तल्ख तेवर, जंग के जख्मों की टीस और जुबानी जंग... ईरान-अमेरिका वार्ता से पहले किसने क्या दिया मैसेज?

ईरान ने लेबनान में हमलों की रोक और फ्रीज संपत्ति की रिहाई को वार्ता की शर्त रखा, जबकि अमेरिका यूरेनियम संवर्धन रोकने पर जोर दे रहा है.

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  • US और ईरान के बीच स्थायी सीजफायर के लिए पाकिस्तान की मेजबानी में उच्चस्तरीय वार्ता हो रही है
  • वार्ता से पहले दोनों पक्षों ने कड़वे बयान और शर्तें रखी हैं, जिससे शांति प्रयासों पर अनिश्चितता बढ़ी है
  • ईरान ने लेबनान में इजरायली हमले बंद करने और अपनी फ्रीज संपत्ति रिलीज करने की दो शर्तें रखी हैं
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US Iran Ceasefire: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को पूरी तरह खत्म करने के मकसद से पाकिस्तान की मेजबानी में 'हाई-प्रोफाइल' वार्ता आज यानी 11 अप्रैल 2026 से शुरू हो रही है. हालांकि, मेज पर बैठने से ठीक पहले दोनों पक्षों के बीच कड़वाहट और धमकियों का दौर जारी है. इस वजह से शांति की इस कोशिश पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं. इस्लामाबाद के 'सरेना होटल' या प्रधानमंत्री आवास के पास सुरक्षित क्षेत्र में यह बैठक स्थानीय समयानुसार सुबह 10:00 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 10:30 बजे) शुरू होने का कार्यक्रम है. यह बैठक अगले दो सप्ताह के लिए घोषित संघर्षविराम (Iran US Ceasefire) का हिस्सा है.

वार्ता से पहले जुबानी जंग और धमकियां

अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस बातचीत की कमान संभाल रहे हैं. उन्होंने इस्लामाबाद रवाना होने से पहले स्पष्ट शब्दों में ईरान को चेतावनी दी है. वेंस ने कहा कि अगर ईरान नेक नीयत से बात करना चाहता है तो हम हाथ मिलाने को तैयार हैं, लेकिन अगर उन्होंने हमारे साथ 'खेलने' (धोखा देने) की कोशिश की, तो हमारी टीम उन्हें कतई रियायत नहीं देगी. 

दूसरी तरफ, ईरान के तेवर भी बेहद सख्त हैं. ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने सोशल मीडिया पर साफ कर दिया कि बातचीत शुरू होने से पहले उनकी दो शर्तें पूरी होनी चाहिए. पहली लेबनान में इजरायली हमलों पर तुरंत रोक लगे और दूसरी अमेरिका की ओर से फ्रीज की गई ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति को तुरंत रिलीज किया जाए. ईरान ने दो टूक कहा है कि जब तक ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, वार्ता का कोई मतलब ही नहीं है.

'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' का पेंच

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए हैं. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर ईरान की घेराबंदी करते हुए कहा कि ईरान के पास बातचीत के लिए कोई ठोस कार्ड नहीं है. वे सिर्फ अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों (होर्मुज जलडमरूमध्य) को रोककर दुनिया को डराने और उगाही करने की कोशिश कर रहे हैं. ट्रंप का गुस्सा इस बात पर है कि युद्धविराम के बावजूद ईरान ने तेल की सप्लाई के लिए रास्ता पूरी तरह नहीं खोला है.

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ईरान का आरोप है कि अमेरिका अपने वादों से मुकर रहा है. ईरान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि अगर लेबनान में इजरायली हमले नहीं रुकते, तो इस्लामाबाद वार्ता 'बेमानी' है. दरअसल, ईरान लेबनान को भी इसी युद्धविराम का हिस्सा मान रहा है, जबकि अमेरिका और इजरायल इसे एक अलग मोर्चे के तौर पर देख रहे हैं.

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क्या है ईरान अमेरिका वार्ता का असली एजेंडा?

इस वार्ता के लिए दोनों पक्षों ने अपनी मांगों की लंबी लिस्ट तैयार की है, जिनके बीच की खाई बहुत गहरी है. अमेरिका का मुख्य जोर इस बात पर है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह रोके और होर्मुज जलडमरूमध्य को व्यापार के लिए खोल दे. इसके साथ ही, अमेरिका ईरान में कैद अपने नागरिकों की रिहाई की मांग भी उठाएगा.

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ईरान ने इसके जवाब में अपना 10 सूत्रीय प्लान रखा है. ईरान चाहता है कि उस पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं और होर्मुज स्ट्रेट पर उसका पूरा नियंत्रण स्वीकार किया जाए. ईरान वहां से गुजरने वाले जहाजों से 'टोल टैक्स' वसूलने की जिद पर भी अड़ा है. इसे अमेरिका अपनी वैश्विक ताकत के लिए बड़ी चुनौती मान रहा है. 

वार्ता डेलिगेशन में ईरान की ओर से कौन शामिल हो रहा है?

ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ (Mohammad Bagher Ghalibaf) मुख्य वार्ताकार हैं. उनके साथ विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) और सुरक्षा परिषद् के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं.

वहीं अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) कर रहे हैं. उनके साथ डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सलाहकार जेरेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, अमेरिकी सेंट्रल कमांड चीफ ब्रैड कूपर भी शामिल हैं.

क्या है इस्लामाबाद के हालात?

इस ऐतिहासिक मुलाकात के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को पूरी तरह छावनी में तब्दील कर दिया गया है. शहर में दो दिन की सार्वजनिक छुट्टी घोषित की गई है और मोबाइल नेटवर्क से लेकर सड़कों तक पर कड़ा पहरा है. खास बात यह है कि यह वार्ता 'इनडायरेक्ट' (अप्रत्यक्ष) होने की उम्मीद है. यानी दोनों देशों के प्रतिनिधि अलग-अलग कमरों में बैठेंगे और पाकिस्तानी अधिकारी संदेशवाहक के रूप में प्रस्तावों को इधर से उधर ले जाएंगे.

पाकिस्तान इस समय एक बहुत ही नाजुक भूमिका में है. एक तरफ वह ईरान का पड़ोसी है और दूसरी तरफ अमेरिका के साथ अपने संबंधों को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है. चीन भी इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान के पीछे खड़ा है.

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