- बालेन शाह की अगुआई में RSP ने परंपरागत दलों को चुनौती देते हुए ऐतिहासिक सफलता हासिल की है
- Gen-Z आंदोलन में सूदन गुरुंग पर हिंसा के आरोप लगे थे, मगर परोपकारी कार्यों ने उन्हें लोकप्रिय बनाया
- खुशबू ओली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी की फायरब्रांड वक्ता के रूप में लोकप्रिय हैं और राजशाही समर्थक हैं
नेपाल की सियासत इस वक्त एक नए और निर्णायक मोड़ पर खड़ी है. पिछले साल हुए Gen Z आंदोलन की लहर पर सवार होकर नेपाल चुनाव में बालेन शाह की अगुआई में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ऐतिहासिक जीत की तरफ बढ़ रही है. मतगणना के परिणाम और रुझान बताते हैं कि इस चुनाव में परंपरागत दलों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए कई नए और स्वतंत्र चेहरों ने भी मजबूत जगह बनाई है. आइए डालते हैं, उन पर एक नजर-
डॉ. महाबीर पुन
महाबीर पुन की कहानी भी बेहद रोचक है. अमेरिका से पीएचडी और मैग्सायसाय पुरस्कार से सम्मानित पुन ने अकेले ही अपना चुनाव प्रचार किया और इसके लिए जनता से ही फंड जुटाया. पिछले 10 वर्षों में वह एक इनोवेशन सेंटर स्थापित कर चुके हैं और लोकल इनोवेशन को बढ़ावा देने में जुटे हैं. सुशीला कार्की की अंतरिम सरकार में शिक्षा मंत्री रहते हुए उन्होंने त्रिभुवन यूनिवर्सिटी की जमीन के दुरुपयोग का खुलासा किया था. उन्होंने विश्वविद्यालयों में प्रधानमंत्री को चांसलर बनाने की व्यवस्था का भी विरोध किया था. ऐसे ही वैचारिक मतभेदों की वजह से वह पद छोड़कर म्याग्दी सीट से चुनाव मैदान में उतर आए और जीत दर्ज की है.
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खुशबू ओली
राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP) की खुशबू ओली का नाम आनुपातिक प्रतिनिधित्व के जरिए संसद पहुंचने वालों की सूची में सबसे ऊपर माना जा रहा है. नेपाल की राजनीति में खुशबू को एक फायरब्रांड वक्ता के तौर पर देखा जाता है, जो जनसभाओं में भारी भीड़ जुटाने का माद्दा रखती हैं. पार्टी ने पहले उन्हें काठमांडू से चुनाव लड़ाने का टिकट दिया था, लेकिन बाद में पार्टी ने उन्हें एक कद्दावर कैंपेनर के रूप में पेश किया. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ी-लिखीं खुशबू स्वास्थ्य और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर मुखर रही हैं. उनकी छवि राजशाही समर्थक के रूप में है.
सूदन गुरुंग
Gen-Z आंदोलन के दौरान सूदन गुरुंग पर हिंसा भड़काने के कई गंभीर आरोप लगे थे. मीडिया रिपोर्ट्स में गुरुंग को सबसे आक्रामक चेहरों में से एक बताया गया. हालांकि भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं में परोपकारी कार्यों ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय भी बनाया. राष्ट्रपति सुशीला कार्की उन्हें अपने बड़े बेटे की तरह मानती हैं. गुरुंग का युवाओं में जबरदस्त क्रेज है. बालेन शाह के साथ भी उनके अच्छे संबंध बताए जाते हैं. गुरुंग ने गोरखा से चुनावी जीत हासिल की है.
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हरका सम्पांग
हरका सम्पांग श्रम संस्कृति पार्टी के नेता हैं और नेपाल के पूर्व में धरान के मेयर रहे हैं. सम्पांग ने अपने इलाके में वॉटर प्लांट लगाने के लिए जिस तरह से प्रयास किए और खुद लोगों को श्रमदान के लिए प्रेरित किया, उसने उन्हें लोगों का चहेता बना दिया. कीरत कम्युनिटी से आने वाले सम्पांग अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी बनाने की इच्छा लेकर संसदीय चुनाव में उतरे और इसके लिए मेयर पद भी कुर्बान कर दिया. अब चुनाव नतीजों से लग रहा है कि उनका राष्ट्रीय पार्टी बनाने का सपना साकार होने जा रहा है. हालांकि अभी उनकी राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट नहीं है, लेकिन उनके काम करने के अलग अंदाज ने उन्हें चर्चा में ला दिया है.
आशिका तमांग
काठमांडू से सटे धाडिंग जिले से जीत दर्ज करने वाली आशिका ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है. जर्मन नागरिक से शादी करके कुछ समय के लिए जर्मनी में रहीं आशिका करीब दो साल पहले नेपाल लौटीं थीं और सरकारी सिस्टम को चुनौती देते हुए सड़कों पर उतर आईं. सरकारी अधिकारियों और पुलिस के दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा था. अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने वाली आशिका के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती सिस्टम के अंदर रहकर सुधार लागू करने की होगी.
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