नेपाल में Gen-Z ने चुना नया रास्ता... पूर्व PM ओली के 5 दशक के राजनीतिक करियर का अंत या एक और मोड़?

ओली के आलोचकों का कहना है कि उनके "अहंकारी और आत्मकेंद्रित" रवैये ने उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता को कमज़ोर कर दिया है. एक दशक तक पार्टी का और दो बार बहुमत वाली सरकारों का नेतृत्व करने के कारण ओली को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

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  • नेपाल में 2025 में जेन-जी विरोध प्रदर्शन के बाद पहली बार चुनाव हुए, जहां बालेंद्र शाह की लोकप्रियता बढ़ी है
  • केपी ओली की अगुवाई वाली सरकार जेन-जी आंदोलन के बाद गिर गई और वे राजनीतिक रूप से कमजोर हो गए हैं
  • ओली पर प्रदर्शन दबाने के लिए पुलिस को गोली चलाने का आरोप लगा, लेकिन उन्होंने इसे सिरे से अस्वीकार किया है
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काठमांडू:

नेपाल में पिछले साल सितंबर में जेन-जी विरोध प्रदर्शन के बाद पहली बार चुनाव हुए हैं. नतीजों से सामने आ रहा है कि, वहां की जनता, जेन-जी की पसंद और पीएम पद के उम्मीदवार बालेंद्र शाह की ओर देख रही है. ऐसे में पिछले पांच दशक से नेपाल की राजनीति का बड़ा नाम केपी ओली का अध्याय खत्म होता दिख रहा है. छह महीने पहले ही जेन-जी प्रोटेस्ट में उस समय के प्रधानमंत्री केपी ओली के नेतृत्व वाली कोएलिशन सरकार गिर गई थी.

2025 के जनरेशन जेड (Gen Z) आंदोलन के बाद, खड्गा प्रसाद शर्मा ओली के जीवन में एक नया चैप्टर शुरू हुआ, जिसे कई विश्लेषक उनकी "पॉलिटिकल ऑबिच्युअरी" के रूप में देखते हैं.

जेन-जी विद्रोह से उनकी सरकार गिरने से पहले, ओली सत्ता के शिखर पर थे और एक मजबूत गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में देश पर शासन कर रहे थे. 8-9 सितंबर, 2025 के प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों ने उनके बल्कोट स्थित आवास को भी जला दिया, जिसके बाद ओली को मकवानपुर जिले के सुपारीतार में नेपाली सेना की बैरक में शरण लेनी पड़ी. बैरक से लौटने के बाद, ओली ने अपनी पत्नी राधिका शाक्य के साथ भक्तपुर के गुंडू में एक किराए के मकान में नया जीवन शुरू किया.

ओली का जीवन यादों से भरा एक कैनवास की तरह है, जिसमें खुशी और दुख, जुनून और संघर्ष की यादें हैं. उनका राजनीतिक सफर जेल के लंबे सालों से लेकर देश के सर्वोच्च पद पर बार-बार आसीन होने तक फैला हुआ है. राजनीति और संघर्ष के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले ओली ने उससे निकलकर कई सफलता देखी. लेकिन जेन-जी ने ओली समेत नेपाल के कई दिग्गज नेताओं को सत्ता के हाशिये पर धकेल दिया.

2015 में पहली बार बने नेपाल के प्रधानमंत्री

ओली किशोरावस्था में ही एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में राजनीति में शामिल हुए और अब समाप्त हो चुकी राजशाही का विरोध करने के लिए 14 साल तक जेल में बिताए. वो अक्टूबर 2015 में पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने. ओली फरवरी 2018 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, जब सीपीएन (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और 'प्रचंड' के नेतृत्व वाली सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) के गठबंधन ने 2017 के चुनावों में प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल किया था. उनकी जीत के बाद, मई 2018 में दोनों दलों का औपचारिक रूप से विलय हो गया था.

जेन-जी आंदोलन के बावजूद, ओली ने दिसंबर 2025 में आयोजित सीपीएन-यूएमएल के 11वें आम सम्मेलन में तीसरी बार अध्यक्ष का पद हासिल किया. पिछले साल विद्रोह को दबाने के लिए उन पर पुलिस को गोली चलाने का आदेश देने का भी आरोप लगा, हालांकि उन्होंने इससे इनकार किया है.

उथल-पुथल के बावजूद पार्टी के नेताओं का ओली में विश्वास

उथल-पुथल के बाद भी, उनकी पार्टी यूएमएल का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर अड़ा है कि केवल ओली ही देश को इस संकट से उबार सकते हैं. उनके समर्थकों का मानना ​​है कि उनका सक्रिय नेतृत्व पार्टी की लय को बहाल करेगा.

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वहीं आलोचकों का तर्क है कि उनके "अहंकारी और आत्मकेंद्रित" रवैये ने उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता को कमज़ोर कर दिया है और यूएमएल को रक्षात्मक स्थिति में धकेल दिया है. उनका कहना है कि एक दशक तक पार्टी का नेतृत्व करने और दो बार बहुमत वाली सरकारों का नेतृत्व करने के कारण ओली को शासन की कमियों की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

ओली की कुछ खूबियां निर्विवाद हैं. वे अपने दृढ़ राजनीतिक रुख और निडरता से तर्क देने के लिए जाने जाते हैं. माओवादी विद्रोह के दौर में, जब पहले संविधान सभा चुनाव के बाद यूएमएल का संगठनात्मक आधार कमजोर हो गया था, तब वे इसके सबसे मुखर आलोचकों में से एक बनकर उभरे. विश्लेषकों का मानना ​​है कि उनके माओ-विरोधी रुख ने यूएमएल के संगठनात्मक आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करने में मदद की.

बाद में, उन्होंने माओवादियों के साथ एकजुटता दिखाई, संविधान निर्माण में योगदान दिया और 2015 में भारत द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ मजबूती से खड़े रहे. इन कदमों ने उनकी राष्ट्रवादी छवि और लोकप्रियता को और बढ़ाया. 

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22 फरवरी 1952 को जन्म

22 फरवरी 1952 को पूर्वी नेपाल के तेरहथुम जिले में जन्मे ओली, मोहन प्रसाद और मधुमाया ओली की सबसे बड़ी संतान हैं. उनकी मां की चेचक से मृत्यु के बाद उनकी दादी ने उनका पालन-पोषण किया था. उन्होंने नौवीं कक्षा में ही स्कूल छोड़ दिया और राजनीति में आ गए थे. हालांकि, बाद में उन्होंने जेल से मानविकी विषयों में इंटरमीडिएट की पढ़ाई की. उनकी पत्नी, रचना शाक्य, भी एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता हैं.

ओली ने 1966 में राजा के प्रत्यक्ष शासन के तहत निरंकुश पंचायत प्रणाली के खिलाफ लड़ाई में शामिल होकर एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था. वह फरवरी 1970 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे. उसी वर्ष, उन्हें पंचायत सरकार ने पहली बार गिरफ़्तार किया था.

1971 में, उन्होंने झापा विद्रोह का नेतृत्व संभाला, जिसकी शुरुआत जिले के जमींदारों का सिर कलम करके की गई थी. ओली नेपाल के उन गिने-चुने राजनीतिक नेताओं में से एक हैं जिन्होंने कई साल जेल में बिताए. वह 1973 से 1987 तक लगातार 14 साल जेल में रहे.

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जेल से रिहा होने के बाद, वह यूएमएल की केंद्रीय समिति के सदस्य बने और 1990 तक लुम्बिनी क्षेत्र के प्रभारी रहे. पंचायत शासन को गिराने वाले वर्ष 1990 के लोकतांत्रिक आंदोलन के बाद ओली ने देश में लोकप्रियता हासिल की थी.

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