ईरान और अमेरिका के बीच हालिया सैन्य टकराव के बाद दुनिया भर के भू-राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. इसका सबसे बड़ा असर ताइवान में देखने को मिल रहा है. ताइवान के लोग अब अमेरिका की सुरक्षा गारंटी को शक की निगाह से देखने लगे हैं. एक नए सर्वे ने वाशिंगटन की नींद उड़ा दी है, क्योंकि आधे से ज्यादा ताइवानी जनता को अब यह भरोसा नहीं रहा कि चीन के हमले की स्थिति में अमेरिका अपनी सेना उनके बचाव में भेजेगा. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, ताइपे स्थित 'डेमोक्रेसी फाउंडेशन' की ओर से जारी किए गए सर्वे के आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं.
सर्वे के मुताबिक, करीब 57 प्रतिशत लोगों का मानना है कि अगर ताइवान जलडमरूमध्य में युद्ध छिड़ता है, तो अमेरिका अपनी सेना नहीं भेजेगा. लोगों को लगता है कि अमेरिका, चीन के साथ सीधे सैन्य संघर्ष का जोखिम उठाने से बचेगा.
सिर्फ 25 प्रतिशत से भी कम लोगों को यह उम्मीद है कि वाशिंगटन सैन्य रूप से उनकी मदद करेगा. यह गिरावट उस समय आई है जब ताइवान पर बीजिंग का सैन्य दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.
हथियारों की ताकत पर भी उठने लगे सवाल
बात सिर्फ सेना भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि ताइवानी जनता अब अमेरिकी हथियारों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठा रही है. सर्वे में शामिल 55.6 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि संकट के समय अमेरिकी सेना समय पर और प्रभावी सहायता प्रदान कर पाएगी.
दो मोर्चों पर उलझा अमेरिका
डेमोक्रेसी फाउंडेशन के शोधकर्ता चांग चुन-काई ने कहा कि ताइवानी धारणा में यह बदलाव वैश्विक संघर्षों को करीब से देखने के बाद आया है. यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में ईरान-इजरायल तनाव ने यह संदेश दिया है कि अमेरिकी सैन्य शक्ति की भी अपनी सीमाएं हैं. चांग के अनुसार, लोगों को लगने लगा है कि अमेरिका अब एक साथ कई बड़े युद्ध क्षेत्रों को संभालने की क्षमता खो चुका है.
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ऐसी स्थिति में ताइवान के लोग क्या चाहते हैं?
सर्वे के नतीजे बताते हैं कि ताइवान की जनता अब सैन्य टकराव के बजाय कूटनीति की ओर झुक रही है. जब लोगों से पूछा गया कि क्या चीन के साथ शांति के लिए बातचीत करना 'आत्मसमर्पण' माना जाएगा, तो केवल 17.6 प्रतिशत ने सहमति जताई. इसके विपरीत, 57.4 प्रतिशत लोगों ने इसे जान-माल की रक्षा के लिए 'सर्वाइवल विजडम' यानी जीवन बचाने की समझदारी बताया.
भविष्य के रास्ते पर करीब 50 प्रतिशत लोगों ने युद्ध से बचने के लिए चीन के साथ सक्रिय बातचीत का समर्थन किया, जबकि सिर्फ 28 प्रतिशत लोग अमेरिका पर भरोसा करने और अधिक हथियार खरीदने के पक्ष में दिखे.
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