चाबहार, तेल और शांति-शांति.. अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील पर इन 3 वजहों से भारत की नजर

अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील को लेकर बातचीत जारी है. 2018 में खुद ऐसे ही एक डील से अमेरिका को बाहर निकालने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में एक नई डील की कोशिश में हैं.

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई और भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी
अल्टर्ड बाई एनडीटीवी इंडिया

अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील को लेकर बातचीत जारी है. 2018 में खुद ऐसे ही एक डील से अमेरिका को बाहर निकालने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में एक नई डील की कोशिश में हैं. अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने साफ-साफ कहा है कि अगर तेहरान को वाशिंगटन के साथ कोई डील करनी है तो अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम यानी न्यूक्लियर एनरिचमेंट प्रोग्राम को रोकना और समाप्त करना होगा. ईरान को अपनी यूरेनियम को एनरिच करने से जुड़ीं गतिविधियों पर रोक लगानी होगी और बदले में उसे अमेरिकी प्रतिबंधों से राहत मिलेगी. सवाल है कि इन दो देशों की वार्ता पर भारत क्यों नजर रख रहा होगा, अगर ईरान पर अमेरिका अपने आर्थिक प्रतिबंधों को हटा लेता है तो भारत को क्या फायदा होगा. 

चाबहार बंदरगाह वाला फैक्टर

भारत के लिए पाकिस्तान को बाईपास करके सेंट्रल एशिया तक पहुंचने के लिए चाबहार प्रोजेक्ट बहुत अहम है. ईरान में बने चाबहार बंदरगाह को मिलकर बनाने की कल्पना तो 2003 में ही की गई थी लेकिन यह प्रोजेक्ट इस वजह से सालों तक शुरू नहीं हो पाया क्योंकि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने तेहरान पर उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर प्रतिबंध लगा दिए थे.

2015 में अमेरिका के तात्कालिक राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ न्यूक्लियर डील के बाद प्रतिबंधों में ढील दी. ठीक उसी साल भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह को लेकर एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, और 2016 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान यात्रा के दौरान इसे लागू किया गया. लेकिन जब 2018 में ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका परमाणु समझौते से एकतरफा हट गया तो ईरान पर दोबारा प्रतिबंध लग गए. लेकिन भारत ने चाबहार पर काम करना जारी भी रखा और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचा भी रहा.

भारत ने पिछले साल ही, मई 2024 में ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह के संचालन के लिए 10 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए हैं. हालांकि, समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद, अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि ईरान के साथ व्यापारिक सौदों पर विचार करने वालों को "यह जानना चाहिए कि वे खुद को प्रतिबंधों के संभावित जोखिम के लिए खोल रहे हैं. अब अगर किसी न्यूक्लियर डील के बाद अमेरिका ईरान से आर्थिक प्रतिबंध हटा देता है तो भारत बिना किसी झिझक के इस प्रोजेक्ट को अलग ऊंचाई पर ले जा सकेगा.

भारत के लिए अमेरिका और ईरान के बीच कोई न्यूक्लियर डील क्यों अहम है, यह समझने के लिए हमने ईरान में भारत के पूर्व राजदूत (2011-15) डी पी श्रीवास्तव से बात की. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने चाबहार बंदरगाह में भारतीय भागीदारी पर ईरान के साथ बातचीत का नेतृत्व किया था. उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच कोई समझौता दोनों के बीच तनाव कम करेगा और यह स्थिति भारत के लिए चाबहार प्रोजेक्ट पर फिर से काम करने का रास्ता बनाएगी. साथ ही यह चाबहार बंदरगाह के जरिए इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (NSTC) तक भारत को पहुंच भी प्रदान करेगा.

गौरतलब है कि चाबहार बंदरगाह भारत की ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है. सबसे बड़ी बात कि यह पाकिस्तान को बाइपास करके अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया के लिए एक वैकल्पिक रास्ता प्रदान करता है, जिससे हमें सेंट्रल एशिया के साथ बेहतर व्यापार की अनुमति मिलती है. साथ ही उम्मीद है कि चाबहार के इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (NSTC) से जुड़ जाएगा, जो भारत को ईरान, अजरबैजान और रूस के माध्यम से यूरोप के करीब लाएगा. यह कॉरिडोर स्वेज नजर मार्ग का एक विकल्प होगा और जब यह पूरी तरह से चालू हो जाएगा तो अंतरमहाद्वीपीय व्यापार पर खर्च होने वाले समय और धन को कम करेगा. चीन ने भी चाबहार बंदरगाह के बमुश्किल 200 किमी दूर, पाकिस्तान के ग्वादर में बंदरगाह बनाया है. 

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार कमर आगा ने एनडीटीवी से बात की. उन्होंने कहा कि एक बार NSTC पूरी तरह चालू हो जाएगा तब चाबहार का असली असर देखने को मिलेगा, सेंट्रल एशिया, रूस से लेकर यूरोप तक का रास्ता खुलेगा. उनके अनुसार भले चाबहार पर ईरान के साथ काम करने को लेकर अमेरिका ने भारत पर कोई एक्शन नहीं लिया है लेकिन जबतक ईरान पर उसके प्रतिबंध खत्म नहीं होते (जो न्यूक्लियर डील के बाद होंगे), भारत के लिए एक थ्रेट बना रहेगा. 

ईरान से तेल आयात का फैक्टर

फिलहाल अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ईरान से कच्चे तेल का आयात नहीं करता है. लेकिन इन प्रतिबंधों से पहले ईरान उन टॉप 3 देशों में शामिल था जहां से भारत कच्चा तेल मंगाता था. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी के आखिर में ही अमेरिका ने ईरानी तेल के व्यापार और परिवहन में शामिल होने के आरोप में दुनिया भर में 30 से अधिक कंपनियों, जहाजों और व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगा दिया था- इसमें भारत के दो बिजनेसमैन और 2 कंपनियां भी शामिल थीं. भारत को उम्मीद है कि एक बार न्यूक्लियर डील के बाद अमेरिकी प्रतिबंध हट जाए तो ईरान से तेल का आयात फिर से शुरू किया जाएगा.

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कमर आगा ने बताया कि ईरान से आने वाला तेल भारत के लिए सस्ता पड़ता है क्योंकि उसपर ट्रांसपोर्ट चार्ज कम पड़ता है.

पड़ोस में हमेशा शांति चाहेगा भारत

कमर आगा के अनुसार ईरान भारत के बहुत करीब बैठा देश है. पाकिस्तान के बनने से पहले ईरान से हमारी सीमा लगती थी. आज अगर ईरान में न्यूक्लियर हथियार बनेगा तो कल सऊदी अरब भी बनाएगा, मिस्र भी बनाएगा और देखकर तुर्की भी बनाएगा. चीन और पाकिस्तान के पास पहले से ही ऐसे हथियार हैं. भारत सरकार का यह स्टैंड है कि अगर ईरान ने आज न्यूक्लियर हथियार बना लिए तो देखा-देखी पूरे साउथ एशिया में परमाणु प्रसार (Nuclear proliferation) हो जाएगा. भारत कोई युद्ध नहीं चाहता, भारत के लिए ईरान एक मित्र देश है लेकिन वह कभी नहीं चाहेगा कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बनाए. खुद ईरान का यह अधिकारिक स्टैंड है कि वह न्यूक्लियर हथियार नहीं बना रहा बल्कि उसका न्यूक्लियर प्रोग्राम केवल उसकी उर्जा आवश्यक्ताओं को पूरा करने के लिए है. साथ ही भारत हमेशा से एकतरफा प्रतिबंधों के खिलाफ रहा है. वह हर स्थिति में चाहेगा कि अमेरिका और ईरान के बातचीत के माध्यम से एक समझौता हो.

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