ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद वार्ता आखिर क्यों फेल हुई; आसान भाषा में समझिए पूरी इनसाइड स्टोरी

ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता असफल रही, दोनों पक्षों के बीच किसी समझौते पर सहमति नहीं बनी. अब इसकी आंच दुनियाभर में देखे जाने की आशंका है.

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  • ईरान और US के बीच हुई शांति वार्ता किसी समझौते पर पहुंचने में असफल रही और दोनों पक्ष अलग-अलग रुख पर रहे
  • ईरान ने वार्ता की विफलता को पहले दौर की बातचीत का नतीजा बताया और कहा कि वार्ता आगे जारी रह सकती है
  • वार्ता के दौरान ईरान ने सभी प्रतिबंध हटाने और ट्रंप काल के आर्थिक नुकसान की भरपाई की मांग की.
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ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद शांति वार्ता असफल रही. इस दौर की बैठक में दोनों पक्ष किसी एक राय पर नहीं आ सके और वार्ता असफल हो है. हालांकि ईरान ने कह दिया है अभी वार्ता टूटी नहीं है बल्कि इसे पहले दौर की वार्ता का बेनतीजा होना कहा जा सकता है. ईरान ने इशारा किया है कि बातचीत अभी जारी रहेगी.  अमेरिका उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने तो साफ कह दिया कि ईरान किसी भी शर्ते को मानने से इनकार कर रहा है. वहीं ईरान के विदेश मंत्रालय ने साफ लहजे में कह दिया, "अमेरिका मेज पर वो जीत हासिल करना चाहता है, जो वह जंग के मैदान में नहीं कर सका."

लेकिन आखिर बात बिगड़ी कैसे, कल तक दोनों देश वार्ता के लिए राजी थे और फिर अचानक कहां चूक हो गई?

पाकिस्तानी पत्रकार नुमान अशफाक मुगल ने एनडीटीवी से बातचीत में इस्लामाबाद वार्ता को डिकोड किया है. बातचीत के फेल होने की सबसे बड़ी वजह ईरान की वो मांग थी, जिसे अमेरिका ने सिरे से खारिज कर दिया. ईरान चाहता था कि बातचीत शुरू होने से पहले ही स्थितियां 'प्री-वॉर' हो जाएं. इसका सीधा मतलब था सारे प्रतिबंधों को एक झटके में हटाना और ट्रंप काल में किए गए आर्थिक नुकसान की भरपाई भी की जाए.

क्या है अमेरिका-ईरान वार्ता की इनसाइड स्टोरी?

दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप की नीति भी बेहद सख्त रही. अमेरिका ने मुआवजे की बात तो दूर ईरान के सामने ऐसी शर्तें रख दीं जो उसे घुटने टेकने पर मजबूर करने जैसी थीं.

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अमेरिका चाहता था कि पहले ईरान अपना परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम पूरी तरह सरेंडर करे, उसके बाद ही प्रतिबंधों में ढील पर विचार होगा. यह 'पहले आप-पहले आप' की लड़ाई समझौते को खा गई.

परमाणु तो दूर की बात है मिसाइल को लेकर ही उलझ गए अमेरिका और ईरान

बातचीत के दौरान अमेरिका की मांग केवल परमाणु सेंटर्स को बंद करने तक सीमित नहीं थी. इस बार अमेरिका ने ईरान के मिसाइल प्रोग्राम और ड्रोन टेक्नोलॉजी पर टोटल बैन की शर्त रख दी. अमेरिका के लिए ये हथियार अस्थिरता के कारण हैं, लेकिन ईरान के लिए ये उसकी 'डिफेंसिव डॉक्ट्रिन' (रक्षा सिद्धांत) की रीढ़ हैं. 

ईरान का तर्क है कि अगर वह अपनी लंबी दूरी की मिसाइलें छोड़ देता है, तो इस अशांत क्षेत्र में वह पूरी तरह असुरक्षित और अलग थलग हो जाएगा. इजरायल और खाड़ी देशों की सैन्य ताकत के सामने ईरान खुद को निहत्था करने के लिए तैयार नहीं था. ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला माना और यहीं से बातचीत 'नॉन-स्टार्टर' मोड में चली गई.

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'लीगल गारंटी' की मांग भी है एक वजह

ईरान के जेहन में आज भी 2018 की वो कड़वी यादें ताजा हैं, जब अमेरिका एकतरफा तरीके से परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकल गया था. इस बार इस्लामाबाद में ईरान ने साफ कर दिया कि वह किसी 'एग्जीक्यूटिव एग्रीमेंट' (कार्यकारी समझौते) पर दस्तखत नहीं करेगा. ईरान को डर है कि आज ट्रंप या कोई और वादा करेंगे, तो कल को कोई दूसरा राष्ट्रपति आकर उसे फिर से रद्द कर देगा.

तेहरान ने इस बार 'लीगल गारंटी' की मांग की थी. यानी इसे अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की मंजूरी मिले. अमेरिकी प्रतिनिधियों के लिए यह मांग पूरी करना लगभग असंभव था, क्योंकि मौजूदा राजनीतिक माहौल में ईरान के पक्ष में कोई भी बिल पास कराना असंभव ही है.

इजरायल फैक्टर कितना सही?

इस्लामाबाद की मेज पर भले ही इजरायल का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था, लेकिन उसकी मौजूदगी साफ महसूस की जा सकती थी. इजरायल का 'इनविजिबल हैंड' इस वार्ता को लगातार प्रभावित कर रहा था. इजरायल किसी भी ऐसे समझौते के खिलाफ था जो ईरान को 1% भी यूरेनियम संवर्धन की इजाजत दे. अमेरिका पर इजरायल का यह दबाव वार्ता को डिरेल कर रहा था.

इसके अलावा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर रणनीतिक नियंत्रण को लेकर भी भारी असहमति रही. यह सिर्फ जहाजों को रोकने या छोड़ने का मामला नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल इकोनॉमिक कॉरिडोर की जंग है. अमेरिका चाहता है कि ईरान इस रूट पर अपना रणनीतिक दबाव कम करे, ताकि वैश्विक व्यापार पर पश्चिमी नियंत्रण बना रहे.

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