कहीं खामेनेई जैसा हश्र न हो जाए...पाकिस्तान से लौटे ईरानी वार्ताकारों को था मौत का खतरा, फिल्मी स्टाइल में घर वापसी

सुरक्षा कारणों से ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने उड़ान का मार्ग अचानक बदलकर विमान को मशहद में सुरक्षित लैंड कराया. मशहद पहुंचने के बाद टीम के सदस्य अलग-अलग मार्गों से तेहरान पहुंचे ताकि किसी भी हमले की संभावना टाली जा सके.

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ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता से जुड़ी हैरान करने वाली खबर सामने आई है. इस बातचीत में शामिल रहे ईरानी प्रतिनिधिमंडल के सदस्य प्रोफेसर मोहम्मद मरंडी ने खुलासा किया है कि वार्ता के बाद जब वे वापस लौट रहे थे, तो उन पर हत्या का साया मंडरा रहा था.  ईरानी अधिकारियों को इस बात का पुख्ता डर था कि उनके विमान को बीच रास्ते में ही मिसाइल से मार गिराया जा सकता है, जिसके चलते उन्हें अपनी जान बचाने के लिए फिल्मी अंदाज में आखिरी वक्त पर पूरा रूट बदलना पड़ा.

लेबनानी न्यूज चैनल 'अल मयदीन' से बात करते हुए प्रोफेसर मरंडी ने बताया कि इस्लामाबाद में अमेरिका के साथ हुई बातचीत के दौरान सुरक्षा का खतरा इतना बढ़ गया था कि ईरानी डेलिगेशन को अपनी सुरक्षा रणनीति पूरी तरह गोपनीय रखनी पड़ी. उन्होंने कहा कि हम सभी को इस बात का यकीन हो गया था कि हमारे विमान को निशाना बनाया जा सकता है.

बीच हवा में बदला रास्ता, मसाद में हुई लैंडिंग

प्रोफेसर मरंडी ने कहा, "वापसी के दौरान हम सीधे तेहरान के लिए रवाना नहीं हुए. यह एक बहुत लंबी कहानी है, लेकिन उस समय हम सबको लग रहा था कि इसकी पूरी संभावना है कि 'वे' हमारे विमान को मार गिराएंगे या हमारे प्लेन पर मिसाइल दाग देंगे." 

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इसी जानलेवा खतरे को देखते हुए ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अपनी रणनीति बदली और बेहद गुप्त तरीके से एक दूसरे विमान में सवार हुए. खतरे को टालने के लिए उस विमान को भी तेहरान नहीं ले जाया गया. उड़ान के दौरान अचानक प्लेन का रूट डायवर्ट कर दिया गया और उसे तेहरान के बजाय मशहद शहर में बहुत तेजी से लैंड कराया गया. यह सब इतनी गोपनीयता और फुर्ती के साथ किया गया ताकि संभावित हमलावरों को डेलिगेशन की सही लोकेशन का पता न चल सके.

ट्रेन और बस से तेहरान पहुंचे अधिकारी

मशहद में सुरक्षित लैंडिंग के बाद भी ईरानी अधिकारियों ने हवाई मार्ग का इस्तेमाल करना सुरक्षित नहीं समझा. मरंडी ने बताया कि मशहद पहुंचने के बाद प्रतिनिधिमंडल के सदस्य अलग-अलग गुटों में बंट गए. कोई ट्रेन से, कोई कार से तो कोई बस के जरिए सड़क मार्ग से होते हुए तेहरान पहुंचा. यह पूरी कवायद इसलिए की गई ताकि अगर किसी एक रूट पर हमला हो भी, तो पूरी टीम सुरक्षित रहे.

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