- मिडिल ईस्ट तनाव के बीच उत्तर कोरिया ने नए हथियारों के कई बड़े परीक्षण किए.
- रूस यूक्रेन युद्ध और ईरान की रणनीति से सीख लेकर हथियार विकसित कर रहा है.
- एशिया में सुरक्षा संतुलन बिगड़ने और बड़े टकराव का खतरा बढ़ा.
पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त मिडिल ईस्ट में ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के तनाव पर टिकी हैं लेकिन इसी बीच उत्तर कोरिया ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को और भी जटिल बना दिया है. प्योंगयांग ने इस हफ्ते इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेपन सिस्टम, एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइलें और क्लस्टर वारहेड से लैस बैलेस्टिक मिसाइल जैसे कई हथियारों का परीक्षण किया है. कोरियाई सेंट्रल न्यूज एजेंसी के मुताबिक ये परीक्षण वरिष्ठ सैन्य अधिकारी जनरल किम जोंग सिक की निगरानी में किए गए. तीन दिनों तक चले इन परीक्षणों को उत्तर कोरिया की पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को अपग्रेड करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार और कार्बन फाइबर बम को बहुत ही स्ट्रैटेजिक माना जा रहा है क्योंकि ये हथियार पारंपरिक विस्फोटकों की बजाय इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ऊर्जा का इस्तेमाल करके दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर को ठप कर सकते हैं.
आधुनिक युद्ध में इस तरह के हथियार बेहद खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि ये बिना किसी बड़े विस्फोट के पूरे सिस्टम को नेस्तनाबूद कर सकते हैं.
इसके अलावा, उत्तर कोरिया ने मोबाइल शॉर्ट रेंज एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम का भी परीक्षण किया. यह परीक्षण इस बात की पुष्टि के लिए किया गया कि यह सिस्टम युद्ध के हालात में कितनी प्रभावी तरीके से काम कर सकता है.
Add image caption here ईरान पर अमेरिकी हमले को किम जोंग उन ने बेवजह किया गया आक्रामण बताया था
Photo Credit: AFP
किम जोंग क्यों कर रहे ऐसा?
जानकार मानते हैं कि किम जोंग उन के इन हथियारों को तैयार करने के पीछे रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से मिली सबक है. कार्नेगी एंडोमेंट के एक्सपर्ट अंकित पांडा के मुताबिक क्लस्टर वारहेड का जिक्र यह दिखाता है कि प्योंगयांग नई सबम्यूनिशन तकनीक पर काम कर रहा है, ताकि पहले की कमियों को दूर किया जा सके.
ह्वासोंग-11 मिसाइल, जिसे KN-23 या KN-24 भी कहा जाता है, इसी दिशा में एक अहम उदाहरण है. यह वही मिसाइल है जिसे यूक्रेन का दावा है कि उत्तर कोरिया ने रूस को सप्लाई किया था. क्लस्टर बम की बात करें तो यह एक ऐसा हथियार होता है जो हवा में फटकर कई छोटे बमों में बंट जाता है और बड़े इलाके में तबाही मचाता है. रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर कोरिया का दावा है कि उसकी मिसाइल 6.5 से 7 हेक्टेयर क्षेत्र को पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम है.
ये भी पढ़ें: ईरान vs इजरायल-अमेरिका युद्ध ने बदला वर्ल्ड ऑर्डर, दुश्मन देश भी 'साइलेंट थैंक्यू' कह रहे
Photo Credit: AFP
अमेरिका की एशिया-प्रशांत में अनुपस्थिति का फायदा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू टाइमिंग है. जब ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच संघर्ष जारी है और वैश्विक ताकतें उसी पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं, तब उत्तर कोरिया ने अपनी सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया है. जानकारों का मानना है कि यह उत्तर कोरिया की रणनीतिक चाल है. वह मिडिल-ईस्ट में अमेरिका की मौजूदगी से एशिया प्रशांत में उसकी (अमेरिका की) उपस्थिति कमजोर होने का फायदा उठा रहा है और अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
चीन और रूस के साथ बढ़ती नजदीकी
इस बीच चीन के विदेश मंत्री वांग यी का उत्तर कोरिया दौरा भी काफी अहम माना जा रहा है. यह पिछले छह वर्षों में उनकी पहली यात्रा है. यह संकेत देता है कि प्योंगयांग और बीजिंग के रिश्तों में फिर से तेजी आ रही है. उत्तर कोरिया पहले ही रूस के साथ अपने संबंध मजबूत कर चुका है. दक्षिण कोरिया की खुफिया एजेंसी के मुताबिक, प्योंगयांग ने रूस को हजारों सैनिक और भारी मात्रा में हथियार और गोला बारूद भेजा है.
दक्षिण कोरिया और अमेरिका की प्रतिक्रिया
उत्तर कोरिया के इन परीक्षणों के बाद दक्षिण कोरिया और अमेरिका सतर्क हो गए हैं. दक्षिण कोरिया की जॉयंट चीफ ऑफ स्टाफ ने कहा है कि उनकी सेना किसी भी उकसावे का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है. साथ ही, यह भी बताया गया कि उत्तर कोरिया ने हाल ही में अपने पूर्वी तट के पास कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं. यह घटनाएं उस समय हुईं जब उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग के प्रति एक सकारात्मक टिप्पणी की थी. हालांकि बाद में इसे चेतावनी के रूप में देखा गया.
ये भी पढ़ें: सीजफायर के बाद हॉर्मुज खुला और गुजरे तेल के 2 जहाज, पर खतरा अभी टला नहीं
Photo Credit: AFP
क्या इससे बढ़ेगा खतरा?
जानकारों के मुताबिक, सबसे बड़ी चिंता यह है कि उत्तर कोरिया अब रूस और ईरान दोनों के युद्ध अनुभवों को अपने हथियारों में शामिल कर रहा है. सियोल की एहवा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लीफ एरिक ईस्ली का कहना है कि प्योंगयांग सस्ते और असममित हथियारों का इस्तेमाल करके एयर डिफेंस सिस्टम को चुनौती देने की रणनीति अपना रहा है. यह वही रणनीति है जिसका इस्तेमाल ईरान ने मिडिल ईस्ट में किया है. इससे भविष्य के युद्ध और ज्यादा जटिल और खतरनाक हो सकते हैं.
वैश्विक सुरक्षा पर असर
संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया का बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण करना अंतरराष्ट्रीय नियमों को खुली चुनौती माना जा रहा है. इससे न केवल एशिया बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है. अमेरिका के सहयोगी देशों पर भी दबाव बढ़ा है. उन्हें हॉर्मुज स्ट्रेट में अपने युद्धपोत भेजने के लिए कहा गया, जिससे उनकी सैन्य क्षमता पर अतिरिक्त बोझ पड़ा. ऐसे में मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष का असर वैश्विक शक्ति संतुलन पर पड़ता दिख रहा है और उत्तर कोरिया इसी का फायदा उठाकर अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटा है.
जरूर पढ़ें: ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध में पाकिस्तान का 'कराची' गेम क्या है?













