मेक्सिको में आर्मी को जंग के लिए तैयार ही नहीं किया जाता, फिर आखिर क्या करती है वहां की फौज?

मेक्सिको ने अपनी सेना को घातक हथियारों से लैस करने के बजाय उसे आंतरिक व्यवस्था और 'ड्रग लॉर्ड्स' (नशा तस्करों) से निपटने के लिए एक सुरक्षा बल के रूप में ढाल दिया है.

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दुनियाभर में सेना का मतलब सरहदों की हिफाजत और दुश्मन मुल्कों से जंग लड़ना होता है, लेकिन मेक्सिको में कहानी बिल्कुल उलट है. करीब 13 करोड़ की आबादी वाले इस देश की फौज के पास न तो दुश्मन से लड़ने के लिए भारी-भरकम टैंक हैं और न ही आसमान की सुरक्षा के लिए आधुनिक फाइटर जेट्स.  आलम यह है कि 1982 में अमेरिका से खरीदे गए 12 सुपरसोनिक विमानों में से आज सिर्फ 3 ही उड़ान भरने की स्थिति में हैं. पिछले 50 सालों से मेक्सिको ने एक भी नया फाइटर जेट नहीं खरीदा है, जबकि इसके पड़ोसी मुल्क ब्राजील और चिली के पास ऐसे विमानों की बड़ी खेप मौजूद है.

मेक्सिको की सेना को पारंपरिक युद्ध के लिए तैयार न करने के पीछे एक खास कूटनीति और इतिहास है. दरअसल, मेक्सिको का मानना है कि उसके पड़ोस में कोई ऐसा 'दुश्मन' है ही नहीं जिससे उसे खतरा हो. एक तरफ दुनिया की महाशक्ति अमेरिका है जिससे वह लड़ नहीं सकता और दूसरी तरफ ग्वाटेमाला जैसे छोटे देश हैं जिनसे उसे कोई खतरा नहीं है. यही वजह है कि मेक्सिको ने अपनी सेना को घातक हथियारों से लैस करने के बजाय उसे आंतरिक व्यवस्था और 'ड्रग लॉर्ड्स' (नशा तस्करों) से निपटने के लिए एक सुरक्षा बल के रूप में ढाल दिया है.

तख्तापलट के डर से कमजोर रखी गई फौज

लेकिन जानकारों की राय थोड़ी सी अलग है. सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मेक्सिको की सरकारों ने जानबूझकर सेना को 'हथियारों के मामले में' कमजोर रखा है. लैटिन अमेरिका के इतिहास में सैन्य तख्तापलट की कई घटनाएं हुई हैं.

मेक्सिको के नेता नहीं चाहते थे कि सेना इतनी ताकतवर हो जाए कि वह सरकार को ही चुनौती देने लगे. इसके बजाय, सेना का इस्तेमाल सत्ता को मजबूत करने और राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए किया गया. यही कारण है कि मेक्सिको के पास आज एक भी भारी टैंक नहीं है और ग्लोबल मिलिट्री इंडेक्स में इसकी रैंकिंग काफी नीचे है.

दिलचस्प बात यह है कि संसाधनों की कमी के बावजूद मेक्सिको के लोगों में सेना के प्रति जबरदस्त सम्मान है. वहां के समाज में नेवी या आर्मी का हिस्सा बनना गर्व की बात मानी जाती है. सेना सिर्फ बॉर्डर पर नहीं, बल्कि सड़कों पर पुलिस के साथ मिलकर काम करती है. लेकिन इस व्यवस्था में एक बड़ी खामी भी है. सेना के भीतर अमीरी और गरीबी की गहरी खाई है; जहां ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी विदेशों में ट्रेनिंग लेते हैं और आधुनिक मैनुअल पढ़ते हैं, वहीं जमीनी सैनिक बेहद कम संसाधनों और पुरानी ट्रेनिंग के भरोसे ड्रग तस्करों का सामना करते हैं.

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जब सेना ही बनी आखिरी उम्मीद

साल 2006 से मेक्सिको ने नशीली दवाओं के खिलाफ सबसे आक्रामक जंग शुरू की. सरकार ने सेना को सीधे मैदान में उतार दिया, लेकिन नतीजे उम्मीद के उलट रहे. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक,  हत्याएं 200% तक बढ़ गईं और ड्रग कार्टेल्स और भी ताकतवर हो गए. 

पूर्व राष्ट्रपति लोपेज ओब्रेडोर के दौर में तो सेना को सड़कों, हवाई अड्डों और होटलों के निर्माण जैसे सिविल इंजीनियरिंग के कामों में लगा दिया गया. मेक्सिकन सेना का बजट तो बढ़ा, लेकिन वह हथियारों के लिए नहीं बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए था.

हाल ही में जब एक स्पेशल यूनिट ने कुख्यात ड्रग तस्कर 'अल मेंचो' को मार गिराया, तो ड्रग माफियाओं ने 20 राज्यों में आगजनी और गोलीबारी कर सेना की घेराबंदी कर दी. इसने साबित कर दिया कि बिना आधुनिक हथियारों और पुख्ता इंटेलिजेंस के, सेना के लिए अपने ही देश के भीतर इन 'अदृश्य दुश्मनों' पर काबू पाना कितना मुश्किल है.

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