अमेरिका बिल्कुल सही था... ईरान के पास 'परमाणु हथियार' तो हैं, लेकिन ये बम नहीं कुछ और ही है

होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण अमेरिका के लिए चुनौती बन गया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और राजनीति प्रभावित हो रही है. दशकों से लोग डर रहे थे कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बना सकता है लेकिन ईरान ने तरुप का इक्का ढूंढ लिया है.

परमाणु हथियार. खास तौर से, अनुमानित 440 किलोग्राम 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम. ये हथियार बनाने की 90 प्रतिशत की सीमा से कम है, लेकिन जरूरत पड़ने पर आठ से 12 बम बनाने के लिए काफी है.  अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और पेंटागन के वॉर रूम में युद्ध से पहले जो नक्शा लटका था, उस पर एक खास निशान था. ये निशान ईरान के परमाणु भंडार पर था. अमेरिका और इज़रायल दशकों से जिस 60% संवर्धित यूरेनियम से डर रहे थे. लेकिन असली बम तो कुछ और ही निकला. 

ईरान ने दुनिया को दिखा दिया है कि उसे अपनी रक्षा के लिए किसी बम की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके पास होर्मुज जलडमरूमध्य जैसा तुरुप का इक्का है. 

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दलील हमेशा यही रही है कि तेहरान के पास परमाणु बम दुनिया के एक अस्थिर हिस्से में अन्य क्षेत्रीय शक्तियों जैसे सऊदी अरब, मिस्र या तुर्की को परमाणु हथियारों की होड़ में धकेल सकता है. ये एक ऐसा क्षेत्र है जो दुनिया को एक-तिहाई तेल और गैस, और भारी मात्रा में उर्वरक और अन्य कच्चे माल की आपूर्ति करता है. 

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आम लोगों की चिंता हमेशा से वेस्ट एशिया पर स्ट्रेटेजिक कंट्रोल खोने की रही है, यानी यह डर कि न्यूक्लियर ताकत वाला ईरान इलाके के पावर इक्वेशन को नए सिरे से लिखेगा और दूसरे अरब देशों के साथ पश्चिमी देशों के रिश्ते कमजोर कर देगा. इससे यूरोप और बाकी एशिया को जोड़ने वाला एक अहम ट्रेड और मिलिट्री हब खत्म हो जाएगा.

दशकों तक कमरतोड़ आर्थिक प्रतिबंधों और युद्ध की धमकियों के बीच गुज़ारे ईरान ने महसूस किया कि उसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए परमाणु हथियारों की आवश्यकता है. लेकिन, जैसा कि अब सामने आया है, ईरान को वास्तव में कभी भी परमाणु बमों की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उसके पास होर्मुज जलडमरूमध्य था.

तेहरान के टैंकर ट्रैफिक को रोकने से पता चला कि यह चैनल एक न्यूक्लियर बम के ज्योग्राफिकल बराबर है. यह दुनिया के समुद्री कच्चे तेल और गैस के 20-25 परसेंट ट्रेड को हैंडल करता है. 

US के युद्ध में जल्दबाजी करने की वजह से ही ईरान ने वह 'न्यूक्लियर बम' दुनिया की गोद में गिरा दिया. यह पॉइंट बहुत ज़रूरी है क्योंकि इससे पता चलता है कि होर्मुज चोकपॉइंट इस युद्ध के खत्म होने के बाद भी इलाके की जियोपॉलिटिक्स को बदल देगा. होर्मुज ईरान के लिए अमेरिका से लड़ने का मजबूत ट्रंप कार्ड हो चुका है. 

होर्मुज की शक्ल में परमाणु बम

होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है. खास तौर पर, यह सऊदी अरब और यूएई के कच्चे तेल के निर्यात टर्मिनलों को एशिया और उससे आगे के बाजारों से जोड़ता है. युद्ध से पहले यहां से रोजाना अनुमानित 20-21 मिलियन बैरल तेल गुजरता था. इसका बड़ा हिस्सा भारत, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान द्वारा खरीदा जाता था. चारों देश ने 2025 में अनुमानित 76 प्रतिशत तेल खरीदा और सामूहिक रूप से वैश्विक जीडीपी में 30 प्रतिशत का योगदान दिया.

होर्मुज के रास्ते भेजा जाने वाला कच्चा तेल बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और फिलीपींस जैसे छोटे एशियाई देशों के साथ-साथ कंबोडिया और लाओस जैसे दक्षिण-पूर्वी देशों के लिए भी ऊर्जा का एक अहम स्रोत है. ये सभी देश अब ईंधन राशनिंग मोड में हैं.

ईरान की ओर से कच्चे तेल की आपूर्ति रोकने के प्रभाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को तेजी से बदल दिया. पिछले महीने अमेरिकी वित्तीय सेवा फर्म मॉर्निंगस्टार ने कहा था कि वैश्विक नुकसान $330 बिलियन से $2.2 ट्रिलियन तक हो सकता है. ये नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि युद्ध कितने समय तक चलता है और ठप रहने की स्थिति कितनी रहती है.

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US फेडरल रिजर्व कम निराशावादी था, लेकिन फिर भी उसने कहा कि एक तिमाही की भी गिरावट से ग्लोबल GDP ग्रोथ रेट सालाना 2.9 परसेंट कम हो सकती है. भारत के लिए, यह रोक GDP में एक परसेंट के संभावित नुकसान में बदल सकती है, यह एक ऐसा झटका है जो इसलिए सीमित है क्योंकि देश दूसरों की तुलना में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार है.

अमेरिका को बेहद लाचार बना दिया

यह जलडमरूमध्य अपने सबसे संकरे बिंदु पर 33 किलोमीटर से भी कम चौड़ा है. ये इलाका पहाड़ी पश्चिमी तट और किलेबंद खार्ग और केशम द्वीपों से ईरान को निगरानी के मौके देता है. इसके जरिए ही ईरान केवल दो मान्यता प्राप्त शिपिंग लेन में से एक पर नियंत्रण कर पा रहा है.

एक बार युद्ध शुरू होने के बाद, तेहरान ने ब्रेंट क्रूड की कीमतों को $110 प्रति बैरल की लक्ष्मण रेखा के पार ले जाने के लिए जलडमरूमध्य को रोक दिया और यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में उपभोक्ताओं के लिए ईंधन और गैस की कीमतों में वृद्धि करने पर मजबूर कर दिया.

असल में उसे बस टैंकरों को क्रॉसिंग के खिलाफ चेतावनी देनी थी और अपनी बात मनवाने के लिए कुछ पर गोली चलानी थी और बाकी काम इंश्योरेंस प्रोवाइडर और जहाज मालिकों ने कर दिया. क्योंकि युद्ध के आशंका या हमले के बाद प्रीमियम की कीमतें बढ़ जाती हैं.

कुछ ही घंटों में ट्रांज़िट की संख्या गिर गई. पोर्ट टर्मिनल में स्टोर किया गया क्रूड जमा हो गया, जिससे तेल का प्रोडक्शन धीमा हो गया या बंद भी हो गया. यहां बात सिर्फ तेल की नहीं हो रही है. दुनिया की लगभग 20 परसेंट गैस सप्लाई और 33 परसेंट फर्टिलाइज़र जहाज होर्मुज से होकर जाते हैं. इसके साथ ही मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस के लिए ज़रूरी दुर्लभ मिनरल भी इस इलाके से होकर जाती हैं.

यूरोप में अमेरिका के सहयोगी देश पहले से ही इस बात से परेशान थे कि युद्ध की शुरुआत में उनसे सलाह नहीं ली गई थी, अब पीछे हटने लगे हैं और अमेरिका और ट्रंप प्रशासन की आलोचना भी कर रहे हैं क्योंकि उनके वोटर बढ़ती कीमतों की शिकायत कर रहे हैं. इस बीच अमेरिकी वोटर भी फ्यूल की कीमतों पर गुस्सा जाहिर करने लगे हैं. इस वजह से ट्रंप पर दबाव खासा बढ़ा है.

ट्रुथ सोशल पर ट्रंप के गुस्से में यह दबाव साफ दिख रहा था. इसमें उन्होंने बार-बार ईरान से स्ट्रेट को फिर से खोलने या गंभीर नतीजे भुगतने की मांग की है. लेकिन ईरान ने धमकियों को हंसी में उड़ा दिया और स्ट्रेट बंद रहा... और US कुछ खास नहीं कर सका।

लेकिन शांति के बाद क्या?

अमेरिकी और ईरानी वार्ताकारों के इस सप्ताह दूसरे दौर की बातचीत के लिए पाकिस्तान में होने की उम्मीद है. हालांकि ईरान की ओर से अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन चाहे लड़ाई दोबारा शुरू हो या न हो, ईरान जानता है कि होर्मुज उसे अमेरिका पर एक अहम बढ़त देता है.

वह इस बढ़त से कितना लाभ निचोड़ सकता है, यह पूरी तरह से अलग बहस का विषय है. अमेरिका ने ईरान द्वारा प्रति जहाज 2 मिलियन डॉलर तक का टोल वसूलने की संभावना पर अपनी नाराजगी साफ कर दी है.

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जिन देशों के लिए होर्मुज एक महत्वपूर्ण निर्यात मार्ग है, उन्होंने भी इसपर चिताएं जाहिर की हैं. संयुक्त राष्ट्र ने जोर दिया है कि होर्मुज जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्गों को वैश्विक शिपिंग के लिए खुला और स्वतंत्र रहना चाहिए.

लेकिन ईरान ने भी साफ कर दिया है कि वह इससे असहमत है और वह समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCLOS) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है. ये कानून अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र के लिए कानून निर्धारित करता है. ईरान का कहना है कि वह होर्मुज का कानूनी हकदार है. ईरान मानता है कि उसकी तटरेखा से 12 समुद्री मील (लगभग 22 किमी) की दूरी उसका संप्रभु क्षेत्र है.

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