बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक मामले की सुनवाई करते हुए साफ कर दिया कि वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद या कलह को जीवनसाथी को आत्महत्या के लिए उकसाना (Abetment to Suicide) नहीं माना जा सकता है. हाईकोर्ट ने साफ किया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (अब भारतीय न्याय संहिता) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए, आरोपी का मृतक को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का प्रत्यक्ष इरादा या वैसी कोई ठोस क्रिया होना आवश्यक है. केवल वैवाहिक जीवन के तनाव या झगड़ों को कानूनी दायरे में 'उकसाना' नहीं कहा जा सकता है.
क्या है मामला?
दरअसल एक महिला की आत्महत्या के मामले में उसके पति और ससुराल वालों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. आरोपियों ने इस केस को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पति के उत्पीड़न और लगातार होने वाले झगड़ों के कारण पीड़िता ने यह आत्मघाती कदम उठाया.
पति को दोषी नहीं मान सकते: बॉम्बे हाईकोर्ट
अदालत ने कहा कि हर व्यक्ति की मुश्किलों का सामना करने की क्षमता अलग-अलग होती है. वैवाहिक जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन हर विवाद का अर्थ उत्पीड़न या क्रूरता नहीं होता है.
केस रद करने का आदेश
न्यायालय के अनुसार, आत्महत्या के लिए उकसाने के उद्देश्य से आरोपी ने सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया हो या कोई साजिश रची हो, ऐसे सबूत होना अनिवार्य है. हाईकोर्ट ने संबंधित पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने का आदेश दिया है.
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