मिडिल ईस्ट में युद्ध: ईरान के साथ अमेरिका का टकराव कब तक चलेगा? रक्षा विशेषज्ञ ने बताया आगे क्या होगा

मिडिल ईस्ट में ईरान के साथ इजरायल और अमेरिका के बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. क्या यह संघर्ष लंबे युद्ध में बदलेगा? क्या तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर? डिफेंस एक्सपर्ट मेजर जनरल एके सिवाच से समझिए पूरा समीकरण.

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  • मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल-ईरान के बीच सैन्य टकराव तेजी से बढ़ रहा है और लगातार हमले-जवाबी हमले हो रहे हैं.
  • रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार यह संघर्ष लंबे समय तक प्रॉक्सी वॉर और मिसाइल-ड्रोन हमलों के रूप में जारी रह सकता है.
  • फिलहाल विश्व युद्ध की संभावना कम है, पर संघर्ष बढ़ा तो तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है.
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मिडिल ईस्ट इस समय बेहद तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा है. अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच सैन्य टकराव लगातार तेज होता जा रहा है. मिसाइल हमले, एयर स्ट्राइक और जवाबी कार्रवाई की धमकियों ने पूरे इलाके में अस्थिरता और चिंता का माहौल बना दिया है. इस टकराव की गंभीरता को समझने के लिए NDTV ने रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल एके सिवाच (रिटायर्ड) से बातचीत की. उन्होंने मौजूदा हालात, संभावित रणनीति और आगे क्या हो सकता है, इस पर विस्तार से अपनी राय दी.

मेजर जनरल सिवाच के मुताबिक इस टकराव में अमेरिका और इजरायल का मुख्य फोकस ईरान की मिसाइल क्षमता को सीमित करना है. इसके साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में सफल न हो सके. 

रिटायर्ड मेजर जनरल एके सिवाच कहते हैं कि अमेरिका और इजरायल का आरोप है कि ईरान क्षेत्र में कई प्रॉक्सी संगठनों के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाता है. इन संगठनों के जरिए वह क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरण को प्रभावित करता है. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अमेरिका कुछ सैन्य लक्ष्यों को हासिल भी कर लेता है, तब भी ईरान की परमाणु संरचना और उसके क्षेत्रीय नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होगा.

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लंबा चल सकता है जवाबी हमलों का दौर

रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार यह टकराव फिलहाल जल्दी खत्म होने वाला नहीं है. इसके बजाय यह लंबे समय तक हमला और पलटवार के दौर में बदल सकता है. वे कहते हैं कि ईरान सीधे युद्ध के बजाय अप्रत्यक्ष रणनीति अपनाने की कोशिश कर सकता है. इसके तहत वह अपने सहयोगी संगठनों के जरिए जवाबी कार्रवाई करेगा. इनमें प्रमुख रूप से हिज्बुल्लाह और हूती जैसे समूह शामिल हैं. इन संगठनों के जरिए मिसाइल और ड्रोन हमले किए जा सकते हैं. ऐसे हमले इस इलाके में इन देशों के रणनीतिक ठिकानों और सैन्य संसाधनों को निशाना बना सकते हैं. मेजर जनरल सिवाच का कहना है कि अगर इस तरह की कार्रवाई तेज होती है तो यह टकराव धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल सकता है.

क्या यह युद्ध और बड़ा हो सकता है?

रिटायर्ड मेजर जनरल एके सिवाच के मुताबिक अगर इस संघर्ष में और देश शामिल होते हैं तो यह एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल इसके तीसरे विश्व युद्ध में बदलने की संभावना कम है. दुनिया की बड़ी ताकतें सीधे युद्ध में कूदने के बजाय नियंत्रित तनाव की रणनीति अपनाना चाहेंगी. मिडिल ईस्ट के कई देश इस टकराव को बढ़ने से रोकने की कोशिश करेंगे. इनमें प्रमुख रूप से सऊदी अरब, यूएई ओमान, जॉर्डन, कतर और बहरीन शामिल हैं. इन देशों को डर है कि अगर युद्ध बढ़ा तो इसका सीधा असर उनकी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

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रूस और चीन का रुख क्या होगा

रक्षा विशेषज्ञ रिटायर्ड मेजर जनरल एके सिवाच का मानना है कि रूस और चीन इस संघर्ष में सीधे सैन्य तौर पर शामिल होने से बचेंगे. दोनों देश अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को ध्यान में रखेंगे. वे कूटनीतिक स्तर पर ईरान का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन अमेरिका के साथ सीधे सैन्य टकराव से बचना चाहेंगे.

हाल के दिनों में यह चर्चा भी हो रही है कि क्या इस संघर्ष के जरिए ईरान में सत्ता परिवर्तन हो सकता है. लेकिन मेजर जनरल सिवाच का कहना है कि बिना जमीनी सैनिक भेजे ऐसा करना लगभग असंभव है. उन्होंने कहा कि अमेरिका पहले ही इराक युद्ध और अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्धों का अनुभव कर चुका है. इसलिए ईरान जैसे बड़े और जटिल देश में जमीनी सैनिक भेजना बेहद मुश्किल फैसला होगा.

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उनके मुताबिक अगर कोई सैन्य अभियान चलता भी है तो वह मुख्य रूप से एयर स्ट्राइक, नौसैनिक ऑपरेशन, आर्थिक प्रतिबंध और रणनीतिक दबाव के जरिए ही चलाया जाएगा.

तेल बाजार पर भी बड़ा खतरा 

इस टकराव का असर सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहेगा. इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर पड़ सकता है. अगर हॉर्मुज स्ट्रेट में किसी तरह की रुकावट आती है तो दुनिया की तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है. यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है. ऐसे में अगर यहां से तेल की आवाजाही प्रभावित हुई तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है. इससे दुनिया भर में महंगाई बढ़ सकती है और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव आ सकता है.

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Photo Credit: AFP

संयुक्त राष्ट्र की अपील

बढ़ते तनाव को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ और कई देशों ने संयम बरतने और बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अगर यह टकराव और बढ़ता है तो इससे मानवीय संकट और क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा हो सकती है.

आगे क्या हो सकता है?

मेजर जनरल सिवाच के अनुसार मौजूदा हालात बेहद गंभीर और तेजी से बदलने वाले हैं. हालांकि उनका मानना है कि अगर कूटनीतिक कोशिशें जारी रहती हैं और बड़े देश संयम बरतते हैं, तो यह टकराव वैश्विक युद्ध बनने के बजाय क्षेत्रीय स्तर तक सीमित रह सकता है. लेकिन अगर किसी भी पक्ष ने बड़ा सैन्य कदम उठा लिया तो हालात तेजी से बदल सकते हैं.

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