुश्मन को दिखे बिना तबाह कर सकती हैं और सबसे बड़ी बात, वे परमाणु हमले के बदले की आखिरी गारंटी हैं.
पनडुब्बियों ने जब बदल दी युद्ध की दिशा...
दूसरे विश्व युद्ध में जर्मन यू बोट्स ने अटलांटिक में ब्रिटेन की सप्लाई लाइन को हिला दिया था. तो फॉकलैंड युद्ध में HMS कॉन्करर ने अर्जेंटीना के युद्धपोत को डुबोकर पूरी नौसैनिक रणनीति बदल दी. कुछ पनडुब्बियां जैसे USS स्कॉर्पियन, रहस्यमय हालात में ऐसे गायब हो गईं कि आज तक पूरी सच्चाई सामने नहीं आई. इतिहास में ऐसे कई बड़े उदाहरण मौजूद हैं, जहां पनडुब्बियों ने सचमुच युद्ध का रुख बदल दिया.
दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी की जर्मन यू-बोट्स ने अटलांटिक महासागर में ब्रिटने की सप्लाई लाइन पर कहर बरपाया था. इसे बैटक ऑफ अटलांटिक के नाम से याद किया जाता है. जर्मन पन्डुब्बियां चुपचाप ब्रिटेन के व्यापारिक जहाजों को डुबो रही थीं. एक समय तो ब्रिटेन की खाद्य और हथियार आपूर्ति लगभग ठप होने के कगार पर पहुंच गई थी. अगर मित्र राष्ट्र एंटी सबमरीन टेक्नोलॉजी (सोनार- डेप्थ चार्ज) डिवेलप नहीं करते तो उस युद्ध में जर्मनी समुद्र के रास्ते ब्रिटेन को झुका सकता था. यह एक ऐतिहासिक उदाहरण है जब समुद्र की की ये मायावी पनडुब्बियां युद्ध में मारक साबित हुई थीं.
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध
पाकिस्तान की पनडुब्बी गाजी का 1971 के युद्ध में हुआ हस्र एक यादगार ऐतिहासिक रणनीतिक जीत की गवाही देता है. 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की पनडुब्बी गाजी को भारत के विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत तो तबाह करने भेजा गया था लेकिन विशाखापत्तनम के पास रहस्यमय विस्फोट में गाजी डूब गई. इससे पाकिस्तान की समुद्री रणनीति को बड़ा झटका लगा था. दूसरी तरफ, भारतीय पनडुब्बियों ने कराची बंदरगाह के आसपास दबाव बनाकर पाकिस्तान की नौसेना की आवाजाही सीमित कर दी. भारतीय नौसेना का दावा है कि इन पनडुब्बियों ने तब पाकिस्तानी नौसेना को कराची बंदरगाह से निकलने नहीं दिया था. यहां भी समुद्र के नीचे की चाल ने युद्ध की रणनीतिक दिशा प्रभावित की.
पहली बैलिस्टिक मिसाइल ले जाने वाली पनडुब्बी
अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध के दौरान परमाणु पनडुब्बियां सबसे बड़ा डर थीं. अमेरिका की जॉर्ज वाशिंगटन पहली बैलिस्टिक मिसाइल ले जाने वाली परमाणु पनडुब्बी थी. इन्हें इस मकसद से तैनात किया गया था कि अगर दुश्मन ने परमाणु हमला कर जमीन पर तबाही मचा दी तो जवाबी कार्रवाई समुद्र की गहराई में छिपी ये पनडुब्बियां करेंगी. संभवतः यह भी एक वजह थी कि उस दौरान कोई परमाणु शक्ति का इस्तेमाल नहीं हुआ क्योंकि दोनों जानते थे कि सबमरीन छिपी हुई हैं और बदला लेंगी.
फॉकलैंड युद्ध (1982)
1982 में ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच फॉकलैंड युद्ध में ब्रिटिश परमाणु पनडुब्बी कॉनकरर ने अर्जेंटीना के क्रूजर जेनरल बेलग्रांडो को डुबो दिया. इस एक हमले के बाद अर्जेंटीना की नौसेना ने अपने बड़े जहाज बंदरगाहों में वापस बुला लिए. सिर्फ एक पनडुब्बी हमले ने पूरे नौसैनिक समीकरण बदल दिए.
क्यूबा मिसाइल संकट (1962)
क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान सोवियत पनडुब्बियां परमाणु टॉरपीडो के साथ अमेरिकी नौसेना से घिरी थीं. एक सोवियत कमांडर ने लगभग परमाणु टॉरपीडो दागने का फैसला कर लिया था. आखिरी समय पर निर्णय बदला गया और दुनिया परमाणु युद्ध से बच गई. इस तरह के उदाहरण समुद्र की गहराई में लिए गए उस फैसले के हैं जिसने कुछ न करने के फैसले से राहत दी अन्यथा एक ही झटके में मानव इतिहास की दिशा बदल सकती थी.
पनडुब्बी में महीनों तक सीमित जगह, बिना सूरज की रोशनी, बिना ताजी हवा के रहना और हर वक्त खतरे का एहसास. यहां केवल इंजीनियरिंग ही नहीं बल्कि मानसिक और शारीरिक मजबूती की परीक्षा भी होती है. शायद यही कारण है कि मशहूर लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने कभी कहा था कि पनडुब्बी के जवान अलग तरह के होते हैं- उनकी दुनिया अलग है.
आज अमेरिका, रूस, चीन, भारत, सबके पास परमाणु पनडुब्बियां हैं. आज भले ही अमेरिका युद्ध में जुटा है पर ये देश अमूमन खुलकर युद्ध नहीं करते बल्कि उनकी मौजूदगी ही दुश्मन को सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं. इन देशों की रक्षा की नीति में समुद्र के नीचे से निगरानी और मारक क्षमता का असर कितना हो सकता है यह दुश्मन की खामोश डर पर टिका है. ये दिखते नहीं हैं पर असली ताकत समुद्र के नीचे छिपी होती है. समुद्र के नीचे से किया गया प्रहार अचानक और सटीक होता है. दुश्मन को संभलने का मौका तक नहीं मिलता और पल भर में ही ये निर्णायक हमला शत्रु को नेस्तनाबूद कर देता है. यानी समुद्र की सतह पर लहरों में भले ही उतनी हलचल न दिखे पर इसकी गहराइयों में तकनीक की एक ऐसी रणनीतिक बिसात बिछी होती है किसी युद्ध की सबसे खतरनाक बाजी खेल रही होती है.
दुश्मन को पता ही नहीं खतरा कहां है?
समुद्र के नीचे की मायावी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार है- अनिश्चितता. अगर आप जानते हैं कि दुश्मन की पनडुब्बी कहीं आसपास हो सकती है, तो आपकी रणनीति बदल जाती है. आपके युद्धपोत सतर्क हो जाते हैं. आपकी सप्लाई लाइन प्रभावित होती है. आपकी चाल धीमी पड़ जाती है. यानी बिना गोली चलाए भी पनडुब्बी मनोवैज्ञानिक दबाव बना देती है.
तकनीक का चमत्कार और इंसानी धैर्य का संगम
आधुनिक परमाणु पनडुब्बियां सिर्फ हथियार ही नहीं बल्कि पानी के नीचे चलता-फिरता एक पूरे शहर की तरह होती हैं. उनमें परमाणु युद्ध क्षमताएं, मिसाइल लॉन्च सिस्टम, बिना आवाज किए अपनी गति बढ़ाने की क्षमता से लैस, ऑक्सीजन जनरेशन सिस्टम और पानी को मीठा बनाने की मशीन समेत कई अत्याधुनिक सुविधाओं से संपन्न होती हैं. वे महीनों तक सतह पर आए बगैर रह सकती हैं.
भारत में पनडुब्बी के आने की कहानी
पानी के अंदर छिपकर दुश्मन की टोह लेने वाली अनोखी विशाल पनडुब्बी के विकास की राह भारत के लिए कतई आसान नहीं रही. इसे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. पहली अप्रैल 1967 को विशाखापत्तनम में फ्लैग ऑफिस सबमरीन (एफओएसएम) का गठन किया गया. ब्रिटेन ने तब भारत को आधुनिक ओबेरोन श्रेणी की पनडुब्बी देने से इनकार कर दिया था, लेकिन कठिन शर्तों पर द्वितीय विश्वयुद्ध के जमाने की ‘टी' श्रेणी की पनडुब्बी को लीज पर देने पर सहमति जताई.
आजादी के बाद भी 1958 तक भारतीय नौसेना की कमान अंग्रेज अधिकारियों के हाथों रहीं. फिर जब यह कमान भारतीय अधिकारी के हाथों में आया तब जाकर पनडुब्बी शाखा के गठन की दिशा में काम शुरू हो पाया. हालांकि इसमें भी शुरुआती तीन साल तो केवल सरकार से मंजूरी लेने में ही लग गए. फिर जब 1961 में मंजूरी मिली तब उसी साल और दो साल बाद (1963) नौसेना अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए ब्रिटेन भेजा गया. इन्हें पनडुब्बियों के संचालन और बारिकियों से अवगत कराया गया.
इसके एक साल बाद ही 1964 में तात्कालिन सोवियत संघ ने अपने चार अत्याधुनिक पनडुब्बियां देने की पेशकश की और 1965 में इस पर हस्थाक्षर भी हो गए. तब भी 20 अधिकारी और 100 नाविक दल के सदस्यों को रूस के व्लादीवोस्तोक में करीब 12 महीने तक प्रशिक्षण दिया गया.
भारत की पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवारी
फिर आया वो वक्त जब भारत ने अपनी पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवारी को आठ दिसंबर 1967 को यूक्रेन के रीगा (तत्कालीन सोवियत संघ) में जलावतरण किया. तब से 8 दिसंबर को पनडुब्बी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है. बाद में दिल्ली में पनडुब्बी शाखा के लिए एक नए महानिदेशालय का गठन किया गया जबकि विशाखापट्टनम में पनडुब्बी अड्डे की आधारशिला रखी गयी. इसे बाद में आईएनएस वीरबाहु नाम दिया गया.













