- सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और बहरीन ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई जारी रखने का अमेरिका को स्पष्ट समर्थन दिया है.
- यूएई ने अमेरिका से जमीनी हमले की मांग की है, जबकि कुवैत और बहरीन भी इस कदम का समर्थन कर रहे हैं.
- खाड़ी देशों में ओमान और कतर कूटनीतिक समाधान चाहते हैं, जबकि सऊदी-यूएई ब्लॉक युद्ध जारी रखने पर जोर दे रहा है.
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच एक बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव दिख रहा है. सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और बहरीन जो शुरुआत में इस युद्ध को लेकर असहज थे. अब अमेरिका से साफ कह रहे हैं कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई अभी खत्म न की जाए. उनका मानना है कि यह ऐतिहासिक मौका है, जब तेहरान की ताकत को स्थायी रूप से कमजोर किया जा सकता है.
शुरुआत में नाराजगी, अब खुला समर्थन
युद्ध के शुरुआती दिनों में खाड़ी देशों को शिकायत थी कि अमेरिका और इजरायल ने हमले की पहले से जानकारी नहीं दी. उन्होंने चेतावनी दी थी कि इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा. लेकिन अब वही देश इस युद्ध को ईरान के इस्लामिक शासन को कमजोर करने का सुनहरा मौका मान रहे हैं.
'जब तक बदलाव नहीं, तब तक हमला जारी रहे'
खाड़ी देशों का साफ संदेश है कि ईरान के नेतृत्व में बड़ा बदलाव हो या फिर उसके व्यवहार में नाटकीय परिवर्तन दिखे. जब तक ऐसा नहीं हो जाता तब तक सैन्य अभियान रोकना 'गलत डील' होगा. खासकर सऊदी अरब और यूएई इस लाइन को सबसे ज्यादा आगे बढ़ा रहे हैं.
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UAE सबसे आक्रामक, जमीनी हमले की मांग
यूएई इस समय सबसे 'हॉकिश' (आक्रामक) देश बनकर उभरा है. वह अमेरिका से ग्राउंड इनवेज़न (जमीनी हमला) तक की मांग कर रहा है. कुवैत और बहरीन भी इस लाइन का समर्थन कर रहे हैं. बता दें कि यूएई पर अब तक 2300 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन हमले हो चुके हैं, जिससे उसकी सुरक्षित बिजनेस हब वाली इमेज खतरे में पड़ रही है.
सऊदी की शर्तें: सिर्फ युद्ध नहीं, ‘कम्प्लीट न्यूट्रलाइजेशन'
सऊदी अरब अमेरिका से कह रहा है कि अगर युद्ध खत्म करना है, तो शर्तें कड़ी हों. सऊदी की मांग है कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम खत्म हो. बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता नष्ट हो. प्रॉक्सी ग्रुप्स (हिज़्बुल्लाह, हौथी आदि) को सपोर्ट बंद हो और हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की ताकत खत्म हो. यानी लक्ष्य सिर्फ युद्ध जीतना नहीं, बल्कि ईरान की क्षेत्रीय ताकत को जड़ से खत्म करना है.
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फिर भी डर बरकरार: तेल और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खतरा
खाड़ी देशों की एक बड़ी चिंता भी है. चिंता यह कि युद्ध लंबा चला तो तेल ठिकानों पर हमले का खतरा बना रहेगा. सऊदी की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर है. ईरान पहले ही धमकी दे चुका है कि वह पानी, बिजली और डीसैलिनेशन प्लांट्स को निशाना बना सकता है.
खाड़ी में भी बंटवारा: सभी देश एक लाइन पर नहीं
हालांकि इस बीच भी खाड़ी देश एकजुट नहीं है. ओमान और कतर अब भी कूटनीतिक समाधान चाहते हैं. वे पारंपरिक तौर पर ईरान और पश्चिम के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे हैं. यानी खाड़ी के अंदर भी पूरी एकजुटता नहीं है, लेकिन सऊदी-यूएई ब्लॉक हावी है.
अमेरिका की दुविधा: जंग या समझौता?
डोनाल्ड ट्रंप के सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ खाड़ी सहयोगी जंग जारी रखने का दबाव बना रहे हैं. दूसरी तरफ अमेरिका में जन समर्थन घट रहा है. अब तक इस युद्ध में 3000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल चुकी है.
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क्या खाड़ी देश खुद युद्ध में उतरेंगे?
अभी तक खाड़ी देश अमेरिकी ठिकाने दे रहे हैं. लेकिन सीधे हमले में शामिल नहीं हुए. इसका कारण है-
- सैन्य जटिलताएं (friendly fire जैसी घटनाएं)
- इजरायल के साथ सीमित कूटनीतिक संबंध
- ईरान के सीधे हमलों का डर
लेकिन चेतावनी साफ है कि अगर किसी खाड़ी देश में बड़ा हमला हुआ, तो वे सीधे युद्ध में कूद सकते हैं.
'फाइनल राउंड' की तैयारी?
खाड़ी देशों का बदला रुख दिखाता है कि यह युद्ध अब सिर्फ जवाबी कार्रवाई नहीं रहा, बल्कि ईरान के खिलाफ ‘निर्णायक लड़ाई' में बदलता जा रहा है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका इस दबाव में आकर युद्ध को और तेज करेगा, या किसी डील की ओर जाएगा?













