पिछले एक साल में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों की तस्वीर भले ही बेहतर दिख रही हो और दोनों देशों के बीच ऊंचे स्तर पर बातचीत भी बढ़ी हो, लेकिन असल में रिश्तों की बुनियाद में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है. दक्षिण एशिया की विशेषज्ञ अपर्णा पांडे ने यह बात कही. उनका कहना है कि अभी तक ज्यादातर बदलाव प्रतीकात्मक हैं, ज़मीन पर न तो आर्थिक और न ही सैन्य स्तर पर पाकिस्तान को खास फायदा मिला है.
पाकिस्तान इस हफ्ते वॉशिंगटन में होने वाली ‘बोर्ड ऑफ पीस' की पहली बैठक में हिस्सा लेने जा रहा है. इस बैठक को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुलाया है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इसमें शामिल होंगे. इस दौरे को इस्लामाबाद में अमेरिका के साथ बेहतर होते रिश्तों के सबूत के तौर पर पेश किया जा रहा है.
इस्लामाबाद से ट्रेड संबंधों पर भी ज़ोर देने की उम्मीद है और वह साइडलाइन पर द्विपक्षीय मीटिंग की मांग कर सकता है. उन्होंने कहा, "द्विपक्षीय मीटिंग होती है या नहीं, हमें इंतज़ार करना होगा और देखना होगा." पांडे ने कहा, "सिंबॉलिक तौर पर, रिश्ते बहुत अच्छे चल रहे हैं. हालांकि, असल में, मुझे नहीं लगता कि पिछले एक-डेढ़ साल में पाकिस्तान के अंदर ज्यादा कुछ बदला है."
कहीं 'बोर्ड ऑफ पीस' में पिस न जाए पाकिस्तान
गाजा के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से मुस्लिम देशों और मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों में भूमिका निभाना चाहता है. अगर पाकिस्तान ‘बोर्ड ऑफ पीस' में भाग लेता है या गाजा में कोई जिम्मेदारी निभाता है तो देश के अंदर इसे सकारात्मक रूप से देखा जा सकता है.
उन्होंने आगे कहा कि अगर पाकिस्तानी सेना को “फिलिस्तीनी नागरिकों के बजाय इजरायल के समर्थक के तौर पर देखा गया, तो यह अच्छा नहीं लगेगा.” कुल मिलाकर, “सिंबॉलिक तौर पर यह अच्छा लगेगा,” लेकिन इस्लामाबाद इस बात पर क्लैरिटी चाहेगा कि गाजा में किसी भी इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स के हिस्से के तौर पर उसके सैनिकों से क्या उम्मीद की जाती है.
घरेलू राजनीतिक मुद्दों पर, उन्होंने कहा कि कांग्रेस के सदस्य “सवाल पूछ सकते हैं,” लेकिन “मुझे नहीं लगता कि ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन कोई सवाल पूछेगा… क्योंकि… यह उनके लिए चिंता का विषय नहीं है.”
पांडे का मानना है कि पाकिस्तान ने अपनी भौगोलिक स्थिति का उपयोग करते हुए अमेरिका के लिए खुद को ईरान, गाजा और फिलिस्तीन से जुड़े मामलों में उपयोगी साबित किया है. पाकिस्तान की नजर में इससे द्विपक्षीय रिश्तों में ठोस लाभ मिलना चाहिए था. लेकिन फिलहाल जो मिला है, वह सिर्फ प्रतीकात्मक समर्थन और निवेश से जुड़े कुछ ऐलान या संभावित घोषणाएं हैं. ठोस आर्थिक लाभ अभी तक नहीं दिखे हैं. उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में इस बात को लेकर नाराजगी भी है. हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने यहां तक कह दिया था कि अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल टॉयलेट पेपर की तरह किया.
सैन्य सहयोग के सवाल पर उन्होंने साफ कहा कि मौजूदा अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान को उन्नत सैन्य उपकरण आसानी से नहीं देगा. अगर पाकिस्तान को ऐसे हथियार चाहिए, तो उसे खुद खरीदने होंगे. सऊदी अरब या तुर्किये जैसे देश आर्थिक मदद कर सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान की अपनी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह बड़े पैमाने पर महंगे हथियार खरीद सके.
आर्थिक मोर्चे पर उन्होंने कहा कि अमेरिकी कंपनियां महत्वपूर्ण खनिजों में निवेश कर सकती हैं. लेकिन ऐसे कई खनिज बलूचिस्तान में हैं, जहां लंबे समय से उग्रवाद की समस्या है. सुरक्षा हालात ठीक न होने की वजह से कई विदेशी कंपनियां वहां निवेश करने से हिचकती हैं.













