- दुनिया के ज्यादातर देशों में स्कूल की किताबों में न्यायपालिका की संरचना, भूमिका और स्वतंत्रता पढ़ाई जाती है.
- न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अलग कोई चैप्टर नहीं होता. भ्रष्टाचार सामाजिक मुद्दे के रूप में पढ़ाया जाता है.
- भारत में NCERT की किताब पर SC ने ही स्वतः संज्ञान लेते हुए न केवल तीखी प्रतिक्रिया दी बल्कि फटकार भी लगाई.
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को NCERT (नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग) की कक्षा 8 की सोशल साइंस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया. अदालत की नाराजगी इस किताब के एक अध्याय से है जिसे 'करप्शन इन ज्यूडिशरी' (न्यायपालिका में भ्रष्टाचार) का शीर्षक दिया गया है. इस चैप्टर में अदालतों में लंबित मामलों (पेंडिंग केस) और जजों की कमी का जिक्र किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुओ मोटो यानी स्वतः संज्ञान लिया और एनसीईआरटी को कड़ी फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा 'यह न्यायपालिका को बदनाम करने की साजिश प्रतीत होती है.' कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि इसे बगैर नियंत्रित किए छोड़ दिया गया तो न्यायपालिका के प्रति जनता में विश्वास कमजोर होगा. सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा, "एक झटके में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला कोर्ट के गौरवशाली इतिहास को नजरअंदाज कर दिया गया." कोर्ट ने इस चैप्टर के लिए एनसीईआरटी से एक प्रेस नोट जारी कर माफी मांगने को कहा है.
NCERT की इस किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ा चैप्टर सामने आने के बाद सवाल यह भी उठता है कि क्या दुनिया के अन्य देशों में भी स्कूल स्तर पर ऐसी पढ़ाई होती है? क्या अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप के अन्य देशों की स्कूल स्तरीय किताबों में जजों के भ्रष्टाचार पर अलग से चैप्टर पढ़ाया जाता है? यह जानना अहम इसलिए भी है, क्योंकि इससे पता चलता है कि दुनिया के बड़े लोकतंत्र अपनी न्यायपालिका को स्कूलों में किस नजर से पेश करते हैं. क्या वे सिर्फ आदर्श बताते हैं या कमियों पर भी बात करते हैं? यही तुलना भारत की बहस को वैश्विक संदर्भ देती है.
अमेरिका में क्या पढ़ाया जाता है?
अमेरिका में स्कूल स्तर पर ‘सिविक्स' या ‘गवर्नमेंट' नाम से विषय पढ़ाया जाता है. इसमें संविधान, अधिकारों, और सरकार की तीन शाखाओं- कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका- के बारे में विस्तार से बताया जाता है. छात्र सीखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट कैसे काम करता है, जजों की नियुक्ति कैसे होती है और ‘ज्यूडिशियल रिव्यू' क्या होता है. लेकिन यहां एक बात साफ है- अमेरिकी स्कूलों की मुख्यधारा की किताबों में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” नाम से कोई अलग चैप्टर नहीं मिलता.
छात्रों को यह जरूर बताया जाता है कि अगर कोई जज गलत आचरण करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया क्या है, जैसे महाभियोग या अनुशासनात्मक कार्रवाई. लेकिन यह चर्चा “चेक्स एंड बैलेंस” यानी संस्थागत संतुलन के संदर्भ में होती है, न कि न्यायपालिका को भ्रष्ट बताने के अंदाज में. अमेरिका में शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक राज्यों के हाथ में है. इसलिए कोई एक राष्ट्रीय किताब नहीं होती. यही वजह है कि विवादित या तीखे राजनीतिक विषयों से आमतौर पर स्कूल स्तर पर परहेज किया जाता है.
ब्रिटेन की तस्वीर कैसी है?
ब्रिटेन में सेकेंडरी स्कूलों में ‘सिटिजनशिप' और ‘पॉलिटिक्स' पढ़ाया जाता है. इसमें छात्रों को लोकतंत्र, कानून का शासन (रूल ऑफ लॉ), संसद और अदालतों की भूमिका समझाई जाती है. यहां भी जोर इस बात पर रहता है कि न्यायपालिका स्वतंत्र क्यों होनी चाहिए और लोकतंत्र में उसकी क्या अहमियत है. जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया और जवाबदेही के तंत्र की जानकारी दी जाती है. लेकिन ज्यूडिशियल करप्शन यानी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अलग से कोई अध्याय आम पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है. भ्रष्टाचार का जिक्र अगर आता भी है तो सामान्य रूप से- जैसे राजनीति, प्रशासन या सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के संदर्भ में.
यूरोप और दूसरे देशों में क्या होता है?
यूरोप के कई देशों में भी स्कूल स्तर पर नागरिक शास्त्र पढ़ाया जाता है. यहां भी बच्चों को यह सिखाया जाता है कि अदालतें कैसे काम करती हैं, कानून का शासन क्या होता है और नागरिकों के अधिकार क्या हैं. भ्रष्टाचार को कभी-कभी एक व्यापक सामाजिक समस्या के रूप में पढ़ाया जाता है- जैसे सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, नैतिकता और जवाबदेही. लेकिन न्यायपालिका को केंद्र में रखकर अलग अध्याय बनाना आम बात नहीं है. कई देशों में पाठ्यपुस्तकों की कड़ी समीक्षा होती है ताकि वे राजनीतिक रूप से संतुलित और निष्पक्ष रहें. इसलिए संवेदनशील संस्थाओं पर सीधे आरोपों या आलोचनाओं को स्कूल स्तर पर शामिल करने से बचा जाता है.
बड़ी तस्वीर क्या कहती है?
अगर पूरी दुनिया की तुलना करें तो एक पैटर्न साफ दिखता है. ज्यादातर देशों में स्कूल की किताबें न्यायपालिका की संरचना, उसकी भूमिका और स्वतंत्रता पर जोर देती हैं. जवाबदेही और नैतिकता का जिक्र जरूर होता है, लेकिन न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को अलग से शीर्षक बनाकर पढ़ाना आम प्रचलन नहीं है. यानी, भारत में जो विवाद सामने आया, वैसा उदाहरण फिलहाल दूसरे प्रमुख लोकतांत्रिक देशों में नहीं मिलता. हालांकि यह भी सच है कि उच्च शिक्षा स्तर- जैसे विश्वविद्यालयों में कानून या राजनीति विज्ञान- में न्यायपालिका की आलोचना, ऐतिहासिक मामलों और भ्रष्टाचार के आरोपों पर गंभीर चर्चा होती है. लेकिन स्कूल स्तर पर पाठ्यक्रम आमतौर पर संस्थाओं की बुनियादी समझ और लोकतांत्रिक मूल्यों पर केंद्रित रहता है.
दुनिया के बड़े लोकतंत्र- चाहे वो अमेरिका हो या ब्रिटेन- अपने स्कूल पाठ्यक्रम में न्यायपालिका की भूमिका, स्वतंत्रता और जवाबदेही तो पढ़ाते हैं, लेकिन न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अलग से अध्याय रखना सामान्य प्रथा नहीं है. भारत में हाल का विवाद इस मायने में अलग रहा कि यह विषय सीधे तौर पर स्कूल की किताब में सामने आया और उस पर सुप्रीम कोर्ट ने ही स्वतः संज्ञान लेते हुए न केवल तीखी प्रतिक्रिया दी बल्कि फटकार भी लगाई.













