ईरान का जां फिदा अभियान, डेढ़ से दो करोड़ लोग देश के लिए जान देने को हुए तैयार

ईरान को पता था कि उसके देश पर आज नहीं तो कल अमेरिका और इजरायल हमला करेंगे. इसीलिए उसने रूस और ताजिकिस्तान में अपना सैन्य प्रोडक्शन शुरू किया. उसे पता था कि जंग के समय उसे गोला-बारूद की जरूरत पड़ेगी.

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ईरान में नये सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के समर्थन में कई जगह पर पोस्टर भी लगे हैं.
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  • ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता का दूसरा दौर मंगलवार तक जारी रह सकता है
  • ईरान ने देशव्यापी जनफदा अभियान के तहत डेढ़ से दो करोड़ लोगों की मानव श्रृंखला बनाई है
  • ईरान की सैन्य ताकत में नियमित सेना और शक्तिशाली आईआरजीसी शामिल हैं जो राजनीतिक संरचना की भी रक्षा करते हैं
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ईरान और अमेरिका में कल शांति वार्ता के दूसरे राउंड की बैठक होगी. मंगलवार तक ये वार्ता जारी रह सकती है. ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर वार्ता कामयाब नहीं हुई तो ईरान के एक-एक पुल और बिजली संयंत्र को बर्बाद कर देंगे. मगर क्या सच में? 28 फरवरी से शुरू हुए युद्ध को आज 50 दिन बीतने जा रहे हैं. अब तक अमेरिका क्यों नहीं बर्बाद कर पाया? क्या ईरान को बर्बाद कर देना इतना आसान है? पिछली बार ट्रंप ने जब ऐसी धमकी दी थी तो ईरान के लोगों ने बिजली संयंत्रों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखला बनाई. शीर्ष अधिकारियों ने कहा कि वे अपनी जान कुर्बान करने को भी तैयार हैं.

ये जां फिदा क्या है

देशव्यापी मानव श्रृंखला में शामिल होने के लिए ऑनलाइन और एसएमएस संदेशों के माध्यम से चलाए गए अभियान के बाद, अधिकारियों ने दावा किया कि डेढ़ से दो करोड़ लोग इसमें शामिल हुए. इस अभियान को नाम दिया गया 'जां फिदा'. जां फिदा का शाब्दिक अर्थ है "जीवन का बलिदान" या "समर्पण". मगर ये अभियान मानव श्रृंखला तक ही सीमित नहीं है. यह अभियान संभावित बाहरी खतरों (विशेषकर अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच) के खिलाफ देश की रक्षा के लिए स्वयंसेवकों की भर्ती और एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए चलाया गया है.

ईरान की सैन्य शक्ति को अक्सर अपारदर्शी और जटिल बताया जाता है. देश में समानांतर सेनाएं, कई खुफिया एजेंसियां और बहुस्तरीय कमान संरचनाएं हैं, जो सभी सीधे सर्वोच्च नेता के प्रति जवाबदेह हैं, जो सभी सशस्त्र बलों के कमांडर-इन-चीफ के रूप में कार्य करते हैं. समानांतर सेनाओं में आरतेश - या ईरान की नियमित सेना, जो क्षेत्रीय रक्षा, हवाई क्षेत्र और पारंपरिक युद्ध के लिए जिम्मेदार है - और आईआरजीसी शामिल हैं, जिसकी भूमिका रक्षा से परे है और इसमें ईरान की राजनीतिक संरचना की रक्षा करना भी शामिल है.

आईआरजीसी बेहद शक्तिशाली

आईआरजीसी ईरान के हवाई क्षेत्र और ड्रोन शस्त्रागार को भी नियंत्रित करता है, जो इजरायल और अमेरिका के हमलों के खिलाफ ईरान की ताकत है. 2022 में, तेहरान ने ताजिकिस्तान में अबाबिल मॉडल बनाने के लिए अपनी पहली आधिकारिक ड्रोन फैक्ट्री का उद्घाटन किया. यह भी माना जाता है कि ईरान ने रूस को अलाबुगा में फैक्ट्री स्थापित करने में मदद की, जहां ईरानी डिजाइन वाले शाहेद वन-वे ड्रोन, जिनका यूक्रेन युद्ध में अक्सर इस्तेमाल किया जाता था, स्थानीय स्तर पर असेंबल किए जाते हैं. मॉस्को ने इन विमानों के स्वतंत्र उत्पादन में इतनी महारत हासिल कर ली है कि अब कथित तौर पर उसे अपने संशोधित संस्करणों के उत्पादन के लिए ईरान से बहुत कम इनपुट की आवश्यकता होती है. ये सिर्फ दोस्ती में ईरान ने नहीं किया था, बल्कि ये एक रणनीति थी. 

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हथियारों को लेकर किया ऐसा जुगाड़

ईरान को पता था कि उसके देश पर आज नहीं तो कल अमेरिका और इजरायल हमला करेंगे. इसीलिए उसने रूस और ताजिकिस्तान में अपना सैन्य प्रोडक्शन शुरू किया. उसे पता था कि जंग के समय उसे गोला-बारूद की जरूरत पड़ेगी और हो सकता है कि उसके अपने देश में सैन्य प्रोडक्शन वाले क्षेत्रों को अमेरिका-इजरायल नष्ट कर दें. उस समय उन्हें इन देशों के जरिए सैन्य सहायता मिल सकेगी. इसी तरह मिसाइलों को देश के अलग-अलग इलाकों में बंकर के अंदर रखा गया. जिससे दुश्मनों को पता ही नहीं चले कि ईरान की मिसाइलें कहां से आ रही हैं. कुछ जगहों से हमला करने या भंडार जमा रखने पर उनके नष्ट होने का ज्यादा खतरा था. अब ईरान को हथियारों की सप्लाई आराम से होती रहेगी.

ये दो रणनीति हो गई हिट

इससे भी बड़ी बात ईरान ने इस युद्ध में ये किया कि उसने होर्मुज को चोक कर दिया. वही होर्मुज जिसे अगर दुनिया के तेल-गैस का लाइफलाइन कहा जाए तो गलत नहीं होगा. इससे अमेरिका बहुत लंबे समय तक अगर युद्ध करना चाहे भी तो ईरान के साथ नहीं कर पाएगा. कारण पूरी दुनिया उस पर दबाव डालेगी कि जल्द युद्ध बंद कर होर्मुज को खुलवाए. ईरान की ये प्लानिंग इस युद्ध में कामयाब होती दिख रही है. अमेरिका खुद बार-बार वार्ता के लिए आगे आ रहा है. अगर होर्मुज बंद नहीं होता तो शायद अमेरिका इस युद्ध को लंबा खिंचता. साथ ही ईरान ने इस बार ये भी रणनीति अपनाई कि भले ही उसके पास अमेरिका तक मार करने वाली मिसाइलें नहीं है, पर वो अमेरिका को निशाना तो बना ही सकता है. उसने खाड़ी देशों पर अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ-साथ तेल-गैस भंडारों पर भी जवाबी कार्रवाई में हमले किए. इस तरह जब भी अमेरिका-इजरायल ईरान के तेल-गैस भंडार पर हमला करते वो खाड़ी देशों पर हमले करता और सऊदी, कतर, यूएई जैसे देश तुरंत अमेरिका पर दबाव बना देते कि वो ईरान के तेल-गैस भंडार पर हमले ना करे. कुल मिलाकर कहें कि इस युद्ध में ईरान ने अमेरिका को बांध दिया है तो गलत नहीं होगा. वो जीत नहीं सकता, पर हार भी नहीं सकता.  और अब तो लड़ने के लिए डेढ़-दो करोड़ जनफदा भी हैं.

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