ईरान युद्ध के कारण 3 करोड़ से अधिक लोग गरीबी में जा रहे हैं: यूएनडीपी

डी क्रू ने कहा कि संकट के अप्रत्यक्ष प्रभावों से वैश्विक जीडीपी का अनुमानित 0.5% से 0.8% हिस्सा नष्ट हो चुका है. उन्होंने कहा, "दशकों में बनी चीज़ें, आठ हफ़्तों के युद्ध में नष्ट हो जाती हैं."

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गाजा से लेकर सूडान तक भूखमरी बढ़ने की आशंका है.
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  • संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के प्रमुख ने कहा कि युद्ध के कारण तीन करोड़ से अधिक लोग गरीबी में फंस जाएंगे
  • होर्मुज जलडमरूमध्य में मालवाहक जहाजों के अवरुद्ध होने से उर्वरक की कमी और कृषि उत्पादकता प्रभावित हुई है
  • खाद्य असुरक्षा इस वर्ष के अंत तक अपने चरम पर पहुंचने की संभावना जताई गई है, जिससे संकट गहरा होगा
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संयुक्त राष्ट्र विकास (UNDP) प्रमुख अलेक्जेंडर डी क्रू ने गुरुवार को कहा कि ईरान युद्ध के प्रभावों के कारण 3 करोड़ से अधिक लोग गरीबी में धकेले जाएंगे. ये व्यवधान ऐसे समय में उत्पन्न हुए हैं, जब किसान फसलें बो रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के प्रशासक ने रॉयटर्स को बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से मालवाहक जहाजों के अवरुद्ध होने के कारण उर्वरक (खाद) की कमी और बढ़ गई है, जिससे कृषि उत्पादकता पहले ही कम हो गई है.

बेल्जियम के पूर्व प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि इससे इस वर्ष के अंत में फसल की पैदावार पर भी असर पड़ने की संभावना है. उन्होंने कहा, “कुछ ही महीनों में खाद्य असुरक्षा अपने चरम पर होगी - और इसके बारे में आप कुछ खास नहीं कर सकते.” उन्होंने ऊर्जा की कमी और गिरती हुई प्रेषण राशि सहित संकट के अन्य दुष्परिणामों का भी उल्लेख किया. उन्होंने आगे कहा, “भले ही युद्ध कल ही रुक जाए, लेकिन इसके प्रभाव पहले से ही मौजूद हैं, और ये 3 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी की ओर धकेल देंगे.”

मध्य पूर्व और होर्मुज क्यों जरूरी 

विश्व का अधिकांश उर्वरक मध्य पूर्व में उत्पादित होता है, और वैश्विक आपूर्ति का एक तिहाई हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जहां ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका नियंत्रण के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इस महीने की शुरुआत में, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने चेतावनी दी थी कि युद्ध से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे दुनिया की सबसे कमजोर आबादी पर और अधिक बोझ पड़ेगा.

डी क्रू ने कहा कि संकट के अप्रत्यक्ष प्रभावों से वैश्विक जीडीपी का अनुमानित 0.5% से 0.8% हिस्सा नष्ट हो चुका है. उन्होंने कहा, "दशकों में बनी चीज़ें, आठ हफ़्तों के युद्ध में नष्ट हो जाती हैं." सूडान, गाज़ा और यूक्रेन जैसे गंभीर आपात स्थितियों का सामना कर रहे क्षेत्रों में धन की कमी और बढ़ती ज़रूरतों के कारण मानवीय सहायता प्रयासों पर भी संकट का दबाव बढ़ रहा है. उन्होंने कहा, "हमें कुछ लोगों से कहना पड़ेगा, हमें खेद है, लेकिन हम आपकी मदद नहीं कर सकते." उन्होंने आगे कहा, "जो लोग मदद पर निर्भर थे, उन्हें अब मदद नहीं मिलेगी और वे और भी अधिक असुरक्षित हो जाएंगे."

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