पाकिस्तान में मुनीर का 'प्रोपेगेंडा मॉडल' बेनकाब! रिपोर्ट ने दिखाई खूनी कार्यकाल की असली तस्वीर

पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर भले खुद को दुनिया में शांतिदूत दिखाने की कवायद में लगे रहें लेकिन आंकड़े बताते हैं कि उनके पद पर बैठने के बाद पाकिस्तान के अंदर हिंसा लगातार बढ़ी है.

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2022 में आसिम मुनीर पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने और तब से हिंसा लगातार बढ़ी है

आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान ने अपनी छवि बनाने पर बहुत जोर दिया है. वहां देश के अंदर अपनी हर बड़ी नाकामी को विदेशी साजिश बताया जाता है, हर प्रदर्शन को सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है और सेना की हर कार्रवाई को देश की मजबूती के तौर पर पेश किया जाता है. लेकिन अब एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने पोल खोलकर रख दी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक शांति स्थापित करने वाले के रूप में पेश किए जाने वाले आसिम मुनीर के कार्यकाल में पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा पिछले एक दशक के सबसे खराब दौर में पहुंच गई है.

2022 में आसिम मुनीर पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने. उस समय देश पहले से ही बढ़ते आतंकवाद, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में अशांति और अफगानिस्तान के साथ बिगड़ते रिश्तों जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था. यह बात द मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट (एमईएमआरआई) की रिपोर्ट में कही गई है.

शांति लाने में फेल आसिम मुनीर

आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान ने और सख्त सुरक्षा नीति अपनाई. इसमें सैन्य अभियान, गिरफ्तारियां, सीमा पार हमले, प्रतिबंध और सेना के केंद्रीकृत नियंत्रण पर ज्यादा भरोसा किया गया. लेकिन इससे हालात नहीं सुधरे. इसके बजाय आतंकी हमले बढ़े, आम लोगों और सुरक्षा बलों के जवानों की मौतें बढ़ीं, बलूच और पश्तून इलाकों में लोगों की नाराजगी बढ़ी और अफगानिस्तान के साथ तनाव और गहरा गया.

2025 में आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल बनाया गया. हालांकि, पाकिस्तान के सुरक्षा आंकड़े उन्हें सफल लीडर नहीं बताते. पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज (पीआईसीएसएस) के अनुसार, आतंकी हमलों की संख्या 2022 में 380, 2023 में 645, 2024 में 908 और 2025 में 1,066 हो गई. पीआईसीएसएस के मुताबिक, 2025 में 2014 के बाद सबसे ज्यादा आतंकी हमले, 2011 के बाद सबसे ज्यादा सुरक्षा बलों के जवानों की मौतें और 2015 के बाद सबसे ज्यादा आम नागरिकों की मौतें दर्ज की गईं.

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एमईएमआरआई की रिपोर्ट में कहा गया है, "जो सैन्य नेतृत्व खुद को ईरान में मध्यस्थ के रूप में पेश करता है, वही पाकिस्तान के अपने अंदरूनी विवाद सुलझाने में नाकाम रहा है. बलूचिस्तान आज भी अलग-थलग महसूस करता है. खैबर पख्तूनख्वा अब भी हिंसा से जूझ रहा है. पूर्व कबायली इलाकों में अब भी सेना का भारी असर है. अफगानिस्तान के साथ रिश्ते तनाव से बढ़कर बार-बार जंग तक पहुंच गए हैं. खुद को वैश्विक शांति स्थापित करने वाला बताने वाले कमांडर के कार्यकाल में पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा पिछले एक दशक के सबसे खराब दौर में पहुंच गई है."

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "यह सिर्फ दिखावे का विरोधाभास नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सुरक्षा नीति की बुनियादी समस्या है. विदेशों में पाकिस्तान युद्धविराम, बातचीत और मध्यस्थता की बात करता है, लेकिन अपने देश में दबाव, प्रतिबंध, गिरफ्तारियां, लोगों के गायब होने की घटनाएं, सैन्य अभियान और सामूहिक सजा जैसे तरीके अपनाता है. जो नेतृत्व अमेरिका और ईरान के बीच अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत करने की कोशिश करता है, वही अपने बलूच, पश्तून और कश्मीरी नागरिकों (कब्जे वाले कश्मीर) के लिए राजनीतिक जगह नहीं बना पाया."

PoK में भी वही कहानी

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने यही सख्त रवैया पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में भी अपनाया. यहां रावलाकोट और मुजफ्फराबाद में जून महीने में हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए. राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की मांग करने वाले नागरिक संगठन जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया.

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एमईएमआरआई की रिपोर्ट में कहा गया है, "पाकिस्तान की सरकार हर बार अपनी नाकामी का दोष बाहरी ताकतों पर डालती है, लेकिन बढ़ती मौतों के आंकड़े बताते हैं कि असली समस्या पाकिस्तान की अपनी सुरक्षा और शासन व्यवस्था में है. आसिम मुनीर के दौर में छवि बनाने की राजनीति पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया."

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "हर बड़ी नाकामी को विदेशी साजिश बताया जाता है, हर प्रदर्शन को सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है और सेना की हर कार्रवाई को राष्ट्रीय संकल्प के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन केवल कहानी गढ़ने से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती. ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) के अनुसार, 2025 में पाकिस्तान की सरकार ने मीडिया की आजादी, राजनीतिक विरोधियों और नागरिक संगठनों पर कार्रवाई तेज करने के लिए अस्पष्ट और बहुत व्यापक कानूनों का इस्तेमाल किया. इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार आतंकवाद की जड़ खत्म करने के बजाय आलोचना को दबाने में ज्यादा सख्ती दिखा रही है."

(इनपुट- IANS)

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Asim Munir
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